ज़ुल्फ़ों ने सबके सामने ये राज भी खोल दी
हम हवा से उलझे थे ये राज सबको बोल दी।
मोहब्बत जब टूट ही चुका था हमारे दरमियान
हमने भी मोहब्बत में
खाई हर क़समें तोड़ दी।
अब नहीं उठते ये क़दम
आपके शहर के लिए
हमने शहर के हर राह अपने
घर को मोड़ दी।
दामन आज भी हमारा
ज़ख़्मों से ही तो बेज़ार है
पर आजकल हमने दामन की
चिंता ही छोड़ दी।
झुक चुका था वो दरख़्त अपने
फलों के बोझ से
इसलिए आज कुछ फलों से
लदी टहनियाँ तोड़ दी।
अब कितना भी घना अँधेरा
हमें डरा पाता नहीं
अब हमने रौशनी की
उम्मीद ही जो छोड़ दी।
आज फिर कुछ सोच कर अपने
घर से थे निकले
आज फिर उन्हें देख हमने अपनी हर ज़िद्द छोड़ दी।
आज फिर उन्हें देख हमने अपनी हर ज़िद्द छोड़ दी।