Monday, 26 March 2018

किसी को चाहने से कुछ होता कहाँ है

किसी को चाहने से कुछ होता कहाँ है 
किसी के कहने से कोई रोता कहाँ है 

सुबह की उम्मीद अपनी जगह पे
शाम की शादगी सुबह ढोता कहाँ है

परिंदों को माना खुला आसमान चाहिए 
परिंदा आसमान में पर सोता कहाँ है

खुद से वादा था मुड़ के न पीछे देखेंगे
यादों को दिलों से पर कोई खोता कहाँ है

वो दामन को छू के चला गया
वो दाग़ पर वक्त धोता कहाँ है 

  

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