ज़िन्दगी कितना कुछ समझा देती है
न गर कोई मनाने वाला मिले
तो ये रूठना ही भुला देती है
दरारों को न कम आकियें
आप दीवारों की ही सोचे
ये छतों से दुश्मनी निभा देती हैं
खामोशी भी एक चोट लिए
ये बिन कहे कई चेहरों से
झूठ के नकाब हटा देती है
छोटी बातों से ही परेशानी है
इन छोटी-छोटी बातों को ही
ज़िन्दगी बहुत बड़ी बना देती है
माफीनामा भी न काम आएगा
कुछ लोगों को जितना समझायें
उनसे आदत गलती करवा देती है
बिन आन जी पाएंगे कहाँ
जब ना-समझ ये शराफत
कहीं पे भी हमें लुटा देती है
उनसे आदत गलती करवा देती है
बिन आन जी पाएंगे कहाँ
जब ना-समझ ये शराफत
कहीं पे भी हमें लुटा देती है
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