Wednesday, 19 December 2018

अँधियों से कुछ निभा के तो देखो

अँधियों से कुछ निभा के तो देखो
तूफानों को कभी आज़मा के तो देखो

अभी  से हार मान ली आपने 
बात कुछ आगे बढ़ा के तो देखो

अँधेरा भी साथ रौशनी लाएगा 
कुछ सितारों को सजा के देखो

जीने का सलीका आन ही नहीं 
कभी शीश अपना झुका के तो देखो

जब जी चाहे जी भर के देखो
देखने के डर को हटा के तो देखो 

Tuesday, 18 December 2018

ये लोकतंत्र है यहां शब्दों का व्यापार जारी है

ये लोकतंत्र है यहां शब्दों का व्यापार जारी है
खाली पेट भरने के लिए वादों की फिर तैयारी है

राज करने आयें हैं जो खुद को सेवक बतायें हैं 
कितने खूबसूरत बहाने, बातें कितनी न्यारी हैं

जम्हूरियत क्यूँ सोती है इंसानियत जब रोती है 
सच हमें समझाते झूठ जिनकी जागीरदारी है

इंसान को हथियार बनाये मौत को भी जायज़ ठहराये 
वक्त के लिए खेल रचायें बस कुर्सी सबको प्यारी है

जनता का जनता के लिए जनता द्वारा, ये नारा अब पुराना है
प्रजातंत्र है नेताओं का और नेताओं की तो इसमें दावेदारी है 




Monday, 17 December 2018

इक उम्मीद, इक प्यास, इक आस

इक उम्मीद, इक प्यास, इक आस ये है ज़िंदगी और ये ही इसकी साज़ इक तरफ़ कुछ शोर है इक तरफ़ ख़ामोशी भी हर धड़कन पर पड़े मिले कुछ ख़ामोशी कुछ आवाज़

कितना कुछ हमने पाया है कितना पाया गवाया है
इस खोने पाने की कितनी उलझने कितने इसके राज

वक्त से डर जाता वक्त के साथ मचल जाता
अजीब है ये आदमी अजीब इसके हर अंदाज

हम ही हमारे हैं हम ही खुद को प्यारे हैं
ये भी इक हकीकत ये भी सच है आज

हमसफ़र कभी खुद को भी बना लीजिये

हमसफ़र कभी खुद को भी बना लीजिये
रास्तों पे भी मंजिल का मज़ा लीजिये

दुनिया के खातिर कब तक यूँ सजेंगे
आईने के लिए भी खुद को सज़ा लीजिये

सूरज को अब हम भी पहचाने हैं जनाब
सैकड़ों दीपक आप चाहे जला लीजिये

इश्क़ वक्त के साथ खुद को बदलता बहुत है
रूहानी बातों से बस खुद को बहला लीजिये

टूट कर कोई शीशा जुड़ता है कहाँ
हो सके तो खुद को ये समझा लीजिये  



मत आस लगाना

इक शब्द हूँ कविता बन जाऊँ कैसे इक बूँद हूँ प्यास मिटाऊँ कैसे इक धूप हूँ सूरज को लाऊँ कैसे इक पत्ता हूँ पेड़ बन बहलाऊँ कैसे बहुत मुश्किल है एक को भूल जाना पर एक से पूर्णता की भी मत आस लगाना

इश्क़ बदलने का नहीं साथ चलने का नाम है

इश्क़ बदलने का नहीं साथ चलने का नाम है
ख़ामोशी को जो निभाए इश्क़ वो पैगाम है

हर तमन्ना ज़िन्दगी की हासिल हो पाती है कहाँ
बहुत महँगी है ये दुनिया बहुत ऊँचा तमन्नाओं का दाम है

कुछ बातें ज़िन्दगी की सच झूठ से है परे
इन बातों का भी इक मुकम्मिल मक़ाम है 

अब ख्वाइशों को हमें समेटना है हुज़ूर
ये ज़िन्दगी की सुबह नहीं ये ज़िन्दगी की शाम है

बहुत बेदर्द है ये दुनिया न खोल पिंजरा मेरे हबीब
सच ये भी है पंछियों को पिंजरे में ही आराम है