Saturday, 31 March 2018

न मुँह में जुबान न आँखों में पानी है

न मुँह में जुबान न आँखों में पानी है 
ये ज़िन्दगी की नहीं मौत की कहानी है 

वक्त हर चीज़ की कीमत चाहेगा 
ख़ामोशी की अपनी बहुत पशेमानी है

हर बात खामोशी से सुनते रहना 
कुछ तो इसमें आज भी बेमानी है

खुद के लिए ही कुछ बोलिये 
वक्त की ज़रूरत अब बयानी है

बहुत चुप थे अमन की खातिर
चुप रहने से ही अब सारी परेशानी है

अपने ज़ख्म से हर दर्द तोल रहे 
ये कैसी सूरत ये कैसी ज़िंदगानी है

 



     

टूटे दिल को फिर कुछ सजा लीजिये

टूटे दिल को फिर सजा लीजिये
टूटे टुकड़ों को इनाम बना लीजिये

पछताने से कुछ हासिल होगा नहीं 
खुद को कुछ वक्त कुछ हौसला दीजिये

ज़िन्दगी है देखिये कहीं बहक जाएगी 
पैरों को अब रास्तों का पता दीजिये

ख्वाहिशें खुद काम करती कहाँ हैं 
अपने वज़ूद का इन्हें हवा दीजिये 

गलतियों से इतना घबराना कैसा 
कुछ इल्ज़ाम किस्मत पे लगा दीजिये



  




Wednesday, 28 March 2018

बे-सबब कोई बात बढती कहाँ है

बे-सबब कोई बात बढती कहाँ है 
हवा बिन झरोखें गुजरती कहाँ है 

हमारे होने न होने से क्या फर्क पड़ता है
किसी की बेबसी वक्त पे चढ़ती कहाँ है 

अपने ही घर में अजनबी से हम
दिल की बात निकलती कहाँ है

बहुत ज़ख्म खाएं हैं इन हथेलियों ने 
हाथ बढ़ाने से भी ये मचलती कहाँ है 

एक गुल के बाग़ से टूट जाने से
गुलिस्ताँ की सूरत बदलती कहाँ हैं 

Tuesday, 27 March 2018

एक दीया हमने फिर जला दिया

एक दीया हमने फिर जला दिया 
दिल के गम को कुछ और हवा दिया 

ये लौ मचल के खुद बुझ जाएगी 
इस मंज़र ने हमे फिर रुला दिया 

इश्क़ को क्या इस बात का अहसास होगा 
ज़ख्म ज़िन्दगी के दामन में उसने बना दिया

अपने लफ्जों से ही हम घबराते हैं
दर्द कितना हमने खुद को पिला दिया 

न शिकायत न शिकवा अब ज़िन्दगी से 
मौत का जाम वक्त ने कुछ चखा दिया

किसी की याद से कुछ न पाओगे
ये सोच हमने खुद को भुला दिया 

खुद पे भरोसा करे भी तो कैसे
हमने ज़िंदगी को ही फंसा दिया 

हर कोई खुद में है टूटा- टूटा हुआ 
इस मरहम से खुद को समझा दिया  
  

हर बात पर इतनी टोका टाकी

हर बात पर इतनी टोका टाकी
ये संभाल के चलो वो संभाल के चलो

कुछ यादें दूर तक साथ चली आईं हैं 
आप कहते हैं उसे भी निकाल के चलो

जिनको रूठना है शौक़ से रूठ जाए 
हमसे न होगा बातें भी संभाल के करो 

कितना कचरा कल का हम ओढ़े हुए
वक्त कहता है अब सब उतार के चलो 

देखते हैं ज़िन्दगी हमें कितना सताएगी
पर कैसे माने ज़िन्दगी से सवाल न करो


आईने से झूठ बुलवाना चाहते हो

आईने से झूठ बुलवाना चाहते हो
आप खुद का सच छुपाना चाहते हो 

वक्त के साथ कुछ बदलेगा नहीं
फिर किस लिए ये बहाना चाहते हो

हर बात क्यूँ पर जा खड़ी हुई 
खुद को कितना सताना चाहते हो 

जिसे आपने संजोया ही नहीं 
आप वो खजाना चाहते हो 

वक्त का लिखा कुछ मिटता नहीं 
आप वक्त को सिखाना चाहते हो



Monday, 26 March 2018

किसी को चाहने से कुछ होता कहाँ है

किसी को चाहने से कुछ होता कहाँ है 
किसी के कहने से कोई रोता कहाँ है 

सुबह की उम्मीद अपनी जगह पे
शाम की शादगी सुबह ढोता कहाँ है

परिंदों को माना खुला आसमान चाहिए 
परिंदा आसमान में पर सोता कहाँ है

खुद से वादा था मुड़ के न पीछे देखेंगे
यादों को दिलों से पर कोई खोता कहाँ है

वो दामन को छू के चला गया
वो दाग़ पर वक्त धोता कहाँ है 

  

आज को कल समझा रहे हैं

आज को कल समझा रहे हैं 
हकीकत को अफ़साने सुना रहे हैं

लफ्ज कब तक झूठ का साथ देता भला
अब ख़ामोशी का अहसान जाता रहे हैं 

सच को पर्दों की चाहत होती कहाँ 
झूठ होगा इसलिए पर्दा सजा रहे हैं 

न जाने ज़िन्दगी और कितना अजमायेगी
अनजान चेहरों में सब खुद को छुपा रहे हैं 

वक्त से हर ज़ख्म भरता कहाँ है 
अब हम ज़ख्म को आज़मा रहे हैं  


न कोई ख़ुशी है न ही कोई गम है

न कोई ख़ुशी है न ही कोई गम है 
बस ज़िन्दगी से थक गए हम है

ख्वाहिशें भी खुद में दर्द छिपाये हुए 
अजीब ज़िन्दगी का ये आलम है

खुद को ही खुद की ज़रूरत नहीं 
खुद को खोने का भी न मातम है

न ज़िन्दगी की चाहत न मौत की तमन्ना
वक्त के साथ बस गुफ़्तगू में हम हैं 

चाहतों को हमारी ज़रूरत नहीं
उम्मीदों की हर लौ अब मद्धम हैं 

   

Wednesday, 21 March 2018

रौशनी के साथ हर वक्त चल सकते नहीं

रौशनी के साथ हर वक्त चल सकते नहीं 
उजालों की परछाई में अब ढल सकते नहीं

आज फिर ज़िन्दगी ने कुछ शज़र हैं सजाएं
अफसोस ये वक्त से पहले फल सकते नहीं

अब मज़ा उस काम को करने में हैं
जो लोग कहे आप कर सकते नहीं

खुद को समझाने में ना क़ाबिल हम 
सितारे सूरज के साथ बढ़ सकते नहीं

खुद को खुद से ही आपने कितना भर लिया
इससे ज्यादा खाली खुद को कर सकते नहीं

कुछ चाहतों को आसमान चाहिए
और बिन दीवार घर बन सकते नहीं

उसे अंजाम तक कैसे पहुंचाएं
जिसका आगाज कर सकते नहीं


    

Tuesday, 20 March 2018

दिमाग जो जानता है वो दिल को बताना होगा

दिमाग जो जानता है वो दिल को बताना होगा 
झूठ का हर सच अब सामने भी लाना होगा

खुद को गर सताना है तो इश्क़ कर लीजिये
आपके पास भी एक टूटा अफ़साना होगा 

जी चाहता है जी भर के आज चिल्लाएं 
कुछ दर्द को अब ज़िन्दगी से जाना होगा 

रौशनी की उम्मीद में बस अँधेरा आया है
लगता हैं ये दीया भी अब बुझाना होगा

टूटे दिल से भी कोई मरता है भला 
मौत के पास कोई और बहाना होगा





वीरानियों से माना मैं गुज़र जाउंगी

वीरानियों से माना मैं गुज़र जाउंगी 
पर उन टूटे पंखों को कैसे समझाउंगी 

राह अजनबी सी ही मिलती है 
मैं जहाँ जाऊं कुछ तो डर जाउंगी

हर कोई खुद में ही उलझा हुआ
अपने अफ़साने अब किसे सुनाऊँगी 

इस कहानी को ख़ुशी का एक मोड़ दे दो  
दर्द में डूबा तो मैं खुद को ही दोहराऊंगी

लोग हौसला बस यूँ ही बढ़ा देते हैं 
पर सच ये की मैं दो कदम न चल पाऊँगी  

उनके जाने से ज्यादा गम कुछ ख्वाबों के जाने का है
जिन्हें चाह कर भी मैं ज़िन्दगी में सजा नहीं पाऊँगी




Monday, 19 March 2018

किसी को मानाने में रूठना भूल गए

किसी को मानाने में रूठना भूल गए
किसी को हँसाने में हम और टूट गए 

ज़िन्दगी तो बस धक्के से चल रही है
पहचाने रास्ते कब के पीछे छूट गए

दस्त-गीरी* में हाथ हर बार थे बढे
किसी की मड़ोड़ से ये भी रूठ गए 

किस बात की शिकायत किस बात का गिला 
कांच के थे पैमाने वक्त के साथ सब टूट गए

अब खुद से और कितनी दुश्मनी निभाएं
मान लिया वक्त और हालात हमें लूट गएँ 

दस्त-गीरी - हाथ बढ़ाना 

  

Sunday, 18 March 2018

हमारे मुस्कुराने से ही ये भी मुस्कुराते हैं

हमारे मुस्कुराने से ही ये भी मुस्कुराते हैं
अजनबी की तरह ही वक्त रिश्ता निभाते हैं

माना आंधियां कुछ देर में चली जाएगी
पर इन की बर्बादियों में हम उम्र बिताते हैं

जब जवाब आया तो सवाल खो गया 
और लोग समझते हैं हम यूँ ही मुस्कुराते हैं

एक उम्मीद ही अब तक ज़िंदा रक्खे है
ज़िन्दगी के अच्छे दिन बस अब आते हैं

किसी से शिकायत हमारी अब खो गई
सबसे ज्यादा हम ही तो खुद को सताते हैं

खुदा हर ज़ख्म के दाग मिटा दे
हम भी अब मुस्कुराना चाहते हैं







Saturday, 17 March 2018

बिन बात भी कभी रुठिये-मनाइये

बिन बात भी कभी रुठिये-मनाइये 
बिन मतलब भी कभी हँसिये-हंसाइए

दोस्ती में तकल्लुफ़ शामिल नहीं जनाब
बिन बात दोस्तों  को सताइये-बहलाइये 

सुबह और शाम से बंध गई है ज़िन्दगी 
कभी दिन और रात को भी हंसाइए-रुलाइये 

क्या हुआ जो कुछ ख्वाब फिर टूट गए 
बेधड़क कुछ और भी संवारिये-सजाइये 

ज़िन्दगी से बोरियत जाएगी ज़रूर 
बिन मौके भी दोस्तों को बुलाइये-बिठाइये 

डर कर किसी को कोई बदला है भला 
ज़िन्दगी को कभी आप भी डराइए-धमकाइये

Friday, 16 March 2018

उम्मीद पर ही ये ज़िन्दगी चल रही है

उम्मीद पर ही ये ज़िन्दगी चल रही है 
झूठी-सच्ची उम्मीदें हर दिल में पल रही है

ये सच है हर सपने सच होते नहीं 
पर साथ इसके ज़िन्दगी सुकूं में गुज़र रही है 

चाहत बस कुछ खुशकिस्मत को अपनाती है 
पर चाहत की चाहत दिलों को मसरूर* कर रही है 

शाद* झूठ को सच मान लेने में भी है 
हकीकत तो यूँ ही हर रोज़ किसी को निकल रही है 

ज़िन्दगी जन्म से मौत का बेरंगी नाम है  
बस कुछ ख्वाहिशें ही तो इसमें रंग भर रही है 

मसरूर - आनंदित 
शाद - ख़ुशी 


जो साथ है वो ही तो खास है

जो साथ है वो ही तो खास है 
बाकि बस सब एक एहसास है

ज़िन्दगी रस्तों में कट जाएगी
मंज़िल की अब हमें नहीं आस है

जो टूट गया माना अब वो छूट गया 
वक्त और ज़ज़्बात संजोना बकवास है

हर दिन खुद में ही एक तोहफ़ा है 
एक-एक साँस ज़िन्दगी की सौगात है 

खुदा को कहें तहे दिल से शुक्रिया
हर ज़रूरत की चीज़ हमारे पास है







Thursday, 15 March 2018

कुछ लोग मिल कर भी कब मिल पाते हैं

कुछ लोग मिल कर भी कब मिल पाते हैं
दौड़ते रास्ते कई बार खुद-ब-खुद सिल जाते हैं

अजीब तमाशा बन गई है ये ज़िन्दगी
उम्मीदों के मौसम में नाउम्मीदी के फूल खिल जाते हैं

ज़िन्दगी हंसी ख़ुशी से गुज़रेगी कैसे
हर राह में दुश्मन दोस्त बन के मिल जाते हैं

वो तन्हाई में भी खुश रहता है
ऐसी बातों से हम तो हिल जाते हैं

बहुत गहरे हैं ये ज़ख़्म फरेबी के
मरहम से भी ये अब छिल जाते हैं

   

वक्त कई बात निगल लेता है

वक्त कई बात निगल लेता है
समय हालात बदल देता है

कभी सुबह से उम्मीद लगाई थी
आज हमे अँधेरा सुकून देता है

हर बात में इतनी टोका-टाकी
कोई भला ऐसे भी साथ देता है

किसी की बातों को दोहराने से क्या
गूंज कब असली आवाज़ देता है

कुछ परेशानियां यूँ भी मिट सकती हैं
इंसान बेवजह उसे हालात देता है