वीरानियों से माना मैं गुज़र जाउंगी
इस कहानी को ख़ुशी का एक मोड़ दे दो
पर उन टूटे पंखों को कैसे समझाउंगी
राह अजनबी सी ही मिलती है
मैं जहाँ जाऊं कुछ तो डर जाउंगी
हर कोई खुद में ही उलझा हुआ
अपने अफ़साने अब किसे सुनाऊँगी
इस कहानी को ख़ुशी का एक मोड़ दे दो
दर्द में डूबा तो मैं खुद को ही दोहराऊंगी
लोग हौसला बस यूँ ही बढ़ा देते हैं
पर सच ये की मैं दो कदम न चल पाऊँगी
उनके जाने से ज्यादा गम कुछ ख्वाबों के जाने का है
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