Friday, 13 September 2019

वो रास्ते लौटाएँगे जो ख़ुद हैं खो चुके

वो रास्ते लौटाएँगे जो ख़ुद हैं खो चुके
मंज़िलो की चाहत में ये भी हैं रो चुके

वक़्त के नाइंसाफ़ियों की बात क्या करें
कुछ मौत की बुज़दिली को भी ढो चुके

रौशनी की ख़्वाहिश कोई किस से करे
सूरज ही जब साज़िशों के बीज बो चुके

ख़्वाब हमारे लिए देखना है गुनाह
इंसान नहीं हम खुदा को टोह चुके

दुआ है उन गलियों को मिले ख़ुशियाँ ता-उम्र
जिन गलियों में जाने की हम उम्मीद खो चुके

मैल जिस्म को आज भी जकड़े है पड़ा
क्या करे सकड़ों बार हम इन्हें धो चुके

ख़्वाब की तासीर कोई कैसे करे भला
सच झूठ से लड़ कर आज फिर सो चुके

क्यूँ

'क्यूँ' का जवाब जानती हूँ आएगा नहीं
वक्त भी 'क्यूँ' को शायद आज़मायेगा नहीं

वो 'क्यूँ' जो मेरे दिलों दिमाग में हरदम भरा है
वो 'क्यूँ' जो मेरी ज़िन्दगी के हर मोड़ पे खड़ा है

इस 'क्यूँ'  ने हर रात मुझसे कितना कुछ कहा है
इस 'क्यूँ'  के लिए मैंने कितना कुछ सहा है

बेज़ुबान ये 'क्यूँ', क्यूँ इतना शोर मचाता है
बेबस सा ये 'क्यूँ', क्यूँ मुझे इतना रुलाता है

हर दिन मेरा हौसला तोड़ता ये 'क्यूँ'
हर वक्त बड़बड़ाता बोलता ये 'क्यूँ'

ये 'क्यूँ'  मेरे मौत से रिश्ता निभाएगा
ज़िन्दगी जानती है जवाब नहीं आएगा

एक अँधेरा चाहिए इस ज़िन्दगी के लिए

एक अँधेरा चाहिए इस ज़िन्दगी के लिए
एक अँधेरा चाहिए खुद की ख़ुशी के लिए

खुद को पाना-खोना अँधेरा समझायेगा
खुद की परछाई को ये पीछे छोड़ आएगा

बेवफा रौशनी इसका किसी न किसी से रिश्ता है
बावफा ये अँधेरा जो बस खुद का अटूट हिस्सा है

धुंधलाई हुई आँखों को अँधेरा राहत पहुंचाएगा
चकाचौंध ज़िन्दगी को ये कुछ सुकून दे जायेगा

अंधेरों को कहाँ किसी रास्तों की चाहत है
मंज़िलों से ख़त्म हो चुकी इसकी मोहब्बत है

उजालों की नहीं मुझे अंधेरों की ज़रूरत है
वक्त से भी एक अँधेरे कमरे की चाहत है

अंधेरों में मैं नहीं___ ये अँधेरा मुझमे रहता है
ज़िन्दगी की हर सच्चाई अँधेरा ही तो कहता है