आज को कल समझा रहे हैं
हकीकत को अफ़साने सुना रहे हैं
लफ्ज कब तक झूठ का साथ देता भला
अब ख़ामोशी का अहसान जाता रहे हैं
सच को पर्दों की चाहत होती कहाँ
झूठ होगा इसलिए पर्दा सजा रहे हैं
न जाने ज़िन्दगी और कितना अजमायेगी
अनजान चेहरों में सब खुद को छुपा रहे हैं
वक्त से हर ज़ख्म भरता कहाँ है
अब हम ज़ख्म को आज़मा रहे हैं
हकीकत को अफ़साने सुना रहे हैं
लफ्ज कब तक झूठ का साथ देता भला
अब ख़ामोशी का अहसान जाता रहे हैं
सच को पर्दों की चाहत होती कहाँ
झूठ होगा इसलिए पर्दा सजा रहे हैं
न जाने ज़िन्दगी और कितना अजमायेगी
अनजान चेहरों में सब खुद को छुपा रहे हैं
वक्त से हर ज़ख्म भरता कहाँ है
अब हम ज़ख्म को आज़मा रहे हैं
वाहहह ये भी बहुत सुंदर!
ReplyDeleteतहे दिल से से शुक्रिया ..
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