Thursday, 16 November 2017

रिश्ता

हर रिश्ते में अपनी परेशानी है
हर रिश्ते की अपनी रवानी है 

कुछ रिश्तों में ही अटक गए 
कुछ रिश्तों में ही लटक गए 

कई रिश्तों से बर्बाद हुए 
कई रिश्तों से आबाद हुए 

कुछ रिश्तों से ही संभल गए 
कुछ रिश्तों से ही बिखर गए

कभी रिश्तों ने हमे मनाया है 
कभी रिश्तों ने हमे रुलाया है 

कुछ रिश्तों में झीना-झपटी भी 
कुछ रिश्तों में मरहम पट्टी भी 

कुछ रिश्तों ने बंधन भी खोले हैं 
कुछ रिश्ते कई बार हमें तोड़े हैं 

कुछ रिश्ते यूँ ही पीछे छूट गए 
कुछ रिश्ते बेमतलब रूठ गए 

कई रिश्तों में हम आज भी उलझे हैं 
कई रिश्ते आज भी तो अनसुलझे हैं 

रिश्तों की रोज इक नई कहानी है
रिश्तों की बात पर वो ही पुरानी है 

जो आबाद हुआ वो ही तो रिश्ता था 
जो बर्बाद हुआ बस इक किस्सा था