Sunday, 22 December 2019

अजीब कश्मकश में है ये ज़िंदगी

अजीब कश्मकश में है ये ज़िंदगी
सच बोले तो दोस्त रूठे, झूठ से हम टूटे

बहुत मुश्किल है कुछ बातों को बताना
जिन्हें बस हम समझे, जिन्हें बस हम बूझे 

वक्त की गुस्ताखियों का क्या कहे 
हमें कहे तुम झूठे, और फिर हमें लूटे 

कुछ मसले अब ऐसे भी हैं सुलझाते 
मान लेते हैं न हम सच्चे, न वो झूठे

दिन झगड़ों का दोस्ती में हमें गवारा है
पर साँझ किसी का न दिल टूटे न वो रूठे 

Dedicated to all my friends from KV2 Youngsters group, Ambala Cantt....

Saturday, 21 December 2019

सुना है ख्वाबों में रहने से नींद आती नहीं

सुना है ख्वाबों में रहने से नींद आती नहीं 
क्या इस लिए रात हमें जगाती रही  

इश्क़ भी एहसासों का एक गलीचा है 
ख्वाब-बेबसी एक दूसरे को समझाती रही

धरती को कोई अब ये कैसे समझाए    
आसमान देख क्यूँ उम्मीदें लगाती रही

वक्त के लिफ़ाफ़े पे कुछ तो लिखा होगा
ग़लतफ़हमी इस आस में दिन बिताती रही

आफताब नहीं महताब की बातें करे
अँधेरे में जो रौशनी बरपाती रही 





थकन किस बात की जब धड़कने चल रही हैं

थकन किस बात की जब धड़कने चल रही हैं
हुकूमत ताकत से नहीं हौसलें से डर रही है

धर्मनिरपेक्षता भी अब पक्षपात है
सोच किस दौर से गुज़र रही है

इंसानियत को भी गलत बता रहे हैं वो
तो क्या ज़ज़्बात हैवानियत से गुज़र रही है

चुप रहना उस वक्त अपराध है
जब शोर शांति को कुचल रही है

घुटन कब तक हम इस तरह सहेंगे
ज़िन्दगी के लिये ये गुफ़्तगू चल रही है

चलिए कुछ मिल कर अब हम लड़ते हैं
ख्वाब बदलाव की राह शायद बढ़ रही है

#CitizenshipAmmendmentAct 

Friday, 13 September 2019

वो रास्ते लौटाएँगे जो ख़ुद हैं खो चुके

वो रास्ते लौटाएँगे जो ख़ुद हैं खो चुके
मंज़िलो की चाहत में ये भी हैं रो चुके

वक़्त के नाइंसाफ़ियों की बात क्या करें
कुछ मौत की बुज़दिली को भी ढो चुके

रौशनी की ख़्वाहिश कोई किस से करे
सूरज ही जब साज़िशों के बीज बो चुके

ख़्वाब हमारे लिए देखना है गुनाह
इंसान नहीं हम खुदा को टोह चुके

दुआ है उन गलियों को मिले ख़ुशियाँ ता-उम्र
जिन गलियों में जाने की हम उम्मीद खो चुके

मैल जिस्म को आज भी जकड़े है पड़ा
क्या करे सकड़ों बार हम इन्हें धो चुके

ख़्वाब की तासीर कोई कैसे करे भला
सच झूठ से लड़ कर आज फिर सो चुके

क्यूँ

'क्यूँ' का जवाब जानती हूँ आएगा नहीं
वक्त भी 'क्यूँ' को शायद आज़मायेगा नहीं

वो 'क्यूँ' जो मेरे दिलों दिमाग में हरदम भरा है
वो 'क्यूँ' जो मेरी ज़िन्दगी के हर मोड़ पे खड़ा है

इस 'क्यूँ'  ने हर रात मुझसे कितना कुछ कहा है
इस 'क्यूँ'  के लिए मैंने कितना कुछ सहा है

बेज़ुबान ये 'क्यूँ', क्यूँ इतना शोर मचाता है
बेबस सा ये 'क्यूँ', क्यूँ मुझे इतना रुलाता है

हर दिन मेरा हौसला तोड़ता ये 'क्यूँ'
हर वक्त बड़बड़ाता बोलता ये 'क्यूँ'

ये 'क्यूँ'  मेरे मौत से रिश्ता निभाएगा
ज़िन्दगी जानती है जवाब नहीं आएगा

एक अँधेरा चाहिए इस ज़िन्दगी के लिए

एक अँधेरा चाहिए इस ज़िन्दगी के लिए
एक अँधेरा चाहिए खुद की ख़ुशी के लिए

खुद को पाना-खोना अँधेरा समझायेगा
खुद की परछाई को ये पीछे छोड़ आएगा

बेवफा रौशनी इसका किसी न किसी से रिश्ता है
बावफा ये अँधेरा जो बस खुद का अटूट हिस्सा है

धुंधलाई हुई आँखों को अँधेरा राहत पहुंचाएगा
चकाचौंध ज़िन्दगी को ये कुछ सुकून दे जायेगा

अंधेरों को कहाँ किसी रास्तों की चाहत है
मंज़िलों से ख़त्म हो चुकी इसकी मोहब्बत है

उजालों की नहीं मुझे अंधेरों की ज़रूरत है
वक्त से भी एक अँधेरे कमरे की चाहत है

अंधेरों में मैं नहीं___ ये अँधेरा मुझमे रहता है
ज़िन्दगी की हर सच्चाई अँधेरा ही तो कहता है

Wednesday, 16 January 2019

सबके जैसा खुद को क्यूँ बनाते हो

सबके जैसा खुद को क्यूँ  बनाते हो
धरती पे आसमान क्यूँ चाहते हो

बेबसी को ज़िन्दगी की ज़रूरत बता रहे
हौसलों को क्यूँ इतना सताते हो

इश्क़ कहीं पाने कहीं खोने का नाम है
ऐसी बातों से किस को बहलाते हो

न खेलिए किसी के ज़ज़्बातों से
जिस्म को नहीं रूह को चोट पहुंचाते हो

मुस्कराहट ज़िन्दगी की जागीर है
क्यूँ ज़िन्दगी से मुफ़लिसी चाहते हो

सवालों को कैद करने की चाहत है 
क्यूँ वक्त से बिन बात टकराते हो

Thursday, 10 January 2019

दिल से जो आवाज है आती वो हिंदी है

दिल से जो आवाज है आती वो हिंदी है
हम सब की पहचान बनाती वो हिंदी है 

तुतली-तुतली बोली में इसको हमने पाया है
माँ की ममता साथ जो लाती वो हिंदी है

संस्कृति, सभ्यता, संस्कार खुद में संजोयें हुए
खुद से खुद को ही है जो सजाती वो हिंदी है

अभिव्यक्ति को जान दिया मातृभाषा का सम्मान लिया 
सोच की दुनिया को दिनरात बहलाती वो हिंदी है

संस्कृत, उर्दू, कुछ अंग्रेजी भी है साथ लिए
हिंदुस्तान के हर रूप को अपनाती वो हिंदी है

रूप सुनहरा हर भाषा का सुन्दर सबकी बोली है
इश्क़ बन रूह तक पर जो है जाती वो हिंदी है  




  

Wednesday, 9 January 2019

धोखे में जीते रहने का और कितना प्रयास करूँ

धोखे में जीते रहने का और कितना प्रयास करूँ
टूटे को तोड़ने का बोलो कितना मैं अभ्यास करूँ

मन है मेरा शीशे का पत्थर हैं सबके हाथों में
किसको अपनी बात बताऊँ किसपर मैं विश्वास करूँ

वादों की ही लाश उठाये सब आये हैं आंगन में
उम्मीदों का तुम ही बोलो कैसे शिलान्यास करूँ

सपनों के धरौंदों को हर रोज तो रौंदा जाता है
खुशियों की चौखट पर फिर कैसे आवास करूँ

संसार को समझने के लिए संसार का त्याग ज़रूरी है
कैसे ऐसी बातों को अपनाऊं कैसे मैं सन्यास धरूँ





Saturday, 5 January 2019

किसी की बात कहाँ खुद से धोखा खाया है

किसी की बात कहाँ खुद से धोखा खाया है 
ये सच है हमने खुद से खुद को जलाया है

हवाओं की शाज़िशों में हर कोई गिरफ्तार 
पर इन शाखों ने पत्तों को खुद भी गिराया है

ताजमहल में भी हमें मकबरा ही दिखा
कुछ सोच हमने अपने लिए तो सजाया है

खुदा मान जिसके सामने हम आज हैं खड़े
कभी इन पत्थरों को हमने पैरों से हटाया है

क्या हासिल हुआ हमे चाँद पे पहुंच के
जब बचपन को हमने भूखे सुलाया है