Thursday, 26 January 2017

किताब के बहाने-भाग २

वाउ(Wow), गॉश(Gosh), सीरीयस्ली(seriously), ये कुछ ऐसे शब्द हैं जो न चाहते हुए भी मैं बहुत इस्तमाल करती हूँ, लिखने और बोलने दोनों में। चाहती हूँ कि ये आदत छूट जाए पर आदतें भी मेरी तरह ही ढ़िट है। कम हुई है पर ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती। तीन दिन पहले जब मैंने राजीव बक्शी जी की किताब ‘जर्नी फ़्रम गुवाहाटी तो माछीवाड़ा’ ख़त्म किया तो मुँह से अनायास ही ख़ूब ज़ोर से निकल पड़ा ‘वाउ’। उत्साह में, ख़ुशी के मारे, बिना सोचे। किताब पढ़ा सो पढ़ा, वो भी एक सिटिंग यानी एक बार बैठी और किताब पूरी ख़त्म कर के ही उठी। मन में एक डर था अगर बीच में छोड़ दिया तो शायद पूरी नहीं कर पाऊँगी। पढ़ने बैठी तो समय देखा था और बीच बीच में घड़ी पर नज़र पड़ ही जाती थी। पर जब ख़त्म हुआ तो ख़ुशी के मारे घड़ी देखने का ध्यान ही नहीं रहा। जब ध्यान आया तो अन्दाज़ लगाया कि दस मिनट पहले ही ख़त्म किया होगा।

पहली बार ज़िंदगी में तीन घंटे बैठ कर एक किताब पढ़ी थी, ख़ुद को बांधा था। ख़ुद से कहा था, कहीं नहीं उठाना है, कहीं नहीं जाना है। आप लोगों को बता चुकी हूँ, धैर्य की बहुत कमी है मुझमें। धीरज ज़िंदगी में मेरा साथ ही नहीं देता। इसलिए कोशिश होती है कि फ़िल्में थियेटर में ही देखूँ। घर पर कोई फ़िल्म पूरी नहीं देख पाती। कई बार बीच-बीच में उठ के चली जाती हूँ। कभी कुछ काम आ जाता है, कभी फ़िल्म ही बोरिंग लगती है। थियेटर में ये सुविधा नहीं होती, पैसे लगे हैं, पूरा देखना मजबूरी है। आज तक नहीं याद कि कोई कितनी भी उबाऊ या सर पकाऊँ फ़िल्म हो थियेटर छोड़ कर गई हूँ और उसी तरह नहीं याद है कि कोई फ़िल्म टीवी या सीडी में घर पर पूरी देखी हो। जो फ़िल्म लगा भी देखा है उसमें भी कई बार बीच-बीच में कई दृश्य बहुत बार छोड़ा है और कहने के लिए फ़िल्म भी देख ली।

लेकिन मुझे तो किताब पर समीक्षा लिखनी है यानी अपने विचार रखने हैं। क्या बात है! कुछ कुछ सिलेब्रिटी सी फ़ीलिंग आ रही है। वो बात और है कभी तो कुछ ढंग से लिखा नहीं और चली हूँ दूसरों को बताने आपने कैसा लिखा है। पर सब चलता है, कुछ-कुछ ज़िंदगी भी ऐसी ही है ना? जो प्रवचन देता है वो पालन कहाँ करता है। प्रवचन देना कितना आसान है, पर उसे ज़िंदगी में अपनाना! कई बार असम्भव होता है। पर बोलना है बोल दो। ‘कर्म किए जा फल की जिंता मत कर रे इंसान’ सब कहते हैं। आज अगर तनख़्वाह न मिले तो कितने लोग नौकरी पर जाएँगे? मैं तो नहीं जाऊँगी। बिना तनख़्वाह नौकरी करने से अच्छा है घर पर सोई रहूँ। पर राजीव जी देखिए ये काम बिना तनख़्वाह के कर रही हूँ। पर यहाँ पर भी एक मतलब यानी फल छुपा हुआ है। क्या? अब हर बात एक बार पर ही क्यूँ बताऊँ, इसपर कभी और।

आप कह सकते हैं ये ग़लत है, कई लोग बिना पैसा या कोई तनख़्वाह लिए समज़िक सेवा करते हैं। बिलकुल सही, मानती हूँ पर फल वहाँ पर भी है। कहीं नाम कमाना, कहीं आत्मसंतुष्टि, कहीं कोई प्रायश्चित, फल की कामना हर जगह दिख ही जाती है अगर आप देखना जाहते हों तो। मोटिवेशन यानी अभिप्रेरणा (प्रेरणा सही शब्द नहीं है) मतलब वजह पेश करना, किसी से काम करवाने का सबसे आसान ज़रिया है और पैसा उसमें भी सबसे आसान फल। जितनी आसानी से पैसे दे कर काम होता है उतनी आसानी से कुछ भी नहीं हो सकता। नहीं अर्थशास्त्र का कोई सिद्धांत नहीं समझाना है ज़िंदगी को ख़ुद ही समझ रही हूँ।

अनीता कंट्रोल! मेरे ऑफ़िस के सिन्हा सर इसे मेरे ऊपर बहुत इस्तमाल करते हैं। ‘वेल्कम’ फ़िल्म का ये डाइयलोग मेरे ऊपर सबसे ज़्यादा फ़िट यानी उपयुक्त बैठता है। कुछ बोलना चाहती हूँ कुछ बोल जाती हूँ, कुछ लिखना चाहती हूँ कुछ और लिख कर उठ जाती हूँ। हमेशा सोचती हूँ लिखने से पहले नोट्स बना लूँगी, सोच कर लिखूँगी। पर जब लिखने बैठती हूँ तो लगता है क्यूँ समय बर्बाद करूँ, लिखा देती हूँ। जितने समय में नोट्स बनाऊँगी कुछ पन्ने लिख ही लूँगी और वो ख़त्म न होने जैसा होता ही चला जाता है। कोई बात नहीं, समीक्षा माँगी है तो कुछ तो झेलना ही पड़ेगा राजीव जी।

हाँ तो जब मुँह से ‘वाउ’, निकला तो कुछ देर के लिए घर में सब चौंक गए थे। मुझे अंदाज़ा नहीं था पर शायद वो कुछ अधिक ज़ोर से निकला था। लगा पता नहीं क्या हासिल कर लिया है। शायद नील आर्मस्ट्रॉम को भी चाँद पर पहुँचने पर इतनी ख़ुशी नहीं महसूस हुई हो जो मुझे हुआ था। मालूम नहीं बछेंद्री पाल ने माउंट एवरिस्ट की चोटी पर पहुचने पे क्या महसूस किया होगा, पर मुझे लगा मैंने दुनिया का सबसे बड़ा पहाड़ पार कर लिया है वो भी एक ही साँस में। सही में लगा जैसे कुछ अजूबा हासिल कर लिया है, एक बहुत ही मुश्किल काम कर पाई थी। ज़िंदगी में पहली किताब पूरी पढ़ी थी वो भी एक बार बैठ कर। सबके लिए अति साधारण बात होगी, पर मैं जानती हूँ मैंने कितना बड़ा मुक़ाम हासिल किया है। अगर इंसान ख़ुद को पुरस्कृत कर सकता तो ख़ुद को ‘शहनशाह-ए-धीरज से नवाजिश करती। मैंने ख़ुद के लिए असंभव को सम्भव कर दिखाया था।

अब किताब पढ़ ही लिया तो समीक्षा तो लिखनी ही पड़ेगी ना। कहा न, बहुत क्या कोई भी किताब ढंग से नहीं पढ़ी है इसलिए समीक्षा लिखने में असमर्थ हूँ। पर विचार तो रख ही सकती हूँ सो रख रही हूँ (अभी भी वही तो वही कर रही हूँ)। किताब पढ़ते हुए या फ़िल्मे देखते हुए न चाहते हुए भी आप ख़ुद को भी वही कहीं देखते हैं या इतना तो सोचते हैं कि उस परिस्थिति में आप भी हो सकते थे या होते तो क्या करते। किताब पढ़ते हुए कुछ जगह के नाम के साथ कुछ अपनी यादें भी ताज़ा हो गई। पिताजी वायुसेना में थे इसलिए बहुत जगह रही हूँ और वो समय भी याद है जब तीन दिन में रेल यात्रा पूरी की है। गोहाटी को गुवाहाटी बनते देखा है, फ़ैन्सी बाज़ार में तो बहुत समय बिताया है। कुछ प्रवासियों की परेशनियाँ भी राजीव जी ने अपनी कहानियों में बख़ूबी दर्शाया है। जब भी किसी नए जगह पर जाओ अपनी भाषा, अपना खान-पान, अपना ही पहनावा बहुत याद आता है। फिर वो चाहे बिहारी पंजाब में जायें या पंजाबी आसाम या भारतीय अमेरिका या अमेरिकन बांग्लादेश।

राजीव जी की कहानियों की सबसे अच्छी बात ये है कि कहानी सही मायने में शॉर्ट यानी छोटी कहानियों का ही संकलन है। छोटी बोल कर कोई आप पर लम्बी लम्बी कहानियाँ नहीं थोप रहा है। कहानी अपने में साधारण है वो आपको अचम्भे में नहीं डालती, ये ख़ूबी भी मानी जा सकती है और कमी भी। कई बार हम कहनियों में ट्विस्ट्स और टर्न्स यानी उतराव-चढ़ाव खोजते हैं। पर कई बार बहुत ज़्यादा भी हो जाए तो दिमाग़ चकरा जाता है। क्या ज़िंदगी में इतना होता है? और अगर ख़ुद को ‘हाँ’ बोल भी दिया तो फिर सवाल निकलता है, एक ही इन्सान के साथ बार-बार भगवान ऐसा नहीं कर सकता। राजीव जी ने चीज़ों को बहुत हल्के और साधारण तरीक़े से पेश किया है।

पर एक कहानी में वो चौकाने वाला मोड़ मुझे दिखा। नाम है ‘द समझौता इक्स्प्रेस’, जहाँ एक बहन अपने भाई से मिलने के लिए पूरी ज़िंदगी इंतज़ार करती है और वो मौक़ा भी उसे तब मिलता है जब उसके पिताजी गुज़र जाते हैं। पर भाई के मिलते ही भाई का देहांत हो जाता है। ये कहानी मुझे चौंकती हैं, ये घटना अचानक सी लगती है। सोचने का समय ही नहीं मिलता और जब तक सोचते हैं क्या हुआ, कहानी ख़त्म। लगा इसे राजीव जी कुछ और अच्छी तरह प्रस्तुत कर सकते थे। पर कोशिश बहुत ही अच्छी थी, ज़िंदगी को समझाने की, आज का महत्व बताने की, हर पल जीना ज़रूरी है, कल कोई नहीं जानता पर कहना जितना आसान है अपनाना उतना ही मुश्किल है। हर कोई जानते हुए कि मौत उसे आएगी सोचता है उसके मौत में अभी बहुत समय है। जैसे मेरे कुछ पसंदीदा शब्द है राजीव जी के भी हैं flabbergast (फ़्लैबर्गैस्ट- भौंचक्का, स्तम्भित), किटी पार्टी कुछ ऐसे शब्द हैं जिसका राजीव जी ने बहुत इस्तमाल किया है।

पर राजीव जी की कहानियों की सबसे बड़ी ख़ूबी उनकी भाषा है। कई बार देखा है हिंदी बोलने वाले अंग्रेज़ी से ख़ौफ़ खाते हैं और उसका कुछ कारण अंग्रेज़ी भी है। भारतियों में लगता है बोलचाल कि अंग्रेज़ी से कहीं ज़्यादा शेक्सपीयर अंग्रेज़ी इस्तमाल करने का चलन है। कोई भी विद्वता दिखाने का मौक़ा नहीं छोड़ता (मैं भी वही कर रही हूँ)। भाषा भी ख़ौफ़ बन कर आती है। भाषा तो भाषा है, अंग्रेज़ी हो या हिंदी, मैथिली हो या पंजाबी, माहौल मिला और आप सीख गए। मेरी दीदी की सोसाइटी में एक नौकरानी बहुत ही अच्छी अंग्रेज़ी बोलती है और लोग उसे बहुत ही हैरान हो कर देखते हैं। भूल जाते हैं उसने अंग्रेज़ी जो एक भाषा है अमेरिका में सीखी क्यूँकि उसके मकान मालिक उसे अमेरिका ले गए और उसे भाषा सिखने का माहौल मिला। कई ऐसे मैथिली परिवार को जानती हूँ जो मद्रास में रहते हैं और परिवार की बहूँयें भी फ़र्राटेदार तमिल बोलती हैं। माहौल मिला लोगों ने एक नई भाषा सीख ली। पर हमारे देश भारत की एक बहुत बड़ी विडम्बना है, हमने अंग्रेज़ी को भाषा नहीं ज्ञान मान लिया है। अंग्रेज़ी आए तो ज्ञानी नहीं तो अज्ञानी।

कई बार ट्वीटर पर ही देखा है हमारे अंग्रेज़ी के विद्वान दूसरों के अंग्रेज़ी लिखने पर या ग़लतियों पर मज़ाक़ उड़ाते हैं। एक हमारे हिंदी के महान पत्रकार ने भी एक बार लिखा था उन्हें अजीब लगता है जब वो आजकल के युवा को ग़लत अंग्रेज़ी बोलते देखते हैं। मन तो किया था वहीं पर पूछ लेती, जो आज शत प्रतिशत सही अंग्रेज़ी बोल रहे हैं उन्होंने क्या कभी भाषा ग़लत नहीं बोली थी? बोली थी, अगर उनकी मातृभाषा हो तो भी। हमसब बचपन क्यूँ भूल जाते हैं जहाँ ग़लत बोल कर ही हमने सही सीखा है। बच्चों का तो कोई उपहास नहीं करता। हाँ, कई बार हम लोग उन्हें सुधारते ज़रूर हैं और बच्चें भी धीरे धीरे सही सुन कर ख़ुद को सुधार लेते हैं। इन सब विद्वानों से एक निवेदन है अगर मौक़ा मिले तो उन्हें सुधारे उपहास के साथ नहीं, उनके सम्मान का ध्यान रखते हुए। हर कोई भाषा का ज्ञानी नहीं हो सकता है। अगर आप हैं तो कृपया दूसरों के लिए कुछ दे जाए, किसी को सिखाए, आप ने भी तो सीखा ही है अपने माता-पिता से या गुरुओं से।

तो मेरे अंग्रेज़ी की चाहत रखने वाले हिंदी के विद्वानों ग़लत अंग्रेज़ी बोलने से मत डरो। कोई तुम्हारा उपहास करे तो भी नहीं। हम ग़लत बोल कर ही सही सिखते हैं। हाँ, कोई सुधारे तो ख़ुद को ज़रूर सुधारें। हम ग़लत नहीं बोलेंगे तो सही भी नहीं जान पाएँगे। जब कोई अंग्रेज़ ग़लत अंग्रेज़ी बोलता है चाहे कितना भी ग़लत क्यूँ न बोले हम कहा उपहास करते हैं, उल्टा प्रोत्साहित ही करते हैं। हमें वो क्यूट यानी प्यारा भी लगता है। बस वैसे ही हमें भी अंग्रेज़ी जो कि एक भाषा है सिखाना हैं, ग़लती कर के ही सीखेंगे और ज़रूरत हुआ तो अपनी ही ग़लतियों पर ख़ूब हँसेंगे। कोई हमारा क्या उपहास करेगा, पहले ही बोल देंगे ग़लत लिखा है और लिख रही हूँ और हाँ, जहाँ शब्द न मिले हिंदी शब्दों का इस्तमाल करे, बिना डरे। अरे, हिंदी बोलते हुए हम गर्व से अंग्रेज़ी के शब्द ठूँस ठूँस के बोलते हैं कि नहीं? वैसे ही अंग्रेज़ी बोलते समय हिंदी के शब्दों का इस्तमाल कर सकते हैं, मैं तो बहुत करती हूँ।  कोई भारतीय होता है तो समझ जाता हैं और जो अंग्रेज़ होता है उसे भी फिर समझा देती हूँ, पर इस बातचीत के दौरान उसे एक शब्द हिंदी का सीखा ही देती हूँ। वैसे भी जैसे अंग्रेज़ी के बिलकुल उपयुक्त शब्द कई बार हिंदी में नहीं हैं, ठीक वैसे ही हिंदी के भी एकदम उपयुक्त शब्द अंग्रेज़ी में बहुत बार नहीं मिलते। तो मेरे हिंदी के विद्वानों, बेफ़िक्र हो कर ये अंग्रेज़ी की किताब उठाओ और पढ़ो। बहुत ही आसान है, अगर कुछ मुश्किलें आयें तो शब्दकोश के मदद लो। देखना बहुत मज़ा आएगा जैसे मुझे आया, अच्छी और छोटी छोटी कहानियाँ बहुत ही सरल भाषा में है।

राजीव जी, देखिए बहुत कम ही प्रवचन देने का मौक़ा मिलता है, अपने दिया और मैंने इसका पूरा फ़ायदा उठा लिया। आपने हिंदी में लिखने को कहाँ और मैंने हिंदी वालों के लिए भी लिख दिया। पर एक सच नहीं बोलूँगी तो ये समीक्षा अधूरी रह जाएगी। आपकी कहानियाँ पढ़ते समय एक बात जो मुझे कई जगह खली और जहाँ मैं बहुत अटकी भी वो थी आपका पत्नी प्रेम। लगा कि आप भी कहीं न कहीं ये मानते हैं कि पत्नियाँ बहुत ही खर्चीली होती है और पार्टी की शौक़ीन भी। सोशल मीडिया पर पत्नियों के बढ़ते जोक्स कई बार सही में ग़ुस्सा दिलाते हैं पर लगता है ज़िंदगी में कुछ चीज़ें हँसने के लिए भी होती हैं हंस लेना चाहिए, हर जगह ज्ञान बाँटना ठीक नहीं है। अब आप ये मत कहिएगा की कहानी है, ट्वीटर पर ये आप कह चुके हैं। कहानियाँ भी यथार्थ से ही बनती हैं और वो कहीं न कहीं लिखने वालों की भी सोच होती है। मन करता है लम्बा प्रवचन दूँ, दे भी सकती हूँ पर कभी और महिला सशक्तिकरण पर लिखूँगी। अभी तो लग रहा है यही लम्बा हो गया है और अब ख़त्म करना ज़रूरी है।

पर आप सब पढ़ने वालों से इतना ज़रूर कहना चाहती हूँ, छोटी छोटी अच्छी कहानियाँ हैं, किसी व्यक्ति ने पहली बार लिखी है। बहुत ही ख़ूबसूरत प्रयास है राजीव जी आपका। ज़िंदगी की छोटी छोटी स्मृतियों को जोड़ने की, उन्हें संजोने की। आपको ज़िंदगी ने वक़्त दिया है आपकी रीटायरमेंट के बाद का समय। भगवान से प्रार्थना है आप ख़ूब लिखें, किसी और से ज़्यादा ख़ुद के लिए। अगर आपको लिखने में आनंद आता है तो इससे बड़ा कोई पुरस्कार नहीं हो सकता। कुछ कुछ एहसाह भी कर सकती हूँ उस ख़ुशी का जब आपने पहली बार किताब को किताब के रूप में देखा होगा। बस उन सुनहरी यादों को संजोईये। ज़िंदगी इन्हीं ख़ूबसूरत यादों से बनी हैं। एक बार पुनः बधाई आपके बहुत ही सुंदर प्रयास और एक सुंदर किताब को।


Tuesday, 24 January 2017

That Scene


A person was standing in front of me

With his shirt torn and nothing within

He had a very pitiable face

This made everyone gaze

He had rupees twenty in his hand

With which he was standing there

Along with a child of four years

Who too, had a worn-out wear

He was there in front of the school

Asking the principal for her boon

He wanted his child’s admission

In her school with her permission

The school’s total fee was rupee nine hundred

With which he was unable to be burdened

The principal had this argument

For not taking the child in school’s enrollment

The scene made me cry horribly

And made me think of my career properly

That was the day I decided

I should do some social service

And give small smile to that person

Who doesn’t have it due to some reason




Monday, 23 January 2017

तमाशा ही तो मक़सद था बाक़ी हर बात हो गई

तमाशा ही तो मक़सद था बाक़ी हर बात हो गई
उस अँधेरी रात के साथ हर बात ख़ुद में खो गई

वो जो चीख़ते थे दूसरों की नाकामियों पर
एक हार से उनकी आवाज़ किस क़दर सो गई

तमाशा देखने की ख़्वाहिशें हर वक़्त ख़ुद में सजोयें
ख़ुद की ज़िंदगी के तमाशे से ये बात भी पूरी हो गई

ये आँधी हमने ख़ुद ही तो है बनाई
क्या गिला बारिश हमारे घर को डुबो गई

तमाशा से ऊपर उठने की है अब तमन्ना
ज़िंदगी की मासूमियत तमाशे में खो गई




सलीक़े से सज़ा मेरा घर पर दीवारों पर नमी हैं

सलीक़े से सज़ा मेरा घर पर दीवारों पर नमी हैं
अक़्ल के बाज़ार में जज़्बातों की कितनी कमी है

हर तरफ़ बिखरे लफ़्ज़ों के इस जहाँ में
एहसासो पर शब्दों की कितनी बेबसी है

हर पल बढ़ते इंसानों की भीड़ में
इंसानियत कितनी सहमी खड़ी है

अंत सबका कब सिर्फ़ बुरा ही हुआ है
डूबते सूरज की ख़ूबसूरती बढ़ चली है

कोई कितना भी ख़ुद को बहला ले वादो में डाले
हमने जाना ज़िंदगी हर मोड़ पर अकेले ही बढ़ी है


Wednesday, 18 January 2017

नदी

नदी अपने जीने के लिए अपना रास्ता खुद निकालती है 
खुद के लिए किनारे भी देखिये वो खुद ही तो संवारती है

आसमान से उसे कब कहाँ कोई भी है उम्मीद 
पर आसमान की छवि को भी वो खुद में निखारती है

वो मनमौजी मनचली अपनी राह पर ही तो चली 
मंज़िल के लिए कब वो पैर घर से बहार निकालती है 

ज़मी की उम्मीद में बहती हुई उसकी ज़िन्दगी 
पर राह में कुछ जिंदगियां भी तो वो संवारती है 

बदलना समय के अनुरूप कोई नदी से सीखे 
हर क्षण उसी जगह वो खुद को बदल डालती है 

अजीब सी है उसके अपनाने और भरने की प्यास 
कितनी भी भरी हो, खुद को और भर देना चाहती है

उसके संकल्प और दृढ़ता की क्या कोई बात करे 
अपनी जिद्द से वो राह के चट्टानों को भी तोड़ डालती है 

पर इस नकचढ़ी के साथ चलो तो इसे मंज़ूर 
विपरीत दिशा में चलने से ये भी अड़चने डालती है 

खुद की तलाश में वो खुद भी तो है परेशान
पर ज़रूरतों के लिए ये कई बार खुद को मारती है

घर छोड़ने पर वापस आना कहाँ सम्भव हुआ है 
ये विचार भी तो हममें एक बार ये ज़रूर डालती है 

पहाड़ों से उतरी, कुछ प्यासी, कुछ व्याकुल सी
कैसे सागर से मिलते ही स्थिर सागर सी बन जाती है   



Saturday, 14 January 2017

रानी

हर एक की ज़िंदगी में अनगिनत कहानियाँ होगी और अनगिनत कहानियों में हम सब ऐसे पात्र भी जिसे लगा लोग समझ नहीं पायें या हम समझा नहीं पाये। अगर कुछ समझे भी तो सही रूप में तो नहीं ही समझे। मेरी भी ज़िन्दगी हर इंसान की ज़िंदगी की तरह कहानियों से भरी  पड़ी है। कहानी का ही तो एक नाम संस्मरण भी है। कभी हम कहानी में संस्मरण खोजते हैं और कभी संस्मरण को ही कहानी का नाम दे देते हैं। आज पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो सब एक किताबी कहानी सी लगती है। पर वो कहानी जहाँ पात्रों को दूर से नहीं देखा था, पात्रों को जीया है।

सोचा अब ब्लॉग पर समय निकाल कुछ संस्मरण भी लिखना शुरू ही कर दूँ।  किसी और के लिए नहीं ख़ुद के लिए, ख़ुद के लिए ही, ताकि ख़ुद को याद दिला सकूँ कि मैं भी कभी चीज़ों को कितना ग़लत लेती और समझती थीं। कोशिश होगी छोटे-छोटे भागों में लिखू, उन छोटी-छोटी घटनाओं  को वैसे ही प्रस्तुत करूँ। पर पहला संस्मरण कितना भी छोटा लिखूँगी वो कुछ बड़ा होगा ही। कुछ समझाना होगा, जैसे ख़ुद नहीं समझती थी यक़ीं है बहुत होंगे जो नहीं समझते होंगे।

‘रानी’ इस शब्द के साथ  सबके अपने अपने रिश्ते होंगे और जिसका कोई रिश्ता भी ना हो, उसे भी इसका मतलब तो पता ही होगापर शब्द भी माहौल और स्थान के अनुरूप मतलब बदलता है। एक समय था इस शब्द से मुझे चिढ़ थी। लगता रानी यानी महारानी, पर अब इस शब्द के साथ एक श्रद्धा है। किसी का अत्यधिक प्यार-दुलार छुपा है। जैसे ही ये नाम या शब्द किसी से सुनती हूँ किसी के बेइंतिहा प्यार की याद आती है।

जब शादी के बाद ससुराल पहुँची तो हर तरफ़ से एक ही शब्द कान में पड़ता था  ‘कनियाँ मिथिला (मिथिला उत्तर बिहार का वो भाग है जहाँ मैथिली बोली जाती है)  में नई नवेली दुल्हन को कनियाँ ही बोलते हैं। पर दुल्हन यानी घर की बहू पुरानी भी हो जाए तो भी अपने से बड़ों के लिए कनियाँ ही रह जाती है। कनियाँ खाना खलथिन (कनियाँ ने खाना खाया), कनियाँ के माँ के फ़ोन आयल छैय (कनियाँ की माँ का फ़ोन आया), कनियाँ के पास के छैय (कनियाँ के पास कौन है), कनियाँ! कनियाँ! अचानक एक नया माहौल और नाम भी सिर्फ़ पतिदेव लेते थे। किसी की काकी थी, किसी की मामी, किसी की भाभी और बाक़ी सबके लिए कनियाँ। लगा अचानक इतनी बड़ी कैसे हो गई हूँ? मायके में तो बस दीदी या अनिता थी। पर बहुत जल्दी ही मुझे कनियाँ समझ गया और कनियाँ ख़ुद को मान भी लिया।

शादी के कुछ ही दिनों बात छोटी ननद ने मेरी सास से पूछा, 'माँ कनियाँ के नाम की रखले छैय (माँ कनियाँ का क्या नाम रखा है)?'  नाम! चौक गई।  नाम है न मेरा अनिता, हाँ डैडी ‘अनु बेटा’ बुलाते हैं,। याद नहीं कभी उन्होंने सिर्फ़ अनु बोला होगा, अनिता ध्यान है कई बार बोला था। पर नाम की क्या ज़रूरत! अभी सवाल ज़हन में गूँज ही रहा था, कि सास की आवाज़ सुनाई दी ‘रानी’। बिना समय गँवायें तपाक से सास का जबाब था मेरी छोटी ननद को । ननद ने भी कह दिया, 'नीक नाम छैय (अच्छा नाम है)'। घर में सब मैथिली बोलते थे मैथिली तब मुझे बोलनी नहीं आती  थी और बड़ों की कोशिश होती मैं मैथिली ही बोलूँ। कुछ माहौल का कारण और कुछ अपनी मैथिली के कारण बड़ों से जल्दी बात नहीं करती। मेरे नए घर के संगी-साथी सब बच्चें ही थे। सबसे बेधड़क बात करती और ज़रूरतें भी उन्हीं से पूरी होती। पर तब तक छोटी ननद से बातचीत का सिलसिला कुछ बन गया था वैसे भी वो थी जो बार बार आ कर बताती, क्या करना है। मिथिला के विधि-विधान मुझे बताने, सिखाने और समझाने में हमेशा लगी रहती थी।

हर वो रीति-रिवाज जो ससुराल में मिथिला में किए जाते हैं मुझसे भी करवाये गए और छोटी दीदी यानी मेरी छोटी ननद ही मुझे वो सब बताती। तो बिना सोचे या ये कहिए बिना दिमाग़ लगाए ही उस समय मैंने भी छोटी दीदी से पूछ ही लिया, दीदी नाम क्यूँ? मेरा नाम क्यूँ नया होगा? ननद कुछ बोलती उससे पहले सास का जबाब आ गया, ‘एकरा इहों नहीं बुझल छैय (इसे अब ये भी नहीं मालूम है)’। ससुराल में अब तक सब मान चुके थे कि मुझे मिथिला के रीति-रिवाज ज़्यादा मालूम नहीं थे। अपनी हरकतों और बातों से मैंने अपनी अज्ञानता लोगों तक पहुँचा दी थी। ननद ने समझाया मायके का नाम ससुराल में नहीं लिया जाता, ससुराल में लोग दूसरे नामों से बुलाते हैं। मन में सोचा कितने नामों से, नाम तो वैसे भी कोई कहाँ लेता है। तरस गई हूँ कोई अनिता बुलाए, ‘अनु बेटा’ का तो सवाल ही नहीं उठता।

पर सास का रानी और वो भी कुछ ऊँचे स्वर में बोलना कुछ खटक गया था। ऊपर से शादी से पहले कई रिश्तेदारों को बोलते सुना था। अनिता के सास पूरा मिथलाँग छथि (अनिता की सास पूरी मिथिला के  नियमों वाली है; मिथलाँग, अजीब होते हैं कुछ शब्द, मिथिला के ही लोग ख़ुद के लोगों के लिए इसे प्रयोग में लाते हैं, मतलब कि  मीन-मेख से नियम पालन करने वाले); अरे, मधुबनियाँ सब अहने होई छैय (अरे मधुबनी के लोग ऐसे ही होते है)। मम्मी को भी एक बार दुखी होकर बोलते हुए सुना था, अनिता हर रीति-रिवाज से भगाती थी उसी के सर सब पड़ गया है। दीदी की शादी भी मिथिला वाले से ही हुई थी, पर हर चीज़ शॉर्ट-कट में, दीदी की चौठारी भी ससुराल में हुई थी (मिथिला की शादी बहुत लम्बी होती है, बिना चौथे दिन के जिसे चौठारी बोलते हैं शादी पूरी नहीं होती)।

मेरी विदाई के शायद पाँचवें ही दिन मेरे ससुराल में पूजा रखा गया था। मम्मी भी आई थी। मुझे कुछ असामान्य नहीं लगा, पर बाद में छोटी बहन का फ़ोन आया था, मम्मी पूरी रात रो रही थी, उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अनिता घूँघट कर सकती है। पूजा पर भगवान के सामने घूँघट में गई थी। जेठ, ससुर सब सामने थे, मुझे रिश्ते समझा दिए गए थे, और हर रिश्तें के साथ कुछ नियम लागू थे। हर रिश्ता अपने डूज़ एंड डोंट (do’s and don’t) यानी ‘क्या करें और क्या नहीं करें’ साथ ले आया था। कोशिश हो रही थी चीज़ों को समझने की। पर परेशानी तो होती थी साड़ी पहने की आदत नहीं थी, पर लोग कहते बहुत अच्छी तरह संभाल लेती हो। कैसे बताती की इन साड़ियों में एक दर्जन पिन लगे हैं। लोग लम्बा घूँघट खींच देते और मैं उसे माथे तक किसी ना किसी हरकत से ले आती।

पर सबसे अजीब लगता जब कोई मुझे देखने आता और मेरा लम्बा घूँघट कर दिया जाता और फिर उसके सामने घूँघट हटा उसे मेरी शक्ल दिखाई जाती और उस समय मुझे आँख बंद करना होता। लगता नई तो मैं हूँ इस घर में, मुझे लोगों से परिचय करवाना चाहिए, आँखें मुझे खोलनी चाहिए उल्टा मुझे ही आँखे बंद करने को कहा जा रहा है। छोटी दीदी को एक बार बोला भी, 'दीदी मेरा भी मन करता है देखूँ कौन मुझे देखने आया है, आँखे खोलने का मन करता है।' दीदी ने ये बात घरभर में सबको बोल दी। हर किसी के मज़ाक़ का विषय बन गई थी मेरी वो उत्सुकता। उस दिन से दीदी से बात करते हुए कुछ सावधान हो गई, मालूम नहीं मेरी कौन सी बात फिर मज़ाक़ बन जाए। पर कई बार जब आभास होता लोग निकल रहे हैं उससे पहले ही आँखे खोल लेती, लगता देखूँ तो सही कौन था जो मुझे देख ये कमेंट कर के गई या गया। अजीब-अजीब कमेंट होते मेरी सूरत पे। अरे दोनों भौ के बीच ये कटा हुआ क्या है! माँ बताती, हाँ बचपन में स्कूल में गिर गई थी, उसी का दाग़ है। मन में सोचती शुक्र है घुटने नहीं दिखाने पड़े, बचपन में बहुत शरारत करती थी, बहुत साइकल चलाया है, उससे गिरी हूँ, नानी गाँव में पेड़ों पर ख़ूब चढ़ती थी और बहुत गिरी हूँ। स्कूल की गरमियों की छुट्टी भर मेरे दोनों घुटने घाव से भरे होते थे, घाव तो सब भर गए पर बहुत दाग़ आज भी मौजूद हैं।

कई लोग मुझे देखने रूम में आ सकते थे और कई के लिए मुझे रूम से बाहर जाना होता और बाहर जाना तो और भी अजीब होता, मुझे ज़मीं पर चुक्की-माली हो कर बैठना पड़ता, मैं पहले तो समझ ही नहीं पाई ये बैठना कैसे था। ज़मीं में नील-डाउन (kneel-down - घुटने धरती पर और पंजे पीछे जिस पर शरीर का भार होता) कर बैठती। स्कूल में यही सीखा था। पर सास हमेशा पीछे से ठुनकी मारती, ‘ये ठीक से बैठूँ ना, कथी ठेहूनिया मार के बैसेछि (ठीक से बैठो, क्या घुटनों के बल बैठी हो)’। पर मैं वैसे ही बैठती और फिर उठ कर अंदर आ जाती। फिर जब ये दो तीन बार हुआ तो छोटी दीदी से पूछा, दीदी ये ठीक से बैठना क्या होता है? फिर उन्होंने कहा ठीक से बैठना यानी चुक्की-माली में बैठना और जब उन्होंने चुक्की-माली का मतलब बताया, तो लगा नहीं मैं ऐसे नहीं नीचे बैठूँगी। मुझे नहीं बैठना इस तरह से। कुछ ही देर बाद सास और बड़ी ननद कमरे में आई, सोचा यही मौक़ा है। बोला माँ मैं चुक्की-माली में नहीं बैठूँगी, उस तरह तो लोग पैखाना करते समय बैठते हैं।

ये ससुराल में मेरा पहला विद्रोह था उनके रीति-रिवाज के ख़िलाफ़। छोटी ननद ने बताया था कि मिथिला में शादी में भी लोग ऐसे ही बैठते हैं। मैंने पर किसी को शादी में ऐसे बैठे नहीं देखा था और देखा भी होगा तो याद नहीं मुझे। मुझे तो किसी ने नहीं टोका शादी में और ना ही बोला चुक्की-माली में बैठने को। बड़ी ननद मेरी बात सुन कुछ मुस्कुरा दी, पर माँ के शक्ल पर एक अजीब सी शिकन थी, मालूम नहीं वो ग़ुस्सा था या नई नवेली दुल्हन का इनकारनामा, उन्हें पसंद नहीं आया। पर सीधे तौर पर जवाब में उन्होंने कुछ नहीं कहा और चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई। पर लोगों का आना थोड़े रुकने वाला था? फिर कुछ देर बात कमरे से बाहर मुझे बुलाया गया और मैं फिर घुटनों के बल ही बैठी। पर इस बार माँ ने ठुनकाया नहीं और ना ही ठीक से बैठने को बोला। उल्टा मुझे देखने आई उन औरतों को ही समझाया, इससे नहीं बैठा जाता उस तरह, चुक्की-माली में नहीं बैठ पाती है, ये ठेहूनिया मार कर ही बैठती है। और उसके बाद जब भी कोई आए और सास पास हो तो एक बार ज़रूर पहले ही बोल देती थी, ये इसी तरह बैठती है।

ठीक उसी दिन शाम को छोटी ननद ने सास से पूछा था मेरे नामकरण के बारे में, लगा दिन में तो माँ कुछ बोल नहीं पाई मुझे, पर ग़ुस्सा तो था ही उसे मुझसे। अभी तक मैं ये समझ चुकी थी इस घर में कोई उनकी बात नहीं काटता, हर किसी की नज़र में उनके लिए एक इज़्ज़त थी। अपने पति से भी अपनी माँ की तारीफ़ ही सुनी थी। लगा माँ ने ग़ुस्से में ये ‘रानी’ नाम रखा है, शायद उनके बात नहीं मानने की सज़ा है। सास का रानी बोलना लगा जैसे वो रानी नहीं मुझे महारानी बोल रही हो, वो भी जैसे फ़िल्मों में ताने मार कर बोला जाता है। मेरी नासमझी पर चोट या शायद उनकी दुनिया जैसी नहीं दिखने की सज़ा। लगा शायद वो मेरी हरकतों से परेशान हैं।

कोशिश होती उनकी बातों को समझूँ, पर आदत से मजबूर कभी कुछ पूछ ही लेती थी। पर ध्यान आया नानी-गाँव में भी देखा था, नानी को मामियों को कुसुमरानी, फुलरानी बुलाते हुए और ये भी मालूम था ये उनके ससुराल के नाम हैं। पर मैं तो इसे उनका असली नाम ही मान बैठी थी (छोटी मामी को छोड़ आज तक मामियों के असली नाम नहीं जान पाई हूँ)। कई बार लोग बहुओं को उनके गाँव के नाम से भी पुकारते थे; सिहो वाली, बहरा वाली (मतलब उनके गाँव का नाम सिहो और बरहा है)। मम्मी को भी कई लोग तितरा वाली बुलाते थे, तितरा मेरी नानी-गाँव का नाम है। पर दूसरों की तकलीफ़ दिखाये नहीं दिखती है, दर्द तो तब होता है जब सही में ख़ुद को कोई चोट लगे। ये ससुराल में जैसे मुझे पहली चोट लगी थी, लोगों के लिए बिलकुल सामान्य पर मुझे दर्द हुआ था।

समय के साथ कुछ सास को समझने लगी, पर आदत तो आदत है, सो सवाल-जवाब करने की मेरी आदत भी मेरे साथ रही, वो भला क्यूँ मायके में छूटती? अब मैं सास के लिए लबड़ी (अत्यधिक बोलने वाली) थी। सास की कई चीज़ें मुझे पसंद नहीं थीं , वैसे ही मेरी कई हरकतें मेरी सास को नागवार थी। पर हम दोनों के बीच में मेरी पतिदेव हमेशा पुल का काम करते थे। माँ को कभी सीधे जवाब नहीं देती थी, किसी को घर में नहीं देखा था देते हुए पर तर्क वो तो मैं देती ही रहती थी। पर पतिदेव से हर बात बोलती, अपनी हर नाराज़गी बताती। ये भी उन्होंने ही मुझे कहा था, अपनी बात नहीं बोलोगी तो घुट कर रहोगी, हर बात बोलो पर सुनने की आदत भी डालो। उन्हें भी लगता कि मैं संयुक्त परिवार में नहीं रही हूँ इसलिए शायद चीज़ों का मतलब ठीक से नहीं जानती हूँ। मेरे हर सवाल का उनके पास तर्क ज़्यादा और जवाब कम होते। तर्क को तर्क से काटने की बहुत ही पुरानी बीमारी है, और कई बार हम आपस में भी उलझ जाते थे। पर माँ को उनके मुँह पर जवाब शायद नहीं दिया कभी मैंने।

इसी तरह शादी के सत्रह साल गुज़र गए। वक़्त को ना किसी की परेशानी से कुछ लेना है ना ही किसी के समझदारी से कुछ, उसे अपनी रफ़्तार चलना है और वो बस चलता है। एक दिन हॉस्पिटल से घर घुसी ही थी, डैडी की तबियत कुछ ज़्यादा ख़राब थी, डॉक्टर भी हताश हो चुके थे। घर में घुसी और माँ ने पूछ लिया, ‘बूढ़ा के की हाल छैथ (बूढ़ा का क्या हाल है)? माँ मेरे डैडी को बूढ़ा बुलाती थी और ये मुझे कभी भी पसंद नहीं था। माँ से पर कभी नहीं कहा था पर पतिदेव का ज़रूर बोलती, और वो वही अपने तर्क से मुझे चुप करते, मिथिला में लोग इसी तरह अपने समधी को सम्बोधन करते हैं, कोई अजीब शब्द नहीं है, इसमें भी प्यार और अपनापन है। दिल नहीं मानता था पर दिमाग़ को समझा देती थी।

पर उस दिन मन पहले से ही उखडा हुआ था, उनके सवाल सुनते ही बिदक पड़ी थी, ‘की माँ ई की बूढ़ा बूढ़ा कहिछी, नाम नहीं ल सकई छी त कमसे कमसे इ त कहैए साकैछि, अहां के बाबूजी या पिताजी के की हाल छैय, अहिं तो कहैछि की डैडी के उम्र बड़का ओझा के उम्र लगभग एक अछि (माँ ये क्या बूढ़ा बूढ़ा लगा रखा है, अगर नाम नहीं ले सकती हो तो इतना तो कह ही सकती हो तुम्हारे पिताजी का क्या हाल है, आप ही तो कहती हो डैडी और बेड़े ओझा, यानी उनके बड़े दामाद की उम्र लगभग एक ही है)।

पहली बार माँ के चेहरे पे एक अजीब सा दर्द दिखा। माँ उनमें से नहीं थी जो चीज़ों या बातों को चुपचाप मान  लेती, उन्हें जवाब देना आता था और बहुओं को तो ख़ास कर। कुछ देर के लिए मैं भी घबरा गई, बहुत कम ही माँ का ये रूप देखा था, पर ऐसा तभी होता जब सही में बात उनके दिल में लगती। लगा मालूम नहीं कितना बड़ा पाप कर दिया है। इतनी बुरी बात तो नहीं बोली थी, इससे पहले भी कई बार इस तरह या इससे भी ज़्यादा बोल चुकी हूँ उनको। पर हर बार उनका कुछ जवाब होता और फिर मेरा। पर उनकी ख़ामोशी अब चुभ रही थी, लगा बहुत बड़ी ग़लती हो गई। किसी को हराने में भी तभी मज़ा आता है जब वो जीतने की कोशिश कर रहा हो, जो ख़ुद हार मान ले उसे देख दया आती है। उस वक़्त ख़ुद की जीत का ख़याल कहा रहता है, लगता है पहले इसे लड़ना सिखाना होगा।

ख़ुद को सम्भाला और फिर उनके पास जा हिम्मत कर पूछा, ‘की भेल माँ’ (माँ क्या हुआ)? उन्होंने शांति से पर बहुत ही दर्द भरे स्वर में जवाब दिया, ‘एहन बात छैल त पहले किया ना कहलियी (ऐसी बात थी तो पहले क्यूँ नहीं कहा)’। क्या कहती, कहा था बहुत बार पर आपको नहीं आपके बेटे को, और उन्होंने हर बार मुझे समझा दिया। चाह कर भी आपको नहीं बोल पाई। बोलना चाहती थी, मुझे बुरा लगता है कोई मेरे डैडी को बूढ़ा बोले। डैडी मेरे लिए हमेशा डैडी थे, किसी को भी उन्हें उसी तरह से देखना चाहती थी। वैसे भी लड़कियाँ मायके की बुराई कहाँ सुन पाती है, ससुराल के लोगों से तो कभी नहीं। पर उस दिन एक बात तो सीख ही लिया था, माँ की बातों को समझने के लिए मुझे मेरी पतिदेव की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें मैं सीधे अपनी बात बोल सकती थी, पूछ सकती थी, समझा सकती थी। उस दिन के बाद माँ ने कभी भी डैडी को बूढ़ा नहीं कहा। अब डैडी 'रानी के बाबूजी' हो गए थे। पर इस घटना ने हम दोनों को एक दूसरे के बहुत क़रीब ला दिया था। अब मैं घंटो-घंटो माँ से बातें करती। उनके बचपन की कहानियाँ जानना चाहती, उनकी हर छोटी बड़ी बातों में मुझे अब दिलचस्पी थी। उनकी ज़िंदगी जानना चाहती थी जो उन्होंने जीया था।

एक बार ऐसे ही क़िस्सों कहानियों की बात चल रही थी और मैंने उनसे पूछ ही लिया, ‘माँ हमर नाम रानी किया रखलियी (माँ मेरा नाम रानी क्यूँ रखा)? जानना चाहती थी कि क्या था उनके मन में, क्या सोच उन्होंने रानी रखा और उनका जवाब सुन मैं चौक गई। बोली जब तुम्हें पहली बार देखा तो लगा कोई राजकुमारी है, तुम्हें राजकुमारी तो बोल नहीं सकती थी, मेरे बेटे से शादी जो हो रही थी, इसलिए रानी बोला, तुम मेरी रानी हो। अपनी अक़्ल पर शर्म आ गई। पर मैंने भी अपनी हर सच्चाई माँ को बताई। हर बात पूरे घटना क्रम के साथ और अपनी सोच भी। उनका हँसते-हँसते बुरा हाल था, हँसते-हँसते ही वो बोली ‘अहां बतही के बतही ही रहबै (तुम बेवक़ूफ़ की बेवक़ूफ ही रहोगी)।

उन्होंने राजकुमारी को रानी बोला और मैंने रानी तो महारानी सोचा। कितना अंतर था हमारी  सोच में। काश उसी समय पूछ लिया होता। इतनी नफ़रत नहीं होती तब मुझे इस नाम से। कई बार माँ रानी रानी पुकारती तो मैं अनसुना करने का नाटक करती, जैसे समझ ही नहीं रही हूँ किसे बुला रही है। फिर बोलती तो कहती हाँ समझ नहीं पाई आप मुझे कह रही हैं (यानी मुझे इस नाम की आदत नहीं है)। कभी कोई ननद रानी बोलना भी चाहती तो टोक देती, दीदी मेरा नाम अनिता है अनिता बुलाओ। सब मान भी जाते और धीरे-धीरे माँ को छोड़ हर कोई अनिता ही बुलाने लगे।

माँ बहुत समझदार थी। बहुत बातें है उनकी और मेरी जो समय के साथ लिखूँगी। वो दुनिया को उसके नए रूप में अपनाने को हमेशा तैयार रहती। बेरासी साल में भी वो ख़ुद को बदलने के लिए तैयार थीं, नहीं, अपनी बेटी के लिए नहीं अपनी बहु के लिए। लिखना जितना आसान है अपनाना उतना ही मुश्किल है। इस घटना के कुछ दिन बाद ही डैडी गुज़र गए। डैडी के जाने के चार महीने बाद माँ भी मुझे छोड़ कर चली गई। सच्चे रूप में उन्हें समझा, पर बहुत देर से। पर आज एक बात सोच कर चैन भी है, समझा और उन्हें बोल पाई, माँ मैंने आपको समझा और जाना है।


धन्यवाद भगवान आपने देर तो की पर वो इतनी भी देर नहीं थी, शुक्रिया आपका।