Saturday, 31 December 2016

चलो अब हम भी सबको नया साल मुबारक बोल दें

चलो अब हम भी सबको नया साल मुबारक बोल दें
कुछ राज़ दिल के आज हम भी महफ़िल में खोल दें

हम जानते हैं साल आएगा और साल जाएगा
पर लोगों की बातों को हम भी कुछ तोल दें

कलेंडेर के बदलने से क्या कुछ बदल जाएगा
पर उम्मीदों के कुछ पिटारे अब हम भी खोल दें

एक साल ज़िंदगी का लीजिए गुज़र गया
आज अपनी ज़िंदगी को भी कुछ टटोल ले

ऐ साल हो सके तो अपनी बुरी यादों को तू ले जा
हम भी अपनी बातों को अब कुछ तो नया मोड़ दें

नया साल क्या कुछ ज़िंदगी में नया लाएगा
वक़्त है ये, तो हम क्यूँ इसे इतना मोल दें

नए साल के आने की ख़ुशी वो भी इस तरह
देखते हैं समय ज़िंदगी में कौन सा नया जोड़ दे

बीते साल का तहे दिल से शुक्रिया तूने बहुत सिखाया
देखते हैं नया साल कौन सा तोहफ़ा हमें अनमोल दे


Friday, 30 December 2016

आपका आना सौग़ात दे गया

आपका आना सौग़ात दे गया
हमें भी यादों की बारात दे गया

कुछ पल ख़ुद में कितना यक़ीन हैं लाते
साथ बिता वो पल बेइंतिहा जज़्बात दे गया

वक़्त को जाना है वो हर हाल में जाएगा
पर न भूलनेवाला वो एक ख़यालात दे गया

हम से पूछिए वो पल कितना बेशक़ीमती था
जो हम सबों को आपका सुनहरा साथ दे गया

न मुमकिन है उन्हें दिल से भुला देना
जो ज़िंदगी में ख़ुशियों की बरसात दे गया

एक बार तहे दिल से शुक्रिया बोल दे
जाते हुए कोई हमें भी इक आवाज़ दे गया







Tuesday, 27 December 2016

वक़्त भी ख़ुद से कुछ ख़फ़ा ख़फ़ा होगा

वक़्त भी ख़ुद से कुछ ख़फ़ा ख़फ़ा होगा
वक़्त क्या अच्छा होगा वक़्त क्या बुरा होगा

जिसे देखिए ‘नया साल मुबारक’ बोल रहा हैं
लगता है आने वाला साल सही में अच्छा होगा

लीजिए माना वक़्त हमें मुफ़्त में ही है मिला
पर किसी को दिया ये तोहफ़ा सबसे महँगा होगा

मेरी हर बात को हर वक़्त मिटाने में वो लगे हैं
पर उस दिन क्या करेंगे जब वक़्त पे ये लिखा होगा

आज सोचा है वक़्त को वक़्त से छीनेंगे
वक़्त माँगने से कब किसी को मिला होगा

हम सोचते रहे हमारे पास वक़्त ही वक़्त है पड़ा
पर कोई कहे वक़्त कभी किसी के चलाये चला होगा

वक़्त की बेबसी अब घुटन से है भरी
माना यादों से वक़्त कभी नहीं जुदा होगा

चलो एक बार फिर पीछे मुड़कर हैं खोजते
वक़्त शायद मेरा वहीं पर कहीं गिरा होगा

वक़्त की सबसे ज़्यादा हमें ही तो है ज़रूरत
और सबसे ज़्यादा हमने ही इसे बर्बाद किया होगा


Monday, 26 December 2016

आज जो हँस रहा देखना कल वो भी रोएगा

आज जो हँस रहा देखना कल वो भी रोएगा
मेरा क़ातिल भी एक दिन मक्तूल बन सोएगा

हर तरफ़ अभी क़ैद और कुछ सैयाद है
पर सैद की बेबसी पर वक़्त आँख भी भिगोएगा

माना अभी आँधियों का दौर है छाया हुआ
पर कुछ देर बात आसमान साफ़ भी तो होयेगा

मत खेल तू किसी के एहसास से इस तरह
बहुत पछताएगा जब ये तीर तुझे भी कोई चुभोएगा

तेरे हर दर्द को हमने ख़ामोशी से सह लिया
देखते हैं आँसुओं से तू ख़ुद को कब तक न डुबोएगा

खुदा क्या सिर्फ़ कुछ लोगों का ही खुदा है
वो हमारी दर्द-ए-बंदगी पे कब तक ख़ामोशी से सोएगा



Sunday, 25 December 2016

जिस्म का कुछ क़र्ज़ उतारेंगे

जिस्म का कुछ क़र्ज़ उतारेंगे
एतवार को लेट कर गुज़ारेंगे

बहुत टूटा टूटा सा है ये मन
इसे भी आज फ़ुर्सत से सवारेंगे

बहुत हुआ इश्क़-ए-बुत पर लिखना
कोई और जज़्बात अब शायरी में डालेंगे

सुबह से शाम हम सिर्फ़ बक बक कर रहे
अपनी बातों को अब कम लफ़्ज़ों में निखारेंगे

अपनी हरकतों से हम ख़ुद ही परेशान हैं
अब ख़ुद को भी हम कुछ तो सुधारेंगे  


Saturday, 24 December 2016

चलते रहने से ज़िंदगी हर वक़्त साथ खड़ी है

चलते रहने से ज़िंदगी हर वक़्त साथ खड़ी है
रूकती ज़िंदगी में मौत की ही एक बेबसी है।

किताबें भी अब कितना झूठ बोलती हैं
माँ की सिखाई बात भी झूठ हो रही है।

लफ़्ज़ों से वो ख़ुद का यक़ीं दिला रहे हैं
ज़िंदगी में लोगों के देखिए कितनी बेबसी है।

आप क्यूँ बातों को बदल कर सामने ला रहे हैं
हम जानते हैं ग़ुस्से में आपने हर बात सच कही है।

ज़िंदगी रही तो हौसले से कुछ कर ही लेंगे
मकान कहते हैं जिसे उसकी दीवार ही तो गिरी है।

अब क्या अपनी बात रखने की भी मनाही है
हमने कब कहा हमने हर बात सच ही कही है।

चाहतें भी माँग कर पाई जाए
ख़ुद्दारी भी क्या बेच रखी है।

हम आपका हर सच कब जानना चाहते थे
पर ये क्या बात आपने सिर्फ़ झूठ रखी है।

चल रहे हैं हम ज़िंदगी के ही चलाए
पर कैसे मालूम हो कौन सी राह सही है।

अपनी हर बात को उनकी नज़रों से समझाए
महफ़िल ने ये अजीब बंदिश हम पे डाल रखी है।



Friday, 23 December 2016

हम अब कहाँ उनकी बातों पर फ़िदा हैं

हम अब कहाँ उनकी बातों पर फ़िदा हैं
वो सही कहें, हमें पता हमने ग़लत लिखा है।

अब किसी के दिखाए हम नहीं देखते
हम जानते हैं हमारी कौन सी जगह है।

लोग फिर अपनी बातों से तसल्ली देने आ गए
किसी को क्या मालूम हमने क्या क्या सहा है।

उनकी बेरुख़ी अब और नहीं सही जाती
इससे कहीं अच्छा उनका ग़ुस्सा लगा है।

उसे जाना था तो ख़ामोशी से चला जाता
साथ अपने हमारी ज़िंदगी क्यूँ ले गया है।

अपनी आखों पर हम यक़ीं करे भी तो कैसे
नमक से कई बार हमें चीनी का धोखा हुआ है।

जिसे जाना है हमारी ज़िंदगी से ख़ुशी से जाए
हमने अपनी ज़िंदगी के बिना जीना सीख लिया है।

पीछे मुड़ मुड़ कर देखना किस काम का
क्यूँ ऐसा करे जिससे आगे का नहीं दिखा है।

चीख़ अपनी हमने आज सबसे है छुपायी
इसका मतलब ये नहीं हमें दर्द नहीं हुआ है।

जहाँ हम बिछड़े वहाँ दिल क्यूँ है खोया हुआ
वक़्त कहाँ उस जगह खड़ा उसे गए ज़माना हुआ है।

हर बार टूटती उम्मीदों से हम बाज़ आए
लीजिए हमने माना क़िस्मत का लिखा ही हुआ है।

दिल को इस बात का यक़ीं दिलाए तो कैसे
जो दिल-ए-जान था कभी आज अजनबी बना हुआ है।

दे कर पाने की उम्मीद मोहब्बत में जनाब
ये इश्क़ है या आपने कोई सौदा किया है।

अब और आपको हम कभी भी न समझाएँगे
आप न बदले पर नज़रों ने हमारा ओहदा कम किया है।

हर बात के बारे में अब हम क्यूँ सोचें
खुदा का काम हमने कब से अपने सर लिया है।

ये मोड़ भी ज़िंदगी में कुछ अजीब सा है आया
जहाँ हम सबको समझा रहे ऐसा हमने क्यूँ लिखा है।



Wednesday, 21 December 2016

हवा से लड़ कर आँधियों को मत बुलाओ

हवा से लड़ कर आँधियों को मत बुलाओ
कुछ ज़ज़्बातों को महफिल में मत दिखाओ

इश्क़ पेशा हो गया है ज़िन्दगी के बाजार में
मोहब्बत बन तुम भी मेरी दुनिया में मत आओ

जिनको ज़ज़्बातों की भी कोई कदर नहीं
ऐसे लोगों को जज़्बात--दिल मत दिखाओ

जो राह--मंज़िल की तलाश में है भटका हुआ
खुदा के लिए उन्हें राह--मुश्किलें मत समझाओ

जो कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं
ऐसे लोगों की बातों में तो कम से कम मत आओ

समझ किसी बात की सोच से ही तो आएगी
सच और झूठ में ही किसी बात को मत अपनाओ

अब हमें ये चिंता कहाँ कोई क्या सोचता है
तुम लोगों की बातों से अब हमें और मत डराओ

माना हम गलत थे पर तुम साथ तब थे कहाँ
अब सच्चाई का ये पाठ भी हमें मत पढ़ाओ

सबकी सोच ले कर कौन चल सकता है भला
तो दूसरों के ख़यालात से ज़िन्दगी मत बनाओ

हर किसी ने अपनी एक पहचान है पाई
किसी और के जैसा खुद को मत सजाओ

जब जानते नहीं की हम किस रह पे थे चले
तो अपने किस्सों को हमारे किस्सों से मत मिलाओ

ये डर भी देखना कुछ अच्छा ही कर जायेगा
तुम डर की सोच और अब डर से मत घबराओ

मोती कहीं किस को साहिल पे मिला है भला
तुम किनारे बैठ मोतियों की उम्मीद मत लगाओ

वो बात क्यूँ सोचे जो बस में किसी के नहीं
उल्टे- सीधे  ख़यालात जहन में मत बसाओ

कुछ तलाश मौके की भी है ज़रूरी ज़नाब
मौके की उम्मीद में बैठकर वक्त मत गँवाओ

माना ज़िन्दगी के कुछ पन्ने तुम्हे रुलाते हैं
ऐसे पन्नों को ज़िन्दगी की किताब में मत सजाओ

सच एक रोज देखना खुद ही सामने आयेगा
तुम झूठ से अब इतना भी तो मत घबराओ