Friday, 12 May 2017

ख़ुद को फिर से जीने को तैयारी है

ख़ुद को फिर से जीने को तैयारी है
ख़ुद को पहचाने की हमारी बारी है

आज ख़ुद को आईने में देख ख़ुद ही चौंक गए
इस शख़्स से दोस्ती में क्यूँ इतनी दुश्वारी है  

ख़ुद से लड़ने में हम क्यूँ हारते रहे
ख़ुद के खेल में हम क्यूँ अनाड़ी हैं

इश्तिहार चलिए कुछ ख़ुद का ख़ुद को दे दे
ख़ुद से ख़ुद का सौदा करने की भी तैयारी है

बहुत आज़माया है इन उजालों को
अब अंधेरों से बंधी उम्मीदें हमारी है






ग़ुलामी की ज़ंजीर पहना इंक़िलाब बुलवा रहे हैं

ग़ुलामी की ज़ंजीर पहना इंक़िलाब बुलवा रहे हैं
सही है आप देश में एक नई क्रांति ही ला रहे हैं

सबको चुप करवाना मक़सद है आपकी बोली का
और आप बोलकर हमें इंक़िलाब भी समझा रहे हैं

देखिए देश कितनी तेज़ी से बदल रहा है
लोग सच के लिए बोलने से क़तरा रहे हैं

हमने मज़हब को घर के भीतर क़ैद किया है
पर हुक्मरान मज़हब से इंकिलाब चाह रहे हैं

कल तक हर बात पर इंकिलाब चिल्लाने वाले
आज भूख से तड़पते हुए क्यूँ नज़र रहे हैं