Friday, 22 December 2017

हर पत्थर में एक आग होती है

हर पत्थर में एक आग होती है 
हर आवाज़ में एक बात होती है 

अँधियों में जो खिड़कियों की धड़कन है 
वो बेबसी बेकरारी के साथ होती है 

अपनी बेकरारी को हम कैसे पहचाने 
लगता है किसी की हमसे बात होती है 

कुछ तो गलत किया है हमने 
बेकरारी यूँ ही नहीं पास होती है 

कुछ पाने की चाहत या टूटने का सिला 
बेकरारी हर हाल में आबाद होती है

Wednesday, 20 December 2017

इंसान है हम हँसे हैं तो रोये भी तो हैं

इंसान है हम हँसे हैं तो रोये भी तो हैं
दर्द में चीखे हैं दर्द में सोये भी तो हैं 

ज़िन्दगी को कभी गले से हमने लगाया 
ज़िन्दगी के बोझ को कभी ढोये भी तो हैं 

कभी खुद को हमने खुद ही है सताया 
कभी खुद की चाहत में खुद खोये भी तो हैं 

ख्वाहिशें हैं बे-इंतिहा, सपने आसमान के 
पर ज़िन्दगी में हकीकत के बीज बोये भी तो हैं

अपनी ही ज़िन्दगी में आग हमने है लगाई 
अपनी ही लाश को हम ढोये भी तो हैं 





Sunday, 17 December 2017

कुछ तारीखें कुछ तहरीरे हटाए नहीं हटती

कुछ तारीखें कुछ तहरीरे हटाए नहीं हटती
वक़्त के साये में ये छिपाए नहीं छिपती

ये ज़ख़्म दिल से कैसे यूँ हीं मिट जाएँगे
निशानी दीवार की जब मिटाए नहीं मिटती

रोकर, लड़कर, हर कोशिश कर देख लिया
क़िस्मत किसी सूरत में बनाए नहीं बनती

हथेली आज कल जैसी ही ख़ाली है
हवा भी इसमें टिकाए नहीं टिकती

अब लगता है मैं टूटने ही वाला हूँ
टहनी मेरी अब झुकाए नहीं झुकती

  

अपनी ही बातों में आता नहीं वो

अपनी ही बातों में आता नहीं वो
ख़ुद पे भी भरोसा जताता नहीं वो

ख़ुद को उसने कितना बदल लिया
बात बात पर मुस्कुराता नहीं वो

ज़िंदगी उसकी टूटे पंखों पे खड़ी है
कैसे कहें आसमान देख ललचाता नहीं वो

यादों ने भी उससे दुश्मनी है निभाई
बिन उसके दो क़दम चल पाता नहीं वो

अपनी ही परछाईं से ख़ौफ़ खाए
अंधेरे में रौशनी चाहता नहीं वो