मुश्किलों ने संभलना सिखाया है
ज़ख्मों ने औकात बताया है
घर में झरोखे नहीं न सही
दरवाजों से हवाओं को बुलाया है
दरों-दीवार की चिंता वो क्यों करे
जिन्होंने दिलों में घर बनाया है
बे-मतलब पीठ पे खंजर का ये वार है
हमारा सीना तो ज़ख्मों ने सजाया है
आदमी हर बार सरहद की सोचे
पंछियों के लिए पिंजरा बनाया है
दीवारों पे नहीं दरवाजे पे दस्तक दीजिये
आने जाने के लिए ही दरवाजा लगाया है
No comments:
Post a Comment