वाउ(Wow), गॉश(Gosh), सीरीयस्ली(seriously), ये कुछ ऐसे शब्द हैं जो न चाहते
हुए भी मैं बहुत इस्तमाल करती हूँ, लिखने और बोलने दोनों में। चाहती हूँ कि ये आदत
छूट जाए पर आदतें भी मेरी तरह ही ढ़िट है। कम हुई है पर ख़त्म होने का नाम ही नहीं
लेती। तीन दिन पहले जब मैंने राजीव बक्शी जी की किताब ‘जर्नी फ़्रम गुवाहाटी तो
माछीवाड़ा’ ख़त्म किया तो मुँह से अनायास ही ख़ूब ज़ोर से निकल पड़ा ‘वाउ’। उत्साह
में, ख़ुशी के मारे, बिना सोचे। किताब पढ़ा सो पढ़ा, वो भी एक सिटिंग यानी एक बार
बैठी और किताब पूरी ख़त्म कर के ही उठी। मन में एक डर था अगर बीच में छोड़ दिया तो
शायद पूरी नहीं कर पाऊँगी। पढ़ने बैठी तो समय देखा था और बीच बीच में घड़ी पर नज़र
पड़ ही जाती थी। पर जब ख़त्म हुआ तो ख़ुशी के मारे घड़ी देखने का ध्यान ही नहीं
रहा। जब ध्यान आया तो अन्दाज़ लगाया कि दस मिनट पहले ही ख़त्म किया होगा।
पहली बार ज़िंदगी में तीन घंटे बैठ कर एक किताब पढ़ी थी, ख़ुद को बांधा था।
ख़ुद से कहा था, कहीं नहीं उठाना है, कहीं नहीं जाना है। आप लोगों को बता चुकी
हूँ, धैर्य की बहुत कमी है मुझमें। धीरज ज़िंदगी में मेरा साथ ही नहीं देता। इसलिए
कोशिश होती है कि फ़िल्में थियेटर में ही देखूँ। घर पर कोई फ़िल्म पूरी
नहीं देख पाती। कई बार बीच-बीच में उठ के चली जाती हूँ। कभी कुछ काम आ जाता है,
कभी फ़िल्म ही बोरिंग लगती है। थियेटर में ये सुविधा नहीं होती, पैसे लगे हैं,
पूरा देखना मजबूरी है। आज तक नहीं याद कि कोई कितनी भी उबाऊ या सर पकाऊँ फ़िल्म हो
थियेटर छोड़ कर गई हूँ और उसी तरह नहीं याद है कि कोई फ़िल्म टीवी या सीडी में घर
पर पूरी देखी हो। जो फ़िल्म लगा भी देखा है उसमें भी कई बार बीच-बीच में कई दृश्य बहुत
बार छोड़ा है और कहने के लिए फ़िल्म भी देख ली।
लेकिन मुझे तो किताब पर समीक्षा लिखनी है यानी अपने
विचार रखने हैं। क्या बात है! कुछ कुछ सिलेब्रिटी सी फ़ीलिंग आ रही है। वो बात और
है कभी तो कुछ ढंग से लिखा नहीं और चली हूँ दूसरों को बताने आपने कैसा लिखा है। पर
सब चलता है, कुछ-कुछ ज़िंदगी भी ऐसी ही है ना? जो प्रवचन देता है वो पालन कहाँ
करता है। प्रवचन देना कितना आसान है, पर उसे ज़िंदगी में अपनाना! कई बार असम्भव
होता है। पर बोलना है बोल दो। ‘कर्म किए जा फल की जिंता मत कर रे इंसान’ सब कहते
हैं। आज अगर तनख़्वाह न मिले तो कितने लोग नौकरी पर जाएँगे? मैं तो नहीं जाऊँगी। बिना
तनख़्वाह नौकरी करने से अच्छा है घर पर सोई रहूँ। पर राजीव जी देखिए ये काम बिना
तनख़्वाह के कर रही हूँ। पर यहाँ पर भी एक मतलब यानी फल छुपा हुआ है। क्या? अब हर
बात एक बार पर ही क्यूँ बताऊँ, इसपर कभी और।
आप कह सकते हैं ये ग़लत है, कई लोग बिना पैसा या कोई
तनख़्वाह लिए समज़िक सेवा करते हैं। बिलकुल सही, मानती हूँ पर फल वहाँ पर भी है।
कहीं नाम कमाना, कहीं आत्मसंतुष्टि, कहीं कोई प्रायश्चित, फल की कामना हर जगह दिख ही
जाती है अगर आप देखना जाहते हों तो। मोटिवेशन यानी अभिप्रेरणा (प्रेरणा सही शब्द
नहीं है) मतलब वजह पेश करना, किसी से काम करवाने का सबसे आसान ज़रिया है और पैसा उसमें
भी सबसे आसान फल। जितनी आसानी से पैसे दे कर काम होता है उतनी आसानी से कुछ भी नहीं
हो सकता। नहीं अर्थशास्त्र का कोई सिद्धांत नहीं समझाना है ज़िंदगी को ख़ुद ही समझ
रही हूँ।
अनीता कंट्रोल! मेरे ऑफ़िस के सिन्हा सर इसे मेरे ऊपर
बहुत इस्तमाल करते हैं। ‘वेल्कम’ फ़िल्म का ये डाइयलोग मेरे ऊपर सबसे ज़्यादा फ़िट
यानी उपयुक्त बैठता है। कुछ बोलना चाहती हूँ कुछ बोल जाती हूँ, कुछ लिखना चाहती
हूँ कुछ और लिख कर उठ जाती हूँ। हमेशा सोचती हूँ लिखने से पहले नोट्स बना लूँगी,
सोच कर लिखूँगी। पर जब लिखने बैठती हूँ तो लगता है क्यूँ समय बर्बाद करूँ, लिखा
देती हूँ। जितने समय में नोट्स बनाऊँगी कुछ पन्ने लिख ही लूँगी और वो ख़त्म न होने
जैसा होता ही चला जाता है। कोई बात नहीं, समीक्षा माँगी है तो कुछ तो झेलना ही
पड़ेगा राजीव जी।
हाँ तो जब मुँह से ‘वाउ’, निकला तो कुछ देर के लिए घर
में सब चौंक गए थे। मुझे अंदाज़ा नहीं था पर शायद वो कुछ अधिक ज़ोर से निकला था।
लगा पता नहीं क्या हासिल कर लिया है। शायद नील आर्मस्ट्रॉम को भी चाँद पर पहुँचने
पर इतनी ख़ुशी नहीं महसूस हुई हो जो मुझे हुआ था। मालूम नहीं बछेंद्री पाल ने
माउंट एवरिस्ट की चोटी पर पहुचने पे क्या महसूस किया होगा, पर मुझे लगा मैंने
दुनिया का सबसे बड़ा पहाड़ पार कर लिया है वो भी एक ही साँस में। सही में लगा जैसे
कुछ अजूबा हासिल कर लिया है, एक बहुत ही मुश्किल काम कर पाई थी। ज़िंदगी में पहली
किताब पूरी पढ़ी थी वो भी एक बार बैठ कर। सबके लिए अति साधारण बात होगी, पर मैं
जानती हूँ मैंने कितना बड़ा मुक़ाम हासिल किया है। अगर इंसान ख़ुद को पुरस्कृत कर
सकता तो ख़ुद को ‘शहनशाह-ए-धीरज से नवाजिश करती। मैंने ख़ुद के लिए असंभव को सम्भव
कर दिखाया था।
अब किताब पढ़ ही लिया तो समीक्षा तो लिखनी ही पड़ेगी
ना। कहा न, बहुत क्या कोई भी किताब ढंग से
नहीं पढ़ी है इसलिए समीक्षा लिखने में असमर्थ हूँ। पर विचार तो रख ही सकती हूँ सो
रख रही हूँ (अभी भी वही तो वही कर रही हूँ)। किताब पढ़ते हुए या फ़िल्मे देखते हुए
न चाहते हुए भी आप ख़ुद को भी वही कहीं देखते हैं या इतना तो सोचते हैं कि उस
परिस्थिति में आप भी हो सकते थे या होते तो क्या करते। किताब पढ़ते हुए कुछ जगह के
नाम के साथ कुछ अपनी यादें भी ताज़ा हो गई। पिताजी वायुसेना में थे इसलिए बहुत जगह
रही हूँ और वो समय भी याद है जब तीन दिन में रेल यात्रा पूरी की है। गोहाटी को
गुवाहाटी बनते देखा है, फ़ैन्सी बाज़ार में तो बहुत समय बिताया है। कुछ प्रवासियों
की परेशनियाँ भी राजीव जी ने अपनी कहानियों में बख़ूबी दर्शाया है। जब भी किसी नए
जगह पर जाओ अपनी भाषा, अपना खान-पान, अपना ही पहनावा बहुत याद आता है। फिर वो चाहे
बिहारी पंजाब में जायें या पंजाबी आसाम या भारतीय अमेरिका या अमेरिकन बांग्लादेश।
राजीव जी की कहानियों की सबसे अच्छी बात ये है कि
कहानी सही मायने में शॉर्ट यानी छोटी कहानियों का ही संकलन है। छोटी बोल कर कोई आप
पर लम्बी लम्बी कहानियाँ नहीं थोप रहा है। कहानी अपने में साधारण है वो आपको
अचम्भे में नहीं डालती, ये ख़ूबी भी मानी जा सकती है और कमी भी। कई बार हम कहनियों
में ट्विस्ट्स और टर्न्स यानी उतराव-चढ़ाव खोजते हैं। पर कई बार बहुत ज़्यादा भी
हो जाए तो दिमाग़ चकरा जाता है। क्या ज़िंदगी में इतना होता है? और अगर ख़ुद को
‘हाँ’ बोल भी दिया तो फिर सवाल निकलता है, एक ही इन्सान के साथ बार-बार भगवान ऐसा
नहीं कर सकता। राजीव जी ने चीज़ों को बहुत हल्के और साधारण तरीक़े से पेश किया है।
पर एक कहानी में वो चौकाने वाला मोड़ मुझे दिखा। नाम
है ‘द समझौता इक्स्प्रेस’, जहाँ एक बहन अपने भाई से मिलने के लिए पूरी ज़िंदगी
इंतज़ार करती है और वो मौक़ा भी उसे तब मिलता है जब उसके पिताजी गुज़र जाते हैं।
पर भाई के मिलते ही भाई का देहांत हो जाता है। ये कहानी मुझे चौंकती हैं, ये घटना
अचानक सी लगती है। सोचने का समय ही नहीं मिलता और जब तक सोचते हैं क्या हुआ, कहानी
ख़त्म। लगा इसे राजीव जी कुछ और अच्छी तरह प्रस्तुत कर सकते थे। पर कोशिश बहुत ही
अच्छी थी, ज़िंदगी को समझाने की, आज का महत्व बताने की, हर पल जीना ज़रूरी है, कल
कोई नहीं जानता पर कहना जितना आसान है अपनाना उतना ही मुश्किल है। हर कोई जानते
हुए कि मौत उसे आएगी सोचता है उसके मौत में अभी बहुत समय है। जैसे मेरे कुछ
पसंदीदा शब्द है राजीव जी के भी हैं flabbergast (फ़्लैबर्गैस्ट- भौंचक्का,
स्तम्भित), किटी पार्टी कुछ ऐसे शब्द हैं जिसका राजीव जी ने बहुत इस्तमाल किया है।
पर राजीव जी की कहानियों की सबसे बड़ी ख़ूबी उनकी
भाषा है। कई बार देखा है हिंदी बोलने वाले अंग्रेज़ी से ख़ौफ़ खाते हैं और उसका
कुछ कारण अंग्रेज़ी भी है। भारतियों में लगता है बोलचाल कि अंग्रेज़ी से कहीं
ज़्यादा शेक्सपीयर अंग्रेज़ी इस्तमाल करने का चलन है। कोई भी विद्वता दिखाने का
मौक़ा नहीं छोड़ता (मैं भी वही कर रही हूँ)। भाषा भी ख़ौफ़ बन कर आती है। भाषा तो
भाषा है, अंग्रेज़ी हो या हिंदी, मैथिली हो या पंजाबी, माहौल मिला और आप सीख गए।
मेरी दीदी की सोसाइटी में एक नौकरानी बहुत ही अच्छी अंग्रेज़ी बोलती है और लोग उसे
बहुत ही हैरान हो कर देखते हैं। भूल जाते हैं उसने अंग्रेज़ी जो एक भाषा है
अमेरिका में सीखी क्यूँकि उसके मकान मालिक उसे अमेरिका ले गए और उसे भाषा सिखने का
माहौल मिला। कई ऐसे मैथिली परिवार को जानती हूँ जो मद्रास में रहते हैं और परिवार
की बहूँयें भी फ़र्राटेदार तमिल बोलती हैं। माहौल मिला लोगों ने एक नई भाषा सीख
ली। पर हमारे देश भारत की एक बहुत बड़ी विडम्बना है, हमने अंग्रेज़ी को भाषा नहीं
ज्ञान मान लिया है। अंग्रेज़ी आए तो ज्ञानी नहीं तो अज्ञानी।
कई बार ट्वीटर पर ही देखा है हमारे अंग्रेज़ी के
विद्वान दूसरों के अंग्रेज़ी लिखने पर या ग़लतियों पर मज़ाक़ उड़ाते हैं। एक हमारे
हिंदी के महान पत्रकार ने भी एक बार लिखा था उन्हें अजीब लगता है जब वो आजकल के
युवा को ग़लत अंग्रेज़ी बोलते देखते हैं। मन तो किया था वहीं पर पूछ लेती, जो आज
शत प्रतिशत सही अंग्रेज़ी बोल रहे हैं उन्होंने क्या कभी भाषा ग़लत नहीं बोली थी?
बोली थी, अगर उनकी मातृभाषा हो तो भी। हमसब बचपन क्यूँ भूल जाते हैं जहाँ ग़लत बोल
कर ही हमने सही सीखा है। बच्चों का तो कोई उपहास नहीं करता। हाँ, कई बार हम लोग उन्हें
सुधारते ज़रूर हैं और बच्चें भी धीरे धीरे सही सुन कर ख़ुद को सुधार लेते हैं। इन
सब विद्वानों से एक निवेदन है अगर मौक़ा मिले तो उन्हें सुधारे उपहास के साथ नहीं,
उनके सम्मान का ध्यान रखते हुए। हर कोई भाषा का ज्ञानी नहीं हो सकता है। अगर आप
हैं तो कृपया दूसरों के लिए कुछ दे जाए, किसी को सिखाए, आप ने भी तो सीखा ही है
अपने माता-पिता से या गुरुओं से।
तो मेरे अंग्रेज़ी की चाहत रखने वाले हिंदी के
विद्वानों ग़लत अंग्रेज़ी बोलने से मत डरो। कोई तुम्हारा उपहास करे तो भी नहीं। हम
ग़लत बोल कर ही सही सिखते हैं। हाँ, कोई सुधारे तो ख़ुद को ज़रूर सुधारें। हम ग़लत
नहीं बोलेंगे तो सही भी नहीं जान पाएँगे। जब कोई अंग्रेज़ ग़लत अंग्रेज़ी बोलता है
चाहे कितना भी ग़लत क्यूँ न बोले हम कहा उपहास करते हैं, उल्टा प्रोत्साहित ही
करते हैं। हमें वो क्यूट यानी प्यारा भी लगता है। बस वैसे ही हमें भी अंग्रेज़ी जो
कि एक भाषा है सिखाना हैं, ग़लती कर के ही सीखेंगे और ज़रूरत हुआ तो अपनी ही
ग़लतियों पर ख़ूब हँसेंगे। कोई हमारा क्या उपहास करेगा, पहले ही बोल देंगे ग़लत
लिखा है और लिख रही हूँ और हाँ, जहाँ शब्द न मिले हिंदी शब्दों का इस्तमाल करे,
बिना डरे। अरे, हिंदी बोलते हुए हम गर्व से अंग्रेज़ी के शब्द ठूँस ठूँस के बोलते
हैं कि नहीं? वैसे ही अंग्रेज़ी बोलते समय हिंदी के शब्दों का इस्तमाल कर सकते
हैं, मैं तो बहुत करती हूँ। कोई भारतीय
होता है तो समझ जाता हैं और जो अंग्रेज़ होता है उसे भी फिर समझा देती हूँ, पर इस
बातचीत के दौरान उसे एक शब्द हिंदी का सीखा ही देती हूँ। वैसे भी जैसे अंग्रेज़ी
के बिलकुल उपयुक्त शब्द कई बार हिंदी में नहीं हैं, ठीक वैसे ही हिंदी के भी एकदम
उपयुक्त शब्द अंग्रेज़ी में बहुत बार नहीं मिलते। तो मेरे हिंदी के विद्वानों,
बेफ़िक्र हो कर ये अंग्रेज़ी की किताब उठाओ और पढ़ो। बहुत ही आसान है, अगर कुछ
मुश्किलें आयें तो शब्दकोश के मदद लो। देखना बहुत मज़ा आएगा जैसे मुझे आया, अच्छी
और छोटी छोटी कहानियाँ बहुत ही सरल भाषा में है।
राजीव जी, देखिए बहुत कम ही प्रवचन देने का मौक़ा
मिलता है, अपने दिया और मैंने इसका पूरा फ़ायदा उठा लिया। आपने हिंदी में लिखने को
कहाँ और मैंने हिंदी वालों के लिए भी लिख दिया। पर एक सच नहीं बोलूँगी तो ये
समीक्षा अधूरी रह जाएगी। आपकी कहानियाँ पढ़ते समय एक बात जो मुझे कई जगह खली और
जहाँ मैं बहुत अटकी भी वो थी आपका पत्नी प्रेम। लगा कि आप भी कहीं न कहीं ये मानते
हैं कि पत्नियाँ बहुत ही खर्चीली होती है और पार्टी की शौक़ीन भी। सोशल मीडिया पर
पत्नियों के बढ़ते जोक्स कई बार सही में ग़ुस्सा दिलाते हैं पर लगता है ज़िंदगी
में कुछ चीज़ें हँसने के लिए भी होती हैं हंस लेना चाहिए, हर जगह ज्ञान बाँटना ठीक
नहीं है। अब आप ये मत कहिएगा की कहानी है, ट्वीटर पर ये आप कह चुके हैं। कहानियाँ
भी यथार्थ से ही बनती हैं और वो कहीं न कहीं लिखने वालों की भी सोच होती है। मन
करता है लम्बा प्रवचन दूँ, दे भी सकती हूँ पर कभी और महिला सशक्तिकरण पर लिखूँगी।
अभी तो लग रहा है यही लम्बा हो गया है और अब ख़त्म करना ज़रूरी है।
पर आप सब पढ़ने वालों से इतना ज़रूर कहना चाहती हूँ,
छोटी छोटी अच्छी कहानियाँ हैं, किसी व्यक्ति ने पहली बार लिखी है। बहुत ही
ख़ूबसूरत प्रयास है राजीव जी आपका। ज़िंदगी की छोटी छोटी स्मृतियों को जोड़ने की,
उन्हें संजोने की। आपको ज़िंदगी ने वक़्त दिया है आपकी रीटायरमेंट के बाद का समय।
भगवान से प्रार्थना है आप ख़ूब लिखें, किसी और से ज़्यादा ख़ुद के लिए। अगर आपको
लिखने में आनंद आता है तो इससे बड़ा कोई पुरस्कार नहीं हो सकता। कुछ कुछ एहसाह भी
कर सकती हूँ उस ख़ुशी का जब आपने पहली बार किताब को किताब के रूप में देखा होगा।
बस उन सुनहरी यादों को संजोईये। ज़िंदगी इन्हीं ख़ूबसूरत यादों से बनी हैं। एक बार
पुनः बधाई आपके बहुत ही सुंदर प्रयास और एक सुंदर किताब को।
