Wednesday, 19 December 2018

अँधियों से कुछ निभा के तो देखो

अँधियों से कुछ निभा के तो देखो
तूफानों को कभी आज़मा के तो देखो

अभी  से हार मान ली आपने 
बात कुछ आगे बढ़ा के तो देखो

अँधेरा भी साथ रौशनी लाएगा 
कुछ सितारों को सजा के देखो

जीने का सलीका आन ही नहीं 
कभी शीश अपना झुका के तो देखो

जब जी चाहे जी भर के देखो
देखने के डर को हटा के तो देखो 

Tuesday, 18 December 2018

ये लोकतंत्र है यहां शब्दों का व्यापार जारी है

ये लोकतंत्र है यहां शब्दों का व्यापार जारी है
खाली पेट भरने के लिए वादों की फिर तैयारी है

राज करने आयें हैं जो खुद को सेवक बतायें हैं 
कितने खूबसूरत बहाने, बातें कितनी न्यारी हैं

जम्हूरियत क्यूँ सोती है इंसानियत जब रोती है 
सच हमें समझाते झूठ जिनकी जागीरदारी है

इंसान को हथियार बनाये मौत को भी जायज़ ठहराये 
वक्त के लिए खेल रचायें बस कुर्सी सबको प्यारी है

जनता का जनता के लिए जनता द्वारा, ये नारा अब पुराना है
प्रजातंत्र है नेताओं का और नेताओं की तो इसमें दावेदारी है 




Monday, 17 December 2018

इक उम्मीद, इक प्यास, इक आस

इक उम्मीद, इक प्यास, इक आस ये है ज़िंदगी और ये ही इसकी साज़ इक तरफ़ कुछ शोर है इक तरफ़ ख़ामोशी भी हर धड़कन पर पड़े मिले कुछ ख़ामोशी कुछ आवाज़

कितना कुछ हमने पाया है कितना पाया गवाया है
इस खोने पाने की कितनी उलझने कितने इसके राज

वक्त से डर जाता वक्त के साथ मचल जाता
अजीब है ये आदमी अजीब इसके हर अंदाज

हम ही हमारे हैं हम ही खुद को प्यारे हैं
ये भी इक हकीकत ये भी सच है आज

हमसफ़र कभी खुद को भी बना लीजिये

हमसफ़र कभी खुद को भी बना लीजिये
रास्तों पे भी मंजिल का मज़ा लीजिये

दुनिया के खातिर कब तक यूँ सजेंगे
आईने के लिए भी खुद को सज़ा लीजिये

सूरज को अब हम भी पहचाने हैं जनाब
सैकड़ों दीपक आप चाहे जला लीजिये

इश्क़ वक्त के साथ खुद को बदलता बहुत है
रूहानी बातों से बस खुद को बहला लीजिये

टूट कर कोई शीशा जुड़ता है कहाँ
हो सके तो खुद को ये समझा लीजिये  



मत आस लगाना

इक शब्द हूँ कविता बन जाऊँ कैसे इक बूँद हूँ प्यास मिटाऊँ कैसे इक धूप हूँ सूरज को लाऊँ कैसे इक पत्ता हूँ पेड़ बन बहलाऊँ कैसे बहुत मुश्किल है एक को भूल जाना पर एक से पूर्णता की भी मत आस लगाना

इश्क़ बदलने का नहीं साथ चलने का नाम है

इश्क़ बदलने का नहीं साथ चलने का नाम है
ख़ामोशी को जो निभाए इश्क़ वो पैगाम है

हर तमन्ना ज़िन्दगी की हासिल हो पाती है कहाँ
बहुत महँगी है ये दुनिया बहुत ऊँचा तमन्नाओं का दाम है

कुछ बातें ज़िन्दगी की सच झूठ से है परे
इन बातों का भी इक मुकम्मिल मक़ाम है 

अब ख्वाइशों को हमें समेटना है हुज़ूर
ये ज़िन्दगी की सुबह नहीं ये ज़िन्दगी की शाम है

बहुत बेदर्द है ये दुनिया न खोल पिंजरा मेरे हबीब
सच ये भी है पंछियों को पिंजरे में ही आराम है

 


Wednesday, 16 May 2018

ये मौसम ही है गुज़र जायेगा

ये मौसम ही है गुज़र जायेगा
वक्त फिर बदल के आएगा

काटों से आप क्यों इतना खौफ खाये
बिन इन्हें छुए फूल कैसे कोई पायेगा

ज़िन्दगी को इतना भी ना सताइये
दिल के मेहमाँ को दिल कैसे भूल जायेगा

बहुत मुश्किल है गम में खुद को हँसाना
पर ये ज़िन्दगी को कुछ तो गुदगुदाएगा

तन्हाई में खुद की रिहाई छुपी है
खुद के जैसा कौन हमें समझयेगा   

आँखें बंद कर ली हमने न देखना चाहते हैं

आँखें बंद कर ली जब न देखना चाहते हैं
दिल को कैसे बंद करे ये बस फरमाते हैं

हर सुबह तारों को खो दिया हमने
हर शाम तारों की उम्मीद जगाते हैं

कोई किसी पे यकीन करे तो कैसे
फूल चाहने वाले उसे तोड़ ले जाते हैं

रात को बदनाम किया हम सब ने
अँधेरा सुकून-आराम भी तो लाते हैं

बस्तियों को लोगों ने बेज़ार किया
अब बच्चें बरसात में कहाँ नहाते हैं

  

Monday, 14 May 2018

अश्कों ने दिल को आवाज़ दिया है

अश्कों ने दिल को इक साज दिया है
खमोशी में खुद का अहसास किया है

वक्त भी क्यूँ ठहरा ठहरा लगता है
क्या इसने भी कोई वनवास लिया है

दुनिया में हम आये हैं दुनिया के लिए
मिट्टी के हर कण ने ये आभास दिया है

खुद की तलाश में खुद को ही भुला बैठे
कैसा ये हमने खुद को कारावास दिया है

अपनों में भी अब गैरों सी दूरी है
बेमन सबने सबका साथ लिया है

कुछ दोस्ती कलम से कर ली हमने
हर सुख दुःख में इसने साथ दिया है
  

Saturday, 12 May 2018

ज़िन्दगी में सौगातो का खूबसूरत साथ हो

ज़िन्दगी में  सौगातो का खूबसूरत साथ हो
हर किसी को अपने सपनो से मुलकात हो

सितारे ज़मी की चाहत में खुद को जगाएं
धरती पे भी कुछ ऐसी ही सुनहरी रात हो

सच ना सही झूठ ही कुछ दिल बहला दे
वक्त की कभी ख्वाहिशों से मुलाकात हो

हर कोई खुद को ख़ुशी ख़ुशी भिगो ले
चाहतों की कुछ ऐसी भी बरसात हो

कभी जी भर आँसू बहाएं कभी ख़ुशी से चिल्लाएं
अपनी मस्ती में नाचते खूब सारे ज़ज़्बात हो

Monday, 7 May 2018

यादें जिनकी दिल को दुखाती है

यादें जिनकी दिल को दुखाती है 
मोहब्बत ऐसे भी रिश्ते निभाती है

वक्त न मालूम और क्या लाएगा 
अभी तो रौशनी आँखों को डराती है 

दुश्मनों को भी अब एहतिराम करते हैं   
जब से जाना दोस्ती खुद को बिकवाती है

हुनर कितना भी खुद में सजा लीजिये
ज़िन्दगी किस्मत से कुछ लिखवाती है 

मिट्टी की है फितरत वफ़ा निभाने की 
पर कई बार वो खुद प्यासी रह जाती है  

  

Thursday, 3 May 2018

फिर मौसम बदला सा फिर आंख भर आई है

फिर मौसम बदला सा फिर आंख भर आई है 
कैसे कैसे याद सिमटे ये रात अँधेरी छाई  है

दर्द भी अब कुछ कुछ बदला बदला लगता है 
उल्फत नफरत यादें बातें सबमें इसकी परछाई है 

हाल -ए-दिल किसी को अब सुनाएँ कैसे
इसके हर कोने में मोहब्बत की रुसवाई है

इस तिल के भी कितने सारे अफ़साने है
चेहरे पे बैठा मद-मस्त ये एक तमाशाई है

मोहब्बत भी हर दिल में रूप बदलती जाती है 
कहीं इबादत कहीं ये चाहत कहीं ये मसीहाई है    

ज़िन्दगी कितना कुछ समझा देती है

ज़िन्दगी कितना कुछ समझा देती है 
न गर कोई मनाने वाला मिले
तो ये रूठना ही भुला देती है

दरारों को न कम आकियें
आप दीवारों की ही सोचे
ये छतों से दुश्मनी निभा देती हैं 

खामोशी भी एक चोट लिए  
ये बिन कहे कई चेहरों से 
झूठ के नकाब हटा देती है

छोटी बातों से ही परेशानी है
इन छोटी-छोटी बातों को ही
ज़िन्दगी बहुत बड़ी बना देती है 

माफीनामा भी न काम आएगा 
कुछ लोगों को जितना समझायें  
उनसे आदत गलती करवा देती  है

बिन आन जी पाएंगे कहाँ  
जब ना-समझ ये शराफत 
कहीं पे भी हमें लुटा देती है 

Tuesday, 1 May 2018

वक्त कितना कुछ सिखला देता है

वक्त कितना कुछ सिखला देता है 
आंसुओं को गर न छुपा सके 
तो ये हंसी बहाने बना देता है  

दुःख बिछड़ने का है बड़ा  
पर कुछ लोगों का साथ 
ज़िन्दगी को ही रुला देता है

यादें ज़िन्दगी को तड़पाती है 
पर सच सच है ये बात दिल 
खुद को कुछ समझा देता है

दो दिन की है ज़िन्दगी
इस दो दिन के लिए इंसान 
कितना खुद को सजा लेता है 

किसी के साथ कोई मरता है कहाँ 
इश्क़ भी देखिये न, ना जाने 
क्या क्या भरम फैला देता है

Wednesday, 25 April 2018

न पढ़ सकोगे जिन्हें उन किताबों सी हूँ

न पढ़ सकोगे जिन्हें उन किताबों सी हूँ
सवाल खोजती उलझी जवाबों सी हूँ

अँधियों में चोट खा के जो मुस्कुराएं
कुछ टूटे पंखुड़ियों वाले गुलाबों सी हूँ

इश्क को छोड़ अब हम जायेंगे कहाँ
इश्क़ से उलझी इश्क़ के ख्वाबों सी हूँ

हर निगाह हमसे बस सवाल है लिए
कैसे कहूं हुस्न पे पड़े हिजाबों सी हूँ

वक्त न ले सकेगा हमसे कोई हिसाब
मैं किस्मत के बंद पड़े लिफाफों सी हूँ   

Tuesday, 24 April 2018

खुद को बदल के देख लिए कुछ बदला नहीं

खुद को बदल के देख लिए कुछ बदला नहीं
वक्त से थी उम्मीद पर कुछ सम्भला नहीं

ज़िन्दगी से जब से कुछ अनबन है हुई
मोहब्बत में भी हमें कुछ नखरा नहीं

बहार में बाग़ फिर खिल के मुस्कुरायेंगे
बागवां है सलामत तो कुछ उजड़ा नहीं

हँसाना मुहाल है रोना भी शर्मसार है
ज़ज़्बातों में अब कुछ हौसला नहीं

दुनियां को जीत के न चैन पाओगे
है सुकूँ किसी से कुछ झगड़ा नहीं
   


Monday, 23 April 2018

रातों को ख्वाबो से सजा लीजिये

रातों को ख्वाबो से सजा लीजिये 
वक्त ही तो है इसे मना लीजिये 

भीड़ में भी कई दोस्त मिल जायेंगे 
बस ज़रा सा आप मुस्कुरा लीजिये

इश्क की बेबसी पे अब क्या कहे
ग़मों से कुछ दिल बहला लीजिये

कोई किसी के लिए जीता है कहाँ
ये बहाने ज़िन्दगी से हटा लीजिये

सच के साथ झूठ चल सकता नहीं
फासलों को भी कुछ समझा लीजिये    

ज़िन्दगी कुछ सज़ा है तो कुछ मज़ा भी है

ज़िन्दगी कुछ सज़ा है तो कुछ मज़ा भी है
कुछ खोई हुए कुछ इसे अपना पता भी है

वक्त की भी हमसे कोई चाहता नहीं
मेरा नाम किसी चहरे पे लिखा भी है

झूठ सच से हमेशा खौफ खायेगा
झूठ को ही सच का पता भी है

अपना चेहरा आज धुंधला सा लगे 
कुछ इसमें आईने की खता भी है

कुछ ख्वाहिशों पे ज़िन्दगी बची है
बाकि ज़िन्दगी में कुछ बचा भी है

ज़िन्दगी मौत को हरा सकती है
और मौत ही इसकी सज़ा भी है

  

Saturday, 21 April 2018

हमने कब चाहा वकत बदल जाये

हमने कब चाहा वक्त बदल जाये
पर वक्त हमारी समझ में तो आये

मुश्किल है उन रास्तों पे चलना
जो मंज़िल का पता नहीं बताये

बागबाँ कली से कह न पाया
इंतज़ार में वो दिन बिताये

ये ख्वाब ही ज़िन्दगी की चाहत है
ये ख्वाब ही इसे चोट भी पहुचाये

गलत ने राह बताया सही ने चलना सिखाया
पर ये उलझन दिन रात बस हमें है सताए

हम कह सकते हैं समझा सकते नहीं
खुद की समझ से ही कोई समझ पाए

वक्त भी खुद में उलझा हुआ
वक्त भी खुद को कुछ सुलझाए





Thursday, 19 April 2018

वो बातें गई वो एक गुज़ारा ज़माना है

वो बातें गई वो एक गुज़ारा ज़माना है
वक्त से भी तो कुछ रिश्ता निभाना है

दिल के दरवाज़ों पे न दस्तक दीजिये
ज़ज़्बातों को दिल के भीतर सुलाना है

उन यादों से क्यों न दूर जाएँ
जिनका काम बस सताना है 

लगता है इश्क़ बहुत महंगा शौक़ है
नहीं तो हमारा दिल गरीब खाना है

सच बयानी के अल्फाज मानो सो चुके
अब लफ्जों का काम झूठ फैलाना है

अमीरी हर मुश्किल काम कर जाये
पर गरीबी का उम्मीद ही ठिकाना है

अदल* की बातें अब किससे कहें
बहरे हुए जिन्हे इंसाफ दिलाना है

अदल  - न्याय   

Wednesday, 18 April 2018

न दुआ चाहिए न दवा चाहिए

न दुआ चाहिए न दवा चाहिए 
ज़िन्दगी हमें बस ख़ुशनुमा चाहिए

किसी को ये बात कैसे समझाए 
हमे घर में भी खुला आसमाँ चाहिए 

ये खुमारी कभी भी न ख़त्म हो पाये 
ज़िन्दगी को ख्वाबों का कुछ गुमाँ चाहिए

जो मुझे मुझसे ही बचा ले 
मुझे ऐसा एक रहनुमा चाहिए 

अपनी बेबसी को थोड़ा खरीद पाए 
ज़िन्दगी से ऐसा इक मकाँ चाहिए

ज़ज़्बातों से कोई खेल न पाए
सच में एक ऐसा जहाँ चाहिए 

   

Thursday, 12 April 2018

सुना है सूरज चाँद से मोहब्बत करता है

सुना है सूरज चाँद से मोहब्बत करता है
चाँद चमकता रहे इसलिए रोज़ मरता है

ये सच की है बेबसी या झूठ की उम्मीद
न जाने क्यों चकोरा चाँद पे मचलता है

वक्त किसी को क्या डरायेगा
अँधेरे में जुगनू और चमकता है 

रौशनी आज भी वहीँ है मौज़ूद 
सूरज जहाँ कुछ देर ठहरता है

इश्क़ बेबसी का ही दूसरा नाम है
किसी का बस इसपे कब चलता है  

वक्त से ज्यादा बेरहम हमने किसी को देखा नहीं
खूबसूरती हो या मासूमियत सबको ये मसलता है


Wednesday, 11 April 2018

ना-उम्मीदी में एक आस बाक़ी है

ना-उम्मीदी में एक आस बाक़ी है 
बुझे दीये में कुछ राख बाक़ी है

घर जला के भी हम मुस्कुरा बैठे 
आसपास लाखों सौगात बाक़ी है 

वो मुसाफिर है लौट के न आ पायेगा
दिल में उम्मीद की क्यूँ साँस बाक़ी है

हर राज दिल का हमने खोल दिया 
पर घुटन की वो आवाज बाक़ी है

रात पे फिर देखिये एक अँधेरा छाया है 
चिरागों का बस कुछ दूर का साथ बाक़ी है

ज़िन्दगी  कैसे मुँह फेर के जाएगी
जिस्म में अभी भी ज़ज़्बात बाक़ी है

वक्त का फिर एक बार सामना होगा 
कुछ तो ज़िन्दगी में ख्यालात बाक़ी है 

बच्चों को गिरने दो फ़िसलने दो 
सहारे के लिए बड़ों के हाथ बाक़ी है

उम्र कुछ समझौता भी सिखाती है 
हौसले के कहाँ वो हालात बाक़ी है

सूखा पेड़ नींव की बातों से घबराये 
गिरने के लिए एक बरसात बाक़ी है

गिरेंगे तो लोग और गिराते जायेंगे
कुचलने के लिए फ़ौलाद बाक़ी है

जीत और हार में ज़िन्दगी नापते हैं
इंसानों  में कितने आफ़ात* बाक़ी है 

उन नासमझों को कैसे हम समझाएं 
सितारे देख जो कहे आफ़्ताब बाक़ी है

नाम कमाने इस दुनिया में आएं हैं 
या खुदा तेरे कितने ज़मात बाक़ी है

वक्त कहता है चुप होने में समझदारी है 
हर किसी की आँखों में सवालात बाक़ी है

आफ़ात - मुसीबतें 


  

Monday, 9 April 2018

किसी की क्या हस्ती किसी का क्या नाम है

किसी की क्या हस्ती किसी का क्या नाम है 
वक्त के साथ जाएगी ये नुमाइशें तमाम है 

बे-कसी बे-बसी बे-बहा* बे-चाप* समाये हुए 
दिल के रिश्तों में क्या सुकून क्या आराम है

रात में सूरज अँधेरा चाहे वो छुप जाये  
पर सुबह पर्वतों को करता वो सलाम है  

ना-उम्मीदी को बेइंतिहा उम्मीद चाहिए 
उम्मीद को भला उम्मीद से क्या काम है

राह की मुश्किलें दिल को कुछ समझाती है
कैसी होगी मंज़िल कैसा बना वो मुकाम है

अहसानों के साथ अब और न जी पायेंगें 
इन अहसानों तले बन गए हम गुलाम है

बे-बाह - बहुमूल्य 
बे-चाप - खामोशी

Friday, 6 April 2018

वक्त ने हर अंदाज़ बदल के रख दिया

वक्त हर अंदाज़ बदल के चल दिया 
न ख़ुशी से ख़ुशी न ज़ख्मों ने दर्द दिया 

न दोस्तों से उम्मीद न दुश्मनों से गिला
ज़िन्दगी का हिसाब कुछ तो कर दिया

ज़िंदगी से कब तक लड़ते जायेंगे 
हार मान इस किस्से को बदल दिया

चाहत अब ज़िन्दगी में बहार न लाएगी 
उम्मीद का हर फूल हमने मसल दिया  

सोचते हैं अहसास न कुछ बोल जाये
डर से कलम का सर ही कुचल दिया 

कुछ बातों का असर जाता नहीं 
लफ्जों ने हौसलों को क़तर दिया 

नींद ना सही कोई ख्वाब ही चली आये

नींद ना  सही कोई ख्वाब ही चली आये 
ज़िन्दगी जीने की कोई तो वजह बताये 

जो कभी पूरी हो सकती नहीं 
ऐसी बातों पे उम्मीद क्यूँ जगाये

बहुत तोहफ़े पाएं हैं ज़िन्दगी से 
अफ़सोस खोलने से ये टूट जाये 

बिन मकसद ज़िन्दगी चलती नहीं 
ये राज खुद को कैसे समझाए 

जिनसे बातें करना है मुहाल 
उनसे हम अपना जवाब चाहें

दुनिया बदलने की चाहत थी कभी 
अब लगता है बस घर संवर जाये  

मोल ज़िन्दगी का फिर चूका दिया

मोल  ज़िन्दगी का फिर चूका दिया 
लीजिये हमने फिर मुस्कुरा दिया 

आसमान सबकी किस्मत में होता नहीं 
कुछ ने आंगन से भी ख्वाब बना लिया

लोगों की हम अब क्या बात करे 
मौका मिलते ही ज़ख्म लगा दिया

और कितना बॅटवारा होगा इस घर का 
आंगन में भी आपने अँधेरा जगा दिया

थक चुके हैं ज़िन्दगी को हिसाब देते देते 
हर रोज़ इसने एक नया कर्ज चढ़ा दिया    

मुश्किलों ने संभलना सिखाया है

मुश्किलों ने संभलना सिखाया है 
ज़ख्मों ने औकात बताया है 

घर में झरोखे नहीं न सही 
दरवाजों से हवाओं को बुलाया है

दरों-दीवार की चिंता वो क्यों करे 
जिन्होंने दिलों में घर बनाया है 

बे-मतलब पीठ पे खंजर का ये वार है 
हमारा सीना तो ज़ख्मों ने सजाया है

आदमी हर बार सरहद की सोचे 
पंछियों के लिए पिंजरा बनाया है

दीवारों पे नहीं दरवाजे पे दस्तक दीजिये 
आने जाने के लिए ही दरवाजा लगाया है 

इक उम्मीद जाती नहीं की कोई रोक लेगा

इक उम्मीद जाती नहीं कोई रोक लेगा 
और कुछ नहीं तो पीछे से टोक देगा 

बातें कहने का बस एक सलीका हो 
बाकि किसी को कोई और क्या देगा 

सांसों का ज़िन्दगी से जो रिश्ता है 
वो मौत को भी देखिएगा डरा देगा

लोग बस मंजिल के लिए चलते हैं 
असली मज़ा रास्ता सफर का देगा

हम अपने ज़ख्मों की किससे बात करे 
जिसे देखिये अपना ज़ख्म दिखा देगा 

शायर शायद उन्हीं को कहते हैं  
दिल के ज़ख्मों से जो गुनगुना लेगा 



ज़िन्दगी का हर सबक वक्त ने पढ़ाया है

ज़िन्दगी का हर सबक वक्त ने पढ़ाया है 
वो कैसे पास होगा जो किताबों से सीख कर आया है

अब हाँ और ना में फैसला होता नहीं 
ज़िन्दगी ने इतना हमें खुद में उलझाया है

ग़लतियों से वो सिखाते हैं कहाँ 
जो कहते हैं हमने धोखा खाया है 

अज़ी आप क्यों बुरा मान गए 
ये तो हमने खुद के लिए दोहराया है 

लीजिये उन्होंने भी दाद दे दी 
मतलब हमने सच फरमाया है

बात तो हर बार हमने सच ही थी कही
पर कई बार ये दिल को छू नहीं पाया है

पढ़े लिखों की ज़िन्दगी में भी परेशानी है 
यानि पढाई ने असली पाठ कहीं छुपाया है  

चलिए अब चुप हो जाइये 
किसी ने इशारों में समझाया है



Saturday, 31 March 2018

न मुँह में जुबान न आँखों में पानी है

न मुँह में जुबान न आँखों में पानी है 
ये ज़िन्दगी की नहीं मौत की कहानी है 

वक्त हर चीज़ की कीमत चाहेगा 
ख़ामोशी की अपनी बहुत पशेमानी है

हर बात खामोशी से सुनते रहना 
कुछ तो इसमें आज भी बेमानी है

खुद के लिए ही कुछ बोलिये 
वक्त की ज़रूरत अब बयानी है

बहुत चुप थे अमन की खातिर
चुप रहने से ही अब सारी परेशानी है

अपने ज़ख्म से हर दर्द तोल रहे 
ये कैसी सूरत ये कैसी ज़िंदगानी है

 



     

टूटे दिल को फिर कुछ सजा लीजिये

टूटे दिल को फिर सजा लीजिये
टूटे टुकड़ों को इनाम बना लीजिये

पछताने से कुछ हासिल होगा नहीं 
खुद को कुछ वक्त कुछ हौसला दीजिये

ज़िन्दगी है देखिये कहीं बहक जाएगी 
पैरों को अब रास्तों का पता दीजिये

ख्वाहिशें खुद काम करती कहाँ हैं 
अपने वज़ूद का इन्हें हवा दीजिये 

गलतियों से इतना घबराना कैसा 
कुछ इल्ज़ाम किस्मत पे लगा दीजिये



  




Wednesday, 28 March 2018

बे-सबब कोई बात बढती कहाँ है

बे-सबब कोई बात बढती कहाँ है 
हवा बिन झरोखें गुजरती कहाँ है 

हमारे होने न होने से क्या फर्क पड़ता है
किसी की बेबसी वक्त पे चढ़ती कहाँ है 

अपने ही घर में अजनबी से हम
दिल की बात निकलती कहाँ है

बहुत ज़ख्म खाएं हैं इन हथेलियों ने 
हाथ बढ़ाने से भी ये मचलती कहाँ है 

एक गुल के बाग़ से टूट जाने से
गुलिस्ताँ की सूरत बदलती कहाँ हैं 

Tuesday, 27 March 2018

एक दीया हमने फिर जला दिया

एक दीया हमने फिर जला दिया 
दिल के गम को कुछ और हवा दिया 

ये लौ मचल के खुद बुझ जाएगी 
इस मंज़र ने हमे फिर रुला दिया 

इश्क़ को क्या इस बात का अहसास होगा 
ज़ख्म ज़िन्दगी के दामन में उसने बना दिया

अपने लफ्जों से ही हम घबराते हैं
दर्द कितना हमने खुद को पिला दिया 

न शिकायत न शिकवा अब ज़िन्दगी से 
मौत का जाम वक्त ने कुछ चखा दिया

किसी की याद से कुछ न पाओगे
ये सोच हमने खुद को भुला दिया 

खुद पे भरोसा करे भी तो कैसे
हमने ज़िंदगी को ही फंसा दिया 

हर कोई खुद में है टूटा- टूटा हुआ 
इस मरहम से खुद को समझा दिया  
  

हर बात पर इतनी टोका टाकी

हर बात पर इतनी टोका टाकी
ये संभाल के चलो वो संभाल के चलो

कुछ यादें दूर तक साथ चली आईं हैं 
आप कहते हैं उसे भी निकाल के चलो

जिनको रूठना है शौक़ से रूठ जाए 
हमसे न होगा बातें भी संभाल के करो 

कितना कचरा कल का हम ओढ़े हुए
वक्त कहता है अब सब उतार के चलो 

देखते हैं ज़िन्दगी हमें कितना सताएगी
पर कैसे माने ज़िन्दगी से सवाल न करो


आईने से झूठ बुलवाना चाहते हो

आईने से झूठ बुलवाना चाहते हो
आप खुद का सच छुपाना चाहते हो 

वक्त के साथ कुछ बदलेगा नहीं
फिर किस लिए ये बहाना चाहते हो

हर बात क्यूँ पर जा खड़ी हुई 
खुद को कितना सताना चाहते हो 

जिसे आपने संजोया ही नहीं 
आप वो खजाना चाहते हो 

वक्त का लिखा कुछ मिटता नहीं 
आप वक्त को सिखाना चाहते हो



Monday, 26 March 2018

किसी को चाहने से कुछ होता कहाँ है

किसी को चाहने से कुछ होता कहाँ है 
किसी के कहने से कोई रोता कहाँ है 

सुबह की उम्मीद अपनी जगह पे
शाम की शादगी सुबह ढोता कहाँ है

परिंदों को माना खुला आसमान चाहिए 
परिंदा आसमान में पर सोता कहाँ है

खुद से वादा था मुड़ के न पीछे देखेंगे
यादों को दिलों से पर कोई खोता कहाँ है

वो दामन को छू के चला गया
वो दाग़ पर वक्त धोता कहाँ है 

  

आज को कल समझा रहे हैं

आज को कल समझा रहे हैं 
हकीकत को अफ़साने सुना रहे हैं

लफ्ज कब तक झूठ का साथ देता भला
अब ख़ामोशी का अहसान जाता रहे हैं 

सच को पर्दों की चाहत होती कहाँ 
झूठ होगा इसलिए पर्दा सजा रहे हैं 

न जाने ज़िन्दगी और कितना अजमायेगी
अनजान चेहरों में सब खुद को छुपा रहे हैं 

वक्त से हर ज़ख्म भरता कहाँ है 
अब हम ज़ख्म को आज़मा रहे हैं  


न कोई ख़ुशी है न ही कोई गम है

न कोई ख़ुशी है न ही कोई गम है 
बस ज़िन्दगी से थक गए हम है

ख्वाहिशें भी खुद में दर्द छिपाये हुए 
अजीब ज़िन्दगी का ये आलम है

खुद को ही खुद की ज़रूरत नहीं 
खुद को खोने का भी न मातम है

न ज़िन्दगी की चाहत न मौत की तमन्ना
वक्त के साथ बस गुफ़्तगू में हम हैं 

चाहतों को हमारी ज़रूरत नहीं
उम्मीदों की हर लौ अब मद्धम हैं 

   

Wednesday, 21 March 2018

रौशनी के साथ हर वक्त चल सकते नहीं

रौशनी के साथ हर वक्त चल सकते नहीं 
उजालों की परछाई में अब ढल सकते नहीं

आज फिर ज़िन्दगी ने कुछ शज़र हैं सजाएं
अफसोस ये वक्त से पहले फल सकते नहीं

अब मज़ा उस काम को करने में हैं
जो लोग कहे आप कर सकते नहीं

खुद को समझाने में ना क़ाबिल हम 
सितारे सूरज के साथ बढ़ सकते नहीं

खुद को खुद से ही आपने कितना भर लिया
इससे ज्यादा खाली खुद को कर सकते नहीं

कुछ चाहतों को आसमान चाहिए
और बिन दीवार घर बन सकते नहीं

उसे अंजाम तक कैसे पहुंचाएं
जिसका आगाज कर सकते नहीं


    

Tuesday, 20 March 2018

दिमाग जो जानता है वो दिल को बताना होगा

दिमाग जो जानता है वो दिल को बताना होगा 
झूठ का हर सच अब सामने भी लाना होगा

खुद को गर सताना है तो इश्क़ कर लीजिये
आपके पास भी एक टूटा अफ़साना होगा 

जी चाहता है जी भर के आज चिल्लाएं 
कुछ दर्द को अब ज़िन्दगी से जाना होगा 

रौशनी की उम्मीद में बस अँधेरा आया है
लगता हैं ये दीया भी अब बुझाना होगा

टूटे दिल से भी कोई मरता है भला 
मौत के पास कोई और बहाना होगा





वीरानियों से माना मैं गुज़र जाउंगी

वीरानियों से माना मैं गुज़र जाउंगी 
पर उन टूटे पंखों को कैसे समझाउंगी 

राह अजनबी सी ही मिलती है 
मैं जहाँ जाऊं कुछ तो डर जाउंगी

हर कोई खुद में ही उलझा हुआ
अपने अफ़साने अब किसे सुनाऊँगी 

इस कहानी को ख़ुशी का एक मोड़ दे दो  
दर्द में डूबा तो मैं खुद को ही दोहराऊंगी

लोग हौसला बस यूँ ही बढ़ा देते हैं 
पर सच ये की मैं दो कदम न चल पाऊँगी  

उनके जाने से ज्यादा गम कुछ ख्वाबों के जाने का है
जिन्हें चाह कर भी मैं ज़िन्दगी में सजा नहीं पाऊँगी




Monday, 19 March 2018

किसी को मानाने में रूठना भूल गए

किसी को मानाने में रूठना भूल गए
किसी को हँसाने में हम और टूट गए 

ज़िन्दगी तो बस धक्के से चल रही है
पहचाने रास्ते कब के पीछे छूट गए

दस्त-गीरी* में हाथ हर बार थे बढे
किसी की मड़ोड़ से ये भी रूठ गए 

किस बात की शिकायत किस बात का गिला 
कांच के थे पैमाने वक्त के साथ सब टूट गए

अब खुद से और कितनी दुश्मनी निभाएं
मान लिया वक्त और हालात हमें लूट गएँ 

दस्त-गीरी - हाथ बढ़ाना 

  

Sunday, 18 March 2018

हमारे मुस्कुराने से ही ये भी मुस्कुराते हैं

हमारे मुस्कुराने से ही ये भी मुस्कुराते हैं
अजनबी की तरह ही वक्त रिश्ता निभाते हैं

माना आंधियां कुछ देर में चली जाएगी
पर इन की बर्बादियों में हम उम्र बिताते हैं

जब जवाब आया तो सवाल खो गया 
और लोग समझते हैं हम यूँ ही मुस्कुराते हैं

एक उम्मीद ही अब तक ज़िंदा रक्खे है
ज़िन्दगी के अच्छे दिन बस अब आते हैं

किसी से शिकायत हमारी अब खो गई
सबसे ज्यादा हम ही तो खुद को सताते हैं

खुदा हर ज़ख्म के दाग मिटा दे
हम भी अब मुस्कुराना चाहते हैं







Saturday, 17 March 2018

बिन बात भी कभी रुठिये-मनाइये

बिन बात भी कभी रुठिये-मनाइये 
बिन मतलब भी कभी हँसिये-हंसाइए

दोस्ती में तकल्लुफ़ शामिल नहीं जनाब
बिन बात दोस्तों  को सताइये-बहलाइये 

सुबह और शाम से बंध गई है ज़िन्दगी 
कभी दिन और रात को भी हंसाइए-रुलाइये 

क्या हुआ जो कुछ ख्वाब फिर टूट गए 
बेधड़क कुछ और भी संवारिये-सजाइये 

ज़िन्दगी से बोरियत जाएगी ज़रूर 
बिन मौके भी दोस्तों को बुलाइये-बिठाइये 

डर कर किसी को कोई बदला है भला 
ज़िन्दगी को कभी आप भी डराइए-धमकाइये

Friday, 16 March 2018

उम्मीद पर ही ये ज़िन्दगी चल रही है

उम्मीद पर ही ये ज़िन्दगी चल रही है 
झूठी-सच्ची उम्मीदें हर दिल में पल रही है

ये सच है हर सपने सच होते नहीं 
पर साथ इसके ज़िन्दगी सुकूं में गुज़र रही है 

चाहत बस कुछ खुशकिस्मत को अपनाती है 
पर चाहत की चाहत दिलों को मसरूर* कर रही है 

शाद* झूठ को सच मान लेने में भी है 
हकीकत तो यूँ ही हर रोज़ किसी को निकल रही है 

ज़िन्दगी जन्म से मौत का बेरंगी नाम है  
बस कुछ ख्वाहिशें ही तो इसमें रंग भर रही है 

मसरूर - आनंदित 
शाद - ख़ुशी 


जो साथ है वो ही तो खास है

जो साथ है वो ही तो खास है 
बाकि बस सब एक एहसास है

ज़िन्दगी रस्तों में कट जाएगी
मंज़िल की अब हमें नहीं आस है

जो टूट गया माना अब वो छूट गया 
वक्त और ज़ज़्बात संजोना बकवास है

हर दिन खुद में ही एक तोहफ़ा है 
एक-एक साँस ज़िन्दगी की सौगात है 

खुदा को कहें तहे दिल से शुक्रिया
हर ज़रूरत की चीज़ हमारे पास है







Thursday, 15 March 2018

कुछ लोग मिल कर भी कब मिल पाते हैं

कुछ लोग मिल कर भी कब मिल पाते हैं
दौड़ते रास्ते कई बार खुद-ब-खुद सिल जाते हैं

अजीब तमाशा बन गई है ये ज़िन्दगी
उम्मीदों के मौसम में नाउम्मीदी के फूल खिल जाते हैं

ज़िन्दगी हंसी ख़ुशी से गुज़रेगी कैसे
हर राह में दुश्मन दोस्त बन के मिल जाते हैं

वो तन्हाई में भी खुश रहता है
ऐसी बातों से हम तो हिल जाते हैं

बहुत गहरे हैं ये ज़ख़्म फरेबी के
मरहम से भी ये अब छिल जाते हैं

   

वक्त कई बात निगल लेता है

वक्त कई बात निगल लेता है
समय हालात बदल देता है

कभी सुबह से उम्मीद लगाई थी
आज हमे अँधेरा सुकून देता है

हर बात में इतनी टोका-टाकी
कोई भला ऐसे भी साथ देता है

किसी की बातों को दोहराने से क्या
गूंज कब असली आवाज़ देता है

कुछ परेशानियां यूँ भी मिट सकती हैं
इंसान बेवजह उसे हालात देता है


   

Monday, 8 January 2018

शाम को सूरज निकलने की आस लिए हैं

शाम को सूरज निकलने की आस लिए हैं अजीब लोग हैं कैसे कैसे विश्वास लिए हैं

वक़्त का भी कुछ अपना मरहम होगा क्यूँ आप मायूसी की बरसात लिए हैं

बुराई-अच्छाई को कैसे समझाएं
ये सब खुद में ही हालात लिए हैं

उम्मीदों को भी कुछ सरहद चाहिए बिन मतलब भी हम कुछ आस लिए हैं

जिसे देखिये नया साल मुबारक बोल रहा
लगता है ये साल कुछ खुद में खास लिए है




तोहफ़ा नहीं व्यवहार बोलता है

तोहफ़ा नहीं व्यवहार बोलता है पैसा नहीं सदाचार बोलता है बेशक़ीमती सामान ख़रीद के देख लिया मुफ़्त में पाया छोटा सा उपहार बोलता है उम्मीदों के कुछ तोहफ़े हम भी चाहें क़िस्मत का मारा वो लाचार बोलता है

हर दिन ख़ुद में ही एक तोहफ़ा है
ख़ूनी ख़बर वाला अख़बार बोलता है

हम मर कर भी अब तक कैसे जिन्दा है
शायद बुजुर्गों की दुआओं का संसार बोलता है

वक्त ने क़त्ल किया वो कातिल कहलायेगा
टी वी का मारा हर समाचार बोलता है

बस हाथ बढ़ाने का ही तो फासला था
गलतफहमी में खड़ा दीवार बोलता है

कितना तुम मुझ को दे पाओगे
बाजार का हर खरीदार बोलता है

खुशियां इस पल में ही बसी है
दिल में बजता तार बोलता है






हर अमीर का कोट साफ़ रहेगा

हर अमीर का कोट साफ़ रहेगा बस ग़रीबों के पास अपराध रहेगा एसी के कमरों में बदबू छिप जाएगी रोटी के बस्तो में चीख़ता ये पाप रहेगा वो भूख की राह पे फिर लड़खड़ाएगा
अमीरी के पास हर औसाफ रहेगा

पैरहन ही सच की पहचान बनेगी
दिल कब सच्चाई का नाप रहेगा

जम्हूरियत के भुलावे में मत आइये
वक्त हमेशा कुर्सी के ही पास रहेगा
बातें आप चाहे जितनी बना लीजिए पर सच है अमीरों के साथ इंसाफ़ रहेगा