Saturday, 26 August 2017

किनारे पर सहारा मिलता नहीं है

किनारे पर सहारा मिलता नहीं है
डूबने ने पे किनारा दिखता नहीं है

क़ाबिलियत की क्या बात करे हैं
ज़रूरतों के बाज़ार में ये बिकता नहीं है

कुछ भी अजूबा नहीं इस दुनिया में है
बस आँखों को कई बार दिखता नहीं है

मोहब्बत भी तो एक जानलेवा बीमारी है
बस वक़्त और हालात पर ये टिकता नहीं है

उन्हीं ताल्लुकात पे ये दुनिया रुकी है
मतलब के लिए जिनमे कोई रिश्ता नहीं है


ज़िंदगी मुस्कुराना सिखा देती है

ज़िंदगी मुस्कुराना सिखा देती है
मज़बूरियां हालात समझा देती है

हर कोई अंधेरे की बात करते हैं 
रौशनी ख़ुद को समझा लेती है

कितना भी वो बात छिपाए
ख़ामोशी कुछ बता ही देती है

वो हर वक़्त ध्यान हम पे रखना   
दुश्मनी कुछ दोस्ती निभा लेती है

वो ख़फ़ा हैं ख़फ़ा रहे हमसे
ज़रूरतें कुछ दीवार गिरा देती है




खेलेने के लिए मैदान में उतरना पड़ता है

खेलने के लिए मैदान में उतरना पड़ता है
तमाशायी नहीं ख़ुद तमाशा बनना पड़ता है

इज़्ज़त दौलत यूँ हीं नहीं मिलती जनाब
कई बार गिर-गिर कर संभलना पड़ता है

हर कोई हर बात समझ सकता नहीं
समझने के लिए हालात से गुज़रना पड़ता है

ये वक्त ये हालात यूँ ही नहीं पैदा होते 
आँधी को ख़ामोशी से निकलना पड़ता है

मौत भी एक दिन आपको अपनाएगी
ज़िंदगी के काँटों पे पहले चलना पड़ता है



Wednesday, 23 August 2017

ग़ैरों के नजदीक अपनों से यूँ दूर जा बैठे हो

ग़ैरों के नजदीक अपनों से यूँ दूर जा बैठे हो
महफ़िल आपकी है पर आदमी आप कैसे हो

मुद्दतों बाद आज वो सामने आये हैं 
वही मंसब-ए-दिलबरी की आप कैसे हो

वो शहर बहुत पहले मिट चुका है
लगता है आप ख्यालों के घर में रहते हो

हम आज भी अदब से मिले हैं
बदले हालात में क्यों बहते हो

कुछ दुनियादारी भी सीखिये जनाब
अपनी ही रिवायतों में क्यूँ बहते हो


कोई देख कर भी न देखना चाहे तो कोई क्या करे

कोई देख कर भी न देखना चाहे तो कोई क्या करे
टूटे आइने से गर वो घर सजायें तो कोई क्या करे

ख़ुद ही आग लगा वो आग बुझाने आये
ऐसे इंसानों की दवा करे तो कोई क्या करे

ज़िंदगी से था वादा इसे आजमाने का
वक्त साथ छोड़ जाये तो कोई क्या करे

रूठों को मनाना मुश्किल है ना मुमकिन नहीं 
पर कोई यूँ ही दूर बैठ जाए तो कोई क्या करे

मालूम है जहर पीने से मौत आएगी
कोई प्यार से इसे पिलाये तो कोई क्या करे

प्यास है जिन्हें पत्थर को भी पी जाने की
उनकी राहों पे सितम ढाये तो कोई क्या करे


इतनी आसानी से बात बदल सकते नहीं

इतनी आसानी से बात बदल सकते नहीं
समंदर को किनारे से समझ सकते नहीं

आपकी इस मोहब्बत को हम कैसे मान लें
हम जानते हैं आप चाहत बदल सकते नहीं

माना दौलत से आप हर चीज़ ख़रीद लाएंगे
दिल की तन्हाई आप इससे भर सकते नहीं

वो असमान में हर वक्त बेताब सा गुज़र रहा
बूँदों की प्यास को बादल समझ सकते नहीं

जो दिल में है वो ही ज़बां पे आयेगा
वक़्त और हालत हमें बदल सकते नहीं



शम्मा की तक़दीर में जूझना है तो खुदा भी क्या करे

शम्मा की तक़दीर में जूझना है तो खुदा भी क्या करे
वक़्त के साथ गर मिटना है तो दुआ भी क्या करे

किस बात का डर जो वो फिर पीछे मुड़ गए
इरादा ख़ुद का टूटा हो तो हौसला भी क्या करे

इंसानों की ये दुनिया सजाई है ऊपर वाले ने
इंसान गर इसे न अपनाये तो खुदा भी क्या करे

सुराही ने लो फिर गर्दन झुका दी प्यालों पे
जाम फिर छलक जाए तो साक़ी भी क्या करे

क्या क़ाबा क्या काशी क्या पीर क्या फ़क़ीर
जब रब ही रूठा हो तो इबादत भी क्या करे

चाहत है जिन्हें ज़िन्दगी को आजमाने की
जुल्म वक्त का उनपे असर करे तो भी क्या करे




Friday, 11 August 2017

बेबसी को एक खूबसूरत साथ मिला है

बेबसी को एक खूबसूरत साथ मिला है 
आँखों को अश्कों का आवाज़ मिला है 

क्यूँ शर्मिंदा हो हम अपने अश्क़ों पर 
बादलों के रोने से धरती को बरसात मिला है 

कैसे कहे किस बात पर हम कितना रोयें 
ज़िंदा रहने के लिए ख़ुदा से ये सौगात मिला है 

बात-बात पर रोने वाले हम जैसे को  
सुख-दुःख के लिए ये ज़ज़्बात मिला है 

लीजिये आज हम फिर एक बार रो देते हैं 
दर्द को मिटाने के लिए एक शुरुआत मिला है 


चाँद-तारे गर अंधेरों से डर गए होते

चाँद-तारे गर अंधेरों से डर गए होते 
तो वो भी धरती पर उतर गए होते 

कुछ यादों में ही तो ज़िंदगानी हैं 
वर्ना हम तो कब के मर गए होते 

वो सब्ज रंग वो खुशनुमा फ़िज़ा लौटती नहीं 
गर बरसात ज़िन्दगी के भी  गुज़र गए होते 

एक मज़बूरी है घर वापस जाना 
वार्ना हम भी सफर में चल गए होते

बस उस दो कदम के फासले  से 
कितने दुश्मन दोस्त में बदल गए होते 

ऐन वक्त पर हमने खुद को रोका 
वार्ना हम खुद की नज़रों से उतर गए होते