Monday, 9 April 2018

किसी की क्या हस्ती किसी का क्या नाम है

किसी की क्या हस्ती किसी का क्या नाम है 
वक्त के साथ जाएगी ये नुमाइशें तमाम है 

बे-कसी बे-बसी बे-बहा* बे-चाप* समाये हुए 
दिल के रिश्तों में क्या सुकून क्या आराम है

रात में सूरज अँधेरा चाहे वो छुप जाये  
पर सुबह पर्वतों को करता वो सलाम है  

ना-उम्मीदी को बेइंतिहा उम्मीद चाहिए 
उम्मीद को भला उम्मीद से क्या काम है

राह की मुश्किलें दिल को कुछ समझाती है
कैसी होगी मंज़िल कैसा बना वो मुकाम है

अहसानों के साथ अब और न जी पायेंगें 
इन अहसानों तले बन गए हम गुलाम है

बे-बाह - बहुमूल्य 
बे-चाप - खामोशी

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