Tuesday, 20 September 2016

परिवर्तन सृष्टि का नियम है

परिवर्तन सृष्टि का नियम है
सृष्टि में हर चीज बदलती है
कुछ तेजी से इस बदलाव को पकड़ती हैं
कुछ धीरे धीरे नए रूप में ढलती है

पतझड़ में पेडो पर उदासी छा जाती है
पर वसंत इसमें खूब हरियाली लाएगी
इस बदलाव के  नए पत्तों से  
पेड़ों पर हरियाली लहलहाएगी

अगर सुबह है तो शाम भी होगा
और शाम के बाद अंधेरा भी छाएगा
पर अंधेरा जाते हुए 
सुबह की लालिमा दे कर जाएगा

कितनी भी तपती गर्मी हो
वो शाम को देकर ही जाएगी
साथ अपने वो कुछ गरम किरणें भी  
समेट के लेकर ही जाएगी

सृष्टि के हिसाब से हमें भी चलना है
हमें भी माहौल के अनिरूप बदलना है
हाँ हमें भी अपने आराम के घर से 
बदलाव के लिए बाहर निकलना है

अगर दिल में अंधेरा है तो ये परिवर्तन उजाला दे जाएगा
और अगर उजाले से आंखें चौन्धिया गई है
तो अंधेरा आंखों को थोड़ा आराम पहुचाएगा
ये परिवर्तन ही हमें नई राह दिखलाएगा

हम फिर क्यों परिवर्तन से घबराते हैं 
हम क्यों दूसरों में ही बदलाव चाहते हैं 
बदलाव तो हमें अपने में ही लाना है
अगर हमें अपने आस पास को जगमगाना है


Monday, 12 September 2016

ये जिन्दगी रोज हमें कुछ सीख दे जाती है

ये जिन्दगी रोज हमें कुछ सीख दे जाती है
इसकी हर तस्वीर हमें कुछ समझाती है
आज रचित की इस तस्वीर ने भी कुछ याद दिलाया
इसने कुछ समय के लिए ही सही मेरा बचपन लौटाया

रेत पर बचपन में हमने भी खूब घरौंदे बनाए हैं
और हर बार समुद्र की लहरों ने उसे मिटाए हैं
फिर भी मैं खूब घरौंदे किनारों पर बनाती थी।
कितनी कोशिश करती पर लहरें उन्हें ले ही जाती थी

समुद्र के किनारे हम बच्चे एक खेल और खेला करते थे
समुद्री रेतों को अपनी हथेली में ख़ूब भरते थे
पर जब भी समुद्री लहरें किनारों पर आती
रेतों को हमारी हथेलियों से लेकर ही जाती

कई बार रेत को लेकर जोर से मुट्ठी बंद किया
फिर भी समुद्री लहरों ने अपना रेत ले ही लिया
थक कर एक बार अपनी मुट्ठी मैंने खोल दी
समुद्री लहरों को अपनी सारी बेबसी बोल दी

पर ये क्या मेरी खुली हथेली पर रेत पडा था
जाते हुए लहरों ने मेरी हथेली पर रेत धरा था
शायद लहरों ने मुझे एक पैगाम दिया था
बंद मुट्ठी पर कुछ बात कहा था

बंद करोगी जिन्दगी की मुट्ठी तो
चाहतो के रेत को किस्मत की लहर ले कर  जाएगी
खोलोगी नहीं जिन्दगी की ये हथेली तो
कैसे तुम्हारी हथेली पर चाहत की रेत बिखर पाएगी।

पर तुम्हें जितना मिला उतना सराहना होगा
इसको इसके मूल रूप में ही अपनाना होगा
फिर तुम्हें चारों तरफ आशाओं की समुद्र नजर आएगी 
और लहरें जिन्दगी की हथेली में खुशियाँ बरसाएँगी 



Saturday, 3 September 2016

नसीहतों का क्या करें

नसीहतों का क्या करें
कैसे इससे निजात पायें
इसे कहाँ लेकर जायें
जी चाहता है कुछ और नहीं तो
नसीहतों का एक पुलिंदा बनायें
हर एक नसीहत इसमें सम्भालें  
सयानों नादानों बईमानों दिवानों
सबकी नसीहत इसमें बंध जाए
एक भी बाहर न बच पाए
बोझ भारी होगा पर उठा लेंगें
किसी की नसीहत के बिना ही
इसे घर से बाहर निकालेंगे
दूर बहुत दूर इसे छोड़ कर आएँगें
कोई वापस फिर न कभी आ पाये
किसी शक्ल में भी हमें न सता पाये
थक गए हैं हम जो आता है
साथ एक नसीहत ज़रूर लाता है
हमारे सूरत-ए-हाल से गुज़रे बिना
बिन माँगे एक नसीहत दे जाता है
नसीहतों से अब ज़िंदगी नहीं हम जोड़ना चाहते हैं
अपनी ज़िंदगी अपनी अक़्ल पर छोड़ना चाहते हैं




Thursday, 1 September 2016

शब हमने ख़्वाबों में ही है गुज़ारी

शब हमने ख़्वाबों में ही है गुज़ारी  
सहर हुई तो ज़िंदगी जीने की दुस्वारी

हमने हर बात अपनी ही है कही
वो क्या कहें ये उनकी समझदारी

अपनी ही क़ैद से हम रिहाई पायें तो कैसे  
क़ातिल हम क़त्ल हमारा सज़ा देने की हमारी ही ज़िम्मेदारी

कई रातों के मुसाफ़िर जाए भी तो कहाँ
एक लम्बी नींद की इस जंगल में कैसे करे तैयारी

हर सबूतों का जवाब अब ख़ामोशी ही दे पाएगी
हमारे सर हमारे क़ातिल को बचाने की भी ज़िम्मेदारी