Wednesday, 29 March 2017

ये तार है या जंजाल है

ये उलझा हुआ उलझनो के तारों का जाल है
पर ये भी लग रहा है कि ये जिन्दगी का जंजाल है
लेकिन इसमें मेरे घर तक जाने वाला बिजली का एक तार है
मैं अपने घर तक जाने वाले तार को खोजने आई हूँ
साथ इलेक्ट्रीशियन को भी आज लाई हूँ
घर में पूरी तरह अंधेरा जो छाया है
टूटे तार के कारण रौशनी घर तक पहुंच ही नहीं पाया है
उम्मीद है उस तार को फिर से जोड़ दूगी
खो गई उस रौशनी को घर तक मोड़ दूगीं
वो रौशनी जो तार की उलझनों में गुम है
इलेक्ट्रीशियन की मदद से आज फिर से जोड़ लूगी
फिर से मेरे घर में होगा वो ही उजाला
हाँ फिर होगा वही पहले वाला ही नजारा
लो माना मैंने ये जिन्दगी का ही जंजाल है
पर इसके अन्दर मेरे घर को रौशनी देने वाला एक तार है




अनारकली ऑफ़ आरा

अनारकली ऑफ़ आरा, जब पहली बार ये नाम सुना तो लगा, क्या बनाया है अविनाश जी ने? फ़िल्म में भी बिहारी बुद्धि लगा ही दी और नाम भी बिहारी! अब हम बिहारी लोग कुछ ज़्यादा ही बिहारी होने का दावा करने लगे हैं। बाद में पता चला ये एक नचनियाँ की कहानी पर बनी फ़िल्म है। बिहार में नाचने गाने वाली को नचनियाँ कहते हैं। याद है, दीदी कि शादी में जब बाबा (दादा) को पता चला था कि दीदी की सास ने बरातियों के साथ नाचा था, तो वो ग़ुस्से में तिलमिलाये हुए थे। नाचना भी क्या नाचने के नाम पर लोगों ने उन्हँ भीड़ में खींच लिया था और उन्होंने बस कुछ हाथ पैर हिला दिये थे। मेरे लिए ये सामान्य बात थी, अपने पंजाबी दोस्तों और उनके परिवार के सदस्यों को हर ख़ुशी के मौक़े पर नाचते हुए देखा था। पर बाबा का ग़ुस्सा मेरी समझ से बाहर था। लगा उस मिथिला में जहाँ औरतों को बारात में जाने भी नहीं दिया जाता, ये पूरे परिवार के लिए एक झटके का बदलाव है और इसी लिए हर कोई कुछ ना कुछ परेशानी लिए खड़ा है।

‘अरे पहले बताते तो उनके ऊपर कुछ पैसा नौछावर कर देता। पता तो चलता की कोई नचनियाँ थी। हम तो सोचे कोई बाईजी नाच रही हैं और आप लोग बता रहे हैं कि वो सरिता की सास थी।’ इस घटना ने मुझे समझा दिया था कि बिहार में और ख़ास कर मिथिला में औरतों को जहाँ गाना गाना शुभ और निहायती ज़रूरी है, उसी मिथिला में औरतों और लड़कियों का नाचना बुरा माना जाता है। बिना गाना मिथिला में कोई पर्व, पूजा, शादी या कोई भी समारोह नहीं हो सकता। हर अवसर के गाने हैं और उनका नाम भी है, जैसे सुबह के गाने को ‘प्राती’ और शाम के गाने को ‘साँझ’ कहा जाता है, शादी में ‘समर’; जन्म, छठी, मुंडन जनऊ में ‘सोहर’; उपनायन (जनऊ) में ‘बाबा गीत’, विदाई पर भी ‘समदान’ और ‘उदासी’, शिवजी की पूजा में ‘नचारी’, ये तो मैंने कुछ ही बताये हैं। हर मौक़े के लिए गाना है और गाना बहुत  ज़रूरी भी है। कम से कम पाँच गाने गाए बिना कोई काम शुरू नहीं होता, मतलब शुभ नहीं माना जाता। मेरी सास को हमेशा ये चिंता खाती थी कि इन लोगों का काम कैसे चलेगा, इन्हें तो कोई गाना नहीं आता। बेचारी हर बार मेरे लिए गाने और कथा की किताब ले कर आतीं। बोलती, गाना गा लेना भले ही सुर में न हो और कथा पढ़ कर अपना काम चला लेना। जब तक वो थीं, वो अपना कर्तव्य करतीं यानी पाँच गाना गा कर हमारे घर में कोई काम शुरू होता और किताब पढ़ कर मैं उनका साथ दे भी देती, कुछ गाने सीख भी गई। मम्मी द्वारा गाये कई विद्यापति के मैथिली गीत आज भी मुझे कंठस्थ हैं। रटी हुई है उनके वो शिवजी के गीत जिन्हें नचारी बोलते हैं। पर अपने घर में किसी को नाचते हुए मैंने कभी भी नहीं देखा था।

पहली बार अपने घर पर अगर किसी को नाचते हुए देखा था तो वो भी मम्मी ही थीं, वो भी एक बार अचानक। एअरफ़ोर्से स्टेशन में कीर्तन करने का एक प्रचलन-सा था या शायद आज भी होगा। औरतों की मंडली भजन गाती, ख़ुद ही ढोलक बजाती, भगवान को भोग लगाती और ख़ुशी से नाचती भी थी। एक दिन स्कूल से सीधे कीर्तन वाले घर पर पहुँच गई। देख कर हैरान थी, आखों को यक़ीन ही नहीं हो रहा था, मम्मी नाच रही थीं। जब मम्मी की नज़र मुझपर पड़ी तो वो कुछ झेंप-सी गईं। उन्हें मालूम नहीं था मैं आऊँगी। प्रसाद ले कर जब मैं मम्मी के साथ घर वापस जा रही थी तो मम्मी की हिदायत थी मुझे, डैडी को मत बताना। कुछ समझ नहीं पा रही थी कि क्यूँ नहीं बताऊँ? इतनी बड़ी बात भी नहीं थी की नहीं बताऊँ, पर सोचा डैडी से ज़्यादा तो मम्मी को झेलना पड़ता है इसलिए नहीं बताया, पर बाबा वाली घटना ने समझा दिया था कि मम्मी क्यूँ चाहती थी मैं डैडी को नहीं बताऊँ। पर बाद में एक दिन डैडी को बता ही दिया था, डैडी, मम्मी कीर्तन में नाचती हैं, और डैडी सुन कर मुस्कुरा दिए थे।

पर इस फ़िल्म का नाम सुन कर लगा की कुछ तो अलग देखने को मिलेगा इस फ़िल्म में। उत्सुकता इसलिए भी थी कि अविनाश जी को जानती थी। उससे पहले मिल चुकी हूँ। अगर ठीक ठीक कहूँ तो शायद तीन बार, एक बार अपने ऑफ़िस में, दूसरी बार प्रकाश झा के मैलोरंग के कार्यक्रम में जब उसने बताया था कि वो मोहल्ला कर के ब्लॉग चलता हैं। हाँ-हाँ कह दिया था, न उस समय मुझे ब्लॉग की जानकारी थी और नहीं ये जानने में रुचि थी वो क्या करतें हैं। तीसरी मुलाक़ात का ज़िक्र छोड़ ही देती हूँ। हाँ कभी-कभी फ़ोन और ज़्यादातर व्हात्सप्प पर बात हो ही जाती अविनाश जी से। ट्विटर और फ़ेसबुक में उनसे जुड़ी थी तो उनकी जानकारी मिलती रहती थी।

अविनाश जी ने अपनी फ़िल्म का एक गाना व्हात्सप्प किया। ये मेरी फ़िल्म का गाना है इसे अपने लोगों और ग्रुप में फ़ॉर्वर्ड कर दीजिएगा। ख़ुद सुनिए और लोगों को भी सुनाइएगा। अभी तक मालूम पड़ चुका था कि ये फ़िल्म डबल मीनिंग गाना गाने वाली एक दीवा (देवी) के बारे में थी, फ़िल्म का ट्रेलर देख चुकी थी। जब जानकरी हो तो बातें कुछ ज़्यादा ही नज़र आती है। सो अविनाश जी को जवाब भी दिया कि नहीं भेज सकती ये गाना अपने किसी ग्रुप को, मेरे सारे ग्रुप या तो ऑफ़िस के हैं या परिवार के, सो मुश्किल हैं। पर आपकी फ़िल्म का ट्रेलर आगे भेज दूँगी और सही में मैंने अपने हर ग्रुप को वो ट्रेलर आगे भेज भी दिया और कहा ये फ़िल्म देखना और मुझे प्रतिक्रिया भी बताना, मेरे एक जानने वाले ने ये फ़िल्म बनाई है।

पतिदेव को इतनी बार ये फ़िल्म के बारे में और इसे देखने के बारे में कह चुकी थी कि बेचारे एक बार बोल ही पड़े। फ़िल्म देखने के लिए फ़िल्म रिलीज़ होना भी ज़रूरी है। सोचा फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो देखूँगी। लोगों को अपने फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो का डिंग मारते हुए बहुत सुना और देखा था। कभी फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो का शौक़ नहीं रहा और न ही किसी फ़िल्म को देखने की ऐसी कोई लालसा रही थी, सोचती थी फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो का टिकट भी बहुत महँगा होता होगा। इस सच्चाई की भी हक़ीक़त इस फ़िल्म के देखने के शौक़ ने तोड़ दी। बुक माई शो में बुक करने गई तो देख कर हैरान, फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो की टिकट सौ रुपय की। मैं तो सोचती थी सौ रुपए की टिकट सिर्फ़ बृहस्पतिवार को ही होती है। एक ख़याल था कि शुक्रवार को फ़िल्म बदलता है इसलिए। पर फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो तो लगभग हर हॉल में ही सस्ता था। लोग ऐवीं डिंग मारते हैं, सस्ते टिकट में फ़िल्म देखते हैं और कहते हैं फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो देखा है और मैं बेवाक़ूफ २५० से ३५० रुपय में फ़िल्म देखती हूँ और लगता था मिस कर गई फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो। अब मारे कोई डिंग मेरे आगे फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो की, खोल दूँगी पोल सबके सामने।

सस्ता देख और ख़ुश हुई और तीन टिकट बुक भी कर दिया की शुक्रवार को जाऊँगी और बताऊँगी अविनाश जी को उसकी फ़िल्म के बारे में। घटिया होगी तो मुँह पर ही कहूँगी की घटिया है। मुझे नहीं दिखाना या बताना की आपने अच्छी कोशिश की। मैं ये फ़िल्म किसी फ़र्स्ट टाइम डरेक्टर की भी नहीं देखने जा रही थी। मैं उस अविनाश जी की फ़िल्म देखने जा रही थी जिसपर पता नहीं क्यूँ मुझे बहुत भरोसा था और मुझसे भी ज़्यादा मेरी दीदी को। बस एक बार मिली थी दीदी अविनाश जी से और जब भी उसे मौक़ा मिलता वो अविनाश जी  के बारे में पूछ ही लेती, क्या कर रहा है? आजकल कहाँ है वो? एक बार मैंने दीदी को बताया की अब वो फ़िल्मों में निर्देशन कर रहा है। तुरंत बोल पड़ी, बहुत अच्छा निर्देशक बनेगा वो। हैरान थी, कोई किसी से एक बार मिला है और उसे उसपर कैसे इतना भरोसा है। देखना चाहती थी कि दीदी का भरोसा सही है या उसने किसी इंसान को, जो उसे अच्छा लगा एक अच्छा निर्देशक भी मान लिया है।

पर ज़िंदगी आपकी सोच के हिसाब से चलने कब देती है। कुछ घटनाक्रम ऐसे हुए की फ़िल्म देखने नहीं जा सकी। फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो की ली हुई टिकट फ़ालतू में बर्बाद हो गई। शनिवार बीता और रविवार को सुबह सीधे हॉल पर पहुँच गई। बुक माई शो पर देख चुकी थी टिकट लेने में मारामारी नहीं है और दुबारा टिकट बर्बाद करने का मन नहीं था। सुबह निकल गई क्यूँकि रविवार था, लगा कोई मेहमान आ गया तो तो फिर जा नहीं पाऊँगी। ९.४५ का शो था, साढ़े नौ बजे के लगभग हॉल पहुँच गई थी तब तक टिकट काउंटर भी नहीं खुला था, गोपाल को काउंटर पर खड़ा किया और बोला तुम २०० की दो टिकट ले लेना अनारकली ऑफ़ आरा की। उस हॉल के उस शो की उस समय १५० और २०० की ही टिकट उपलब्ध थी। तभी पीछे खड़े एक महानुभाव जो लगातार मेरे और गोपाल की बातें सुन रहे थे अचानक बोल पड़े, आप अनारकली ऑफ़ आरा देखने आई हैं। तो २०० रुपए की टिकट क्यूँ ले रही हैं। १५० की ही ले लीजिए और २०० वाली सीट पर बैठ जाइए कोई नहीं पूछेगा। सुबह कोई देखने भी नहीं आता है। हैरानी हुए उसकी बात सुन कर, ये क्या तरीक़ा हुआ। मेरी घबराहट को वो महाशय जान गए थे। बोले, मैं भी वही फ़िल्म देखने आया हूँ कुछ नहीं होगा। मन नहीं कर रहा था तभी गोपल बोल बैठा, दीदी मेरा १५० वाला ले लीजिए और अपना २०० वाला। देखते हैं क्या होगा, कोई बोलेगा तो मैं आगे चला जाऊँगा। मान गई देखना चाहती थी कि जो बात ये महानुभाव कह रहे थे क्या सच में ऐसा होता है। कुछ तो नई जानकारी मिलेगी। काउंटर खुला तो गोपल ने वही किया। खुले भी नहीं थे हम लोगों के पास, तो उसी महानुभाव ने हमारी टिकट ली और बाद में हमें खुले पैसे भी उन्होंने ही मुहैया करवाए।

टिकट ले कर हॉल में घुसी तो पाया वो महानुभाव बिलकुल सही थे। सुबह के शो में कोई टिकट चेक करने वाला नहीं था। हॉल देख कर हैरान थी लगभग ख़ाली था। गिना, मुझे मिला कर कुल सात लोग थे। लगा सुबह का शो है इसलिए लोग नहीं आए होंगे। पर रविवार की  सुबह थी आसपास के लोग तो आ ही सकते थे। मन में ये ख़याल भी आया ये मल्टीप्लेक्स अपना ख़र्चा कैसे निकालते होंगे। इतना ख़र्चा तो बिजली में ही चला जाता होगा। सोचा क्यूँ बेकार की बातों में माथा खपा रही हूँ।

गोपाल और वो महानुभाव भी मेरे साथ ही आ कर बैठ गए। वो महानुभाव जी इस हॉल और यहाँ की गतिविधियों से पूरी तरह वाक़िफ़ थे। हम हॉल में कुछ जल्दी ही पहुँच गए थे और फ़िल्म शुरू भी नहीं हो रहा था तो उस महाशय से पूछ ही बैठी, आप क्यूँ ये फ़िल्म देखने आए हैं। बोले, मैं हर फ़िल्म देखता हूँ और सुबह का शो देखने आता हूँ। इस हॉल में हर फ़िल्म लगती है। कोई भी फ़िल्म नहीं है जो यहाँ नहीं लगी हो। मेरा करोलबाग में केटरिंग का काम है। शादी-विवाह, बर्थ-डे पार्टी हर तरह के कार्यक्रम के लिए हम लोग काम करते हैं। सुबह कुछ काम नहीं होता इसलिए फ़िल्म देखने आता हूँ और इसी हॉल में आता हूँ। मेट्रो स्टेशन बिलकुल बग़ल में हैं न, मेट्रो का ख़र्चा लगा कर १५० से २०० रुपए में फ़िल्म देख ही लेता हूँ। रविवार की टिकट १५० की हैं बाक़ी दिनों की तो १०० रुपए की ही होती है। फिर उसने अपना कॉर्ड निकाल कर मुझे दिया और बोलें, कभी कोई ज़रूरत हो तो बताइएगा। उस शख़्स की बातों में बहुत सच्चाई थी। उसने कहीं नहीं छुपाया की १५० रुपए के टिकट ले कर वो २०० रुपए की सीट पर बैठतें हैं। जिन्हें जिस चीज़ का शौक़ होता है वो उसका जुगाड़ भी खोज ही लेता है।

फ़िल्म शुरू हुई और जैसे-जैसे आगे बढ़ने लगी मन में अजीब सी बेचैनी शुरू हो गई। फ़िल्म के डायलोग डबल मीनिंग वाले थे। सोचा कितनी बड़ी बेवक़ूफ़ी कर दी। मालूम था अडल्ट फ़िल्म है और फिर भी गोपल को ले कर चली आई। जानती हूँ ये भी बड़ा है पर एक साथ नहीं देखने वाली फ़िल्म है। बेचैनी और भी बढ़ गई की साथ में एक अनजान सा शख़्स भी बैठा है। लगा फ़िल्म ख़त्म होने के बाद उस शख़्स से आँख मिला कर बात भी नहीं कर पाऊँगी। शुरू के कुछ सम्वाद, अगर आप एक महिला हैं तो आपको बेचैन करेंगे और ख़ास कर अगर आप किसी पुरुष के साथ बैठी हैं तो और भी ज़्यादा, इसलिए नहीं की ये झूठ है बल्की इसलिए की हम महिलाएँ सच को झुठलाना सीख गई हैं।

पर फ़िल्म में घटनाक्रम इतनी तेज़ी से बदल रहा था कि आप स्क्रीन से आँख नहीं हटा सकते थे, एक मिनट के लिए भी नहीं। सब कुछ चलता जा रहा था, एक दर्शक को बाँध के रखने की पूरी ताक़त रखती है ये फ़िल्म। तभी फ़िल्म की नायिका को छेड़ने की घटना होती है और कहानी का एक ऐसा मोड़ आता है की मेरी सारी बेचैनी जैसे ग़ायब-सी हो जाती हैं। वो डबल मीनिंग गाने और वो सम्वाद जो अभी तक मुझे फूहड़ नज़र आ रहे थे उसकी सार्थकता अब  नज़र आ रही थी। बिना उन सम्वादों और उस प्रकार के गानों के ये फ़िल्म आगे बढ़ाई नहीं जा सकती थी। इंटर्वल तक मैं सिर्फ़ नोर्मल नहीं ख़ुश हो चुकी थी। जैसे ही इंटर्वल हुआ उस शख़्स ने ही मुझसे पूछ लिया, कैसी लग रही है आपको ये फ़िल्म? जवाब देने के बजाये मैंने ही उस शख़्स से वापस पूछा, आपको कैसी लग रही है? उसका जवाब था, मुझे अच्छी लग रही है। मैंने कहा पूरी फ़िल्म देखने के बाद बताऊँगी कैसी लगी, अभी तो अच्छी ही लग रही है। गोपाल जो मेरे और उस शख़्स के बीच में बैठा था लगातार हँसता जा रहा था। कई बार उसे टोकना पड़ा, धीरे हँसो, आवाज़ हॉल में गूँज रही है। बीच-बीच में उसका अपना डायलोग भी चल रहा था। ‘दीदी सच में ऐसा होता है। अरे मैंने भी गाँव में सुना है बाईजी को लोग ऐसे ही बंदूक़ से नाचते-नाचते कई कार्यक्रम में मार देते हैं।’

ऐसा लगा वो शख़्स मुझमें कुछ ज़्यादा ही रुचि ले रहा था। इंटर्वल से पहले ही वो मेरे और गोपाल की बातों से समझ चुका था कि मैं इस फ़िल्म के डरेक्टर को कुछ जानती हूँ। हॉल में भी घुसी थी तो फ़िल्म का पोस्टर खोज रही थी। दिख ही नहीं रहा था। गोपाल से कहा पोस्टर तो लगा ही नहीं है, तभी उस शख़्स ने ही बताया, नहीं उस तरफ़ लगा हुआ है। वो शख़्स हमें पोस्टर के पास लेकर गया और उसने देखा भी मैंने पोस्टर की फ़ोटो भी खींच थी। गोपाल मेरे फ़ोटो खींचने की आदत से अब बहुत वक़िफ हो चुका हैं। हर जगह बोल ही देता है, ‘दीदी यहाँ की फ़ोटो खींच लो।’ इंटर्वल में उसने गोपल से पूछा भी क्या आपके रिश्तेदार हैं ये डरेक्टर? गोपल ने जवाब दिया था, दीदी जानती हैं उन्हें, मैं नहीं। जब फ़िल्म के अंत में फिर से रिटेन एंड डरेक्टेड बाई अविनाश दास आया तो इस बार वो शख़्स बोल पड़ा, ‘अरे ये फ़ोटो ले लीजिए आप उन्हें बता पाएँगी आपने फ़िल्म देखी है।’ मुस्कुरा पड़ी थी, बोली, नहीं मैं तो बस ऐसे ही लेती हूँ, उन्हें नहीं भेजना है।

फ़िल्म ख़त्म हुए और इस बार मेरी बारी थी उस शख़्स से पूछने की कि कैसी लगी आपको ये फ़िल्म?’

‘बहुत अच्छी थी, और आपको?’

‘मुझे भी बहुत अच्छी लगी।’

फ़िल्म ख़त्म हुई, दिल में बहुत बड़ा सकुन था। लगा ये अविनाश जी की नहीं मेरी परीक्षा हुई थी और मैं अच्छे नम्बर से पास भी हो गई और अविनाश जी दीदी के भरोसे पर भी पूरी तरह खरे उतरे थे। एक बहुत ही अच्छी फ़िल्म थी।

शुरू में मेरे अंदर की औरत की बेचैनी ने अंत में उसी औरत के अस्तित्व की चीख़ देखी थी। एक औरत जो हर जगह अकेली थी अकेली ही अपनी लड़ाई लड़ती है और जीत भी जाती है। कुछ लोग सहारा बन कर आते हैं पर अंत तक लड़ना उसे ही पड़ता है, क्यूँकि बात उसकी थी सिर्फ़ उसकी, और वो अपनी लड़ाई से भागती भी नहीं है। डरती ज़रूर है डर कर भाग कर वो दिल्ली जाती है, पर यही डर उसे समझाता है कि वो जितना डरेगी डर उसपर उतना ही हावी होगा। वापस वो आरा ही आती है उन्हीं लोगों के बीच अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए।

घर वापस आते समय सबसे पहले दीदी को फ़ोन लगाया। उसे बताना चाहती थी कि तू सही थी, पर बोला कुछ और।

‘दीदी मैंने फ़िल्म देख ली बहुत ही अच्छी हैं।’

‘अच्छा, चल मैं भी देखती हूँ, पर फ़रीदाबाद में एक ही हॉल में ये फ़िल्म लगी है वो भी १२.३० बजे का शो है उस समय जाना मुश्किल हो जाता हैं पर जाऊँगी ज़रूर और अविनाश का नम्बर व्हात्सप्प कर दे। नए फ़ोन में सारे नम्बर खो चुके हैं। फ़िल्म देख कर उसे पक्का बताऊँगी की फ़िल्म कैसी लगी।

दीदी को नम्बर व्हात्सप्प किया और साथ में अपने ऑफ़िस के व्हात्सप्प ग्रुप में भी कि मैंने फ़िल्म देख ली है। शनिवार को पूरे ऑफ़िस के ग्रुप के साथ ये फ़िल्म देखने का प्लान था। मेरे अलावा ऑफ़िस में संजय त्रिपाठी और अशोक ज्योति भी अविनाश जी से परिचित हैं। पर पता था अडल्ट फ़िल्म है इसलिए मन में सोचा था सबके साथ नहीं देखूँगी। पर बहाना कुछ और था और वो काफ़ी हद तक सही भी था की अब नहीं देख सकते हैं। अगर दिन के २ बजे प्लान बनायेंगे तो देखने के लिए जहाँ-जहाँ फ़िल्म लगी हुई है उसके बाद देर रात का ही शो है। उस शो को देखने के बाद हम सब अपने-अपने घर बहुत देर से पहुँचते, तो सब ने जाने से मना कर दिया। पर मैसेज़ भजने के बाद जैसा होता है वो ही हुआ, सबका मैसेज़ आना शुरू हो गया, ये ग़लत बात हैं मैम आपने कहा था सबके साथ देखेंगी और आप अकेले देख कर आ गई। अब फ़िल्म देख चुकी थी और आश्वस्त थी की मैं सबके साथ देख सकती हूँ, सो बोला, ठीक है कल फिर सबके साथ चल कर देख लूँगी।

अगले दिन हमारे कुछ लोगों का ग्रुप फिर से फ़िल्म देखने को तैयार था। जिसमें मैं और संजय त्रिपाठी ने ये फ़िल्म पहले से ही देख रखा था। १२.४५ के शो में भी हॉल ख़ाली था, हमें छोड़ कर सिर्फ़ चार लोग हॉल में थे। गोपाल भी साथ था सोचा वो नहीं देखेगा दुबारा, सुनते ही उछल पड़ा, मैं क्यूँ गाड़ी में बैठूँगा, नहीं मैं भी देखूँगा, आप दुबारा देख रही हैं तो मैं भी देखूँगा। टिकट ले कर हॉल पहुँचे तो देख कर हैरान थे हॉल के आस-पास कहीं भी इस फ़िल्म का पोस्टर नहीं लगा था। पूरा ग्रुप एक साथ ही जो हॉल में ज़िम्मेदार व्यक्ति दिखा (मालूम नहीं की वो हॉल का प्रशासक था या नहीं) उसपर चढ़ गया।

‘अरे फ़िल्म का पोस्टर क्यूँ नहीं है?’

‘वो नई आनेवाली फ़िल्मों की लगते हैं, जो फ़िल्म लग चुकी होती है उसका हटा देते हैं।’

‘ऐसा कैसे कर सकते हो, जब तक फ़िल्म चलती है पोस्टर होना चाहिए। कैसे पता चलेगा हम कौन सी और भी फ़िल्म देख सकते हैं।’

‘ठीक है देखता हूँ।’

हम सब हंस रहे थे। लोग अधिक थे सो हिम्मत भी कुछ ज़्यादा ही थी। बेचारा वो बंदा फ़िल्म का पोस्टर खोजने अंदर गया पर उसे पोस्टर नहीं मिला। कुछ देर बात उसने कहा आप लोग पिक्चर देखिए मैं खोज कर पोस्टर लगा देता हूँ।

माहौल अब पूरी तरह मस्ती का हो चुका था और कई बार मेरी हँसी रूकती ही नहीं सो वो दिन भी वैसा ही था, हँसी नहीं रुक रही थी। कभी उस बेचारे के पोस्टर खोजने का चेहरा याद आता और कभी लगता पूरा हॉल ख़ाली है। हम लोग नहीं आते तो शायद ये शो भी नहीं होता।  किसी ने टिकट भी नहीं चेक किया और हम हॉल में थे। १२.४५ का शो था और हम १२.३५ देख हॉल के अंदर घुसे थे। प्रमोद मक्कड ने कहा भी, कोई नहीं है, क्या हमारा जाना ठीक है। क्यूँ नहीं? हमारा गेट वन है और हम समय पर हैं। सीट पर बैठे हुए ५ मिनट हो चुके होंगे तब एक शख़्स जी पधारते है और गेट से ही कहते हैं अभी एंट्री नहीं थी। आप लोगों को बाहर जाना होगा। संजय त्रिपाठी गेट के पास खड़े थे सो उन्होंने ज़ोर से कहा, ये कह रहे रहे हैं अभी एंट्री का समय नहीं हुआ है।

अपने सीट पर बैठे-बैठे ही बोल पड़ी जो कि हॉल का बिलकुल दूसरा कोना था, ‘हम नहीं बाहर जाएँगे। आपलोगों ने क्यूँ नहीं पहले रोका। अब आप यहाँ आ कर टिकट चेक कर लें। हम नहीं आएँगे। बेचारा क्यूँ टिकट चेक करता, चुपचाप बिना टिकट चेक किए बाहर चला गया। फ़िल्म शुरू होने से पहले चार लोग और आ गए। भीड़ तो हमारी थी सो हम उनपर भारी थे। संजय त्रिपाठी बता चुके थे कल जब उन्होंने ग़ाज़ियाबाद में फ़िल्म देखी थी,  देखने वाले सब बिहारी ही थे और ज़्यादातर अविनाश जी से परिचित भी थे। लगा ये सब भी बिहारी होंगे। पूछ ही लेती हूँ कौन कहाँ से हैं। पहले शख़्स से पूछा आप कहा से हैं बोलें, ग़ाज़ियाबाद से।

‘आप ग़ाज़ियाबाद से इतनी दूर फ़िल्म देखने आए हैं?’

‘नहीं मैं रहने वाला ग़ाज़ियाबाद का हूँ पर दिल्ली में रहता हूँ।’ उसके उच्चारण में हरियाणवी साफ़ झलक रही थी।

अगला सवाल संजय त्रिपाठी का था, आप ये फ़िल्म क्यूँ देखने आए हैं?

‘बस टाइम पास करना चाहता हूँ।’

अब इस शख़्स की बातों में झल्लाहट साफ़ नज़र आ रही थी। पर इस शख़्स ने पूरी फ़िल्म के दौरान हम सबको बहुत परेशान भी किया। शिष्टाचारवश किसी ने कुछ बोला भी नहीं पर अगर हॉल भरा होता तो शायद पिट जाता। हर डायलोग पर अपना कॉमेंट देता और वो भी ज़ोर-ज़ोर से। ठीक उसी शख़्स के सामने एक और व्यक्ति भी आए। जो उस शख़्स के कॉमेंट के कारण बाद में सीट भी बदल लिए और काफ़ी आगे बैठ गए। दक्षिण भारतीय थे, उनसे पूछा आप फ़िल्म देखने क्यूँ आए, बोले सुना है की ये फ़िल्म बहुत अच्छी है। लगा चलो एक व्यक्ति तक तो पब्लिसिटी पहुँची, नहीं तो लग रहा था सिर्फ़ अविनाश जी के जानने वाले या बिहारी ही फ़िल्म देखने आयें हैं। वे दक्षिण भारतीय जिनका नाम राजू था। अभी तक हमारी बातों से ये जान चुके थे की हम डरेक्टर को जानते हैं। सो उसने पूछ ही लिया, क्या आप लोग डरेक्टर को जानते हैं?

‘नहीं हम लोग ज़बरदस्ती उनके पीछे पड़े हैं कि वो हमें जनता है,’ हँसतें हँसते ही मैंने उसे ये कहा।

हॉल में ख़ुद-ब-ख़ुद कुछ ऐसा हुआ की महिलायें पीछे और ठीक उनके अगले रो में पुरुष बैठे थे। ऐसे किसी योजना के तहत नहीं हुआ बस हो गया था। शुरू के सम्वाद और गाने के कारण अपनी महिला सहयोगी के चेहरे की बेचैनी साफ़ नज़र आ रही थी। ठीक वैसी ही जैसी मेरी कल थी। स्वेता ने कहा भी मैम ऐसा ही है क्या? नहीं कुछ देर में ठीक हो जाएगा। पीछे से मक्कड ने मुड़ कर कहा, ‘शुक्र है, तिवारी जी हमारे साथ नहीं आये नहीं तो गाली दे रहे होते, कौन सी फ़िल्म दिखाने ले आए हो? पंडित आदमी हैं।’ चुप थी पर जानती थी कि ये सब कुछ देर की बात है।

फ़िल्म के इंटेरवेल में सबसे पूछा कैसी लगी। जवाब सबका वही था, बहुत अच्छी। फ़िल्म सच में बहुत ही अच्छी है। अभिनय सबका लाजवाब, सारे के सारे वही अभिनेता हैं जो अपनी ऐक्टिंग के लिए जाने जाते हैं। चाहे, स्वरा भास्कर हो या संजय मिश्रा या पंकज त्रिपाठी। पर सबने इस फ़िल्म के माध्यम से अपने काम का और लोहा मनवाया है। कही भी ओवरऐक्टिंग नहीं नज़र आई और न ही ये लगा किसी को ऐक्टिंग करनी नहीं आती है। पर ये तो वो थे जिन्हें सब जानते हैं मुझे उन छोटे-छोटे कलाकारों ने ज़्यादा छुआ जिनको अभी तक मैंने कभी भी नहीं देखा था, नाम सुनना तो दूर की बात। चाहे वो अनार का साथ देने वाला अनवर या धर्मेन्द्र का साथी मफलरवा या पुलिस या उनके सहयोगी सुखिया और दुखिया या अनारकली का प्रशंसक हिरामन। इसमें तो डरेक्टर को श्रेय देना होगा की पात्रों पर उन्होंने बहुत मेहनत की है। हर इंसान लगा की वो इसी रोल के लिए बना और पैदा हुआ है।

ऐसा नहीं है की फ़िल्म में मुझे कोई कमी नहीं दिखी। कई जगह लगा की अविनाश जी और अच्छा कर सकते थे। स्वरा ने बहुत अच्छी एक्टिंग की है इतनी अच्छी की शायद ये फ़िल्म उनकी गिनी चुनी यादगार फ़िल्मों में आए, पर इस फ़िल्म में एक जगह वो अपनी फ़िल्मी माँ से हार चुकी है। नाचने के कौशल में उनकी माँ का किरदार निभाने वाली अदाकारा ने उन्हें कहीं पीछे छोड़ दिया है। साड़ी में उन्होंने इतनी ख़ूबसूरती से अपने नाचने के छोटे से  किरदार को निभाया है की लगा ही नहीं कोई फ़िल्म का कोई हिस्सा है, उनके नाचने में एक ग्रेस (grace) था। लगा सही में किसी बहुत ही अच्छी बाईजी का स्टेज पर नाच देखा है। पूरी तरह से लाजवाब था। उनके वो डान्सिंग स्टेप्स आँख में जैसे बस गए जो फ़िल्म के अंत में नहीं शुरू में थे। फ़िल्म का अंत तो सबको याद रहता है अगर शुरुआत याद रहे तो फ़िल्म की बहुत बड़ी कामयाबी मानी जाएगी।

शायद इसी कारण फ़िल्म के क्लाइमैक्स में एक कोरियोग्राफर यानी एक नृत्य-निर्देशक की कमी महसूस हुई । लगा स्वरा के इस जानदार अभिनय के साथ अगर उतना ही जानदार नृत्य होता तो सोने पे सुहागा होता। नृत्य बुरा नहीं था पर वही बात की क्लास में अगर आपको किसी विद्यार्थी से १०० में से १०० आने की उम्मीद हो और वो ९५ ले आए तो बहुत दुःख होता है। बस कुछ ऐसा ही मेरा हाल था, लगा स्वरा के ये पाँच नम्बर डरेक्टर साहब ने क्यूँ कटवा दिए।

क्लाइमैक्स में जब पीछे एमएमएस का सीन भी चल रहा था तो भी लगा ये तो वो ही सीन हैं जो हमने फ़िल्म में पहले देखा है। एमएमएस का तो ऐंगल अलग होना चाहिए। निर्देशक एक और कैमरा रख सकता था, एमएमएस के ऐंगल को दिखाने के लिए। इतनी रीयलिस्टिक फ़िल्म में इसे रियल दिखाने में कैसे चूक कर गए अविनाश जी? ये भूल कैसे  कैसे हो गई? पर इन्हें अगर ग़लतियाँ हम सब माने तो भी ये बहुत ही अच्छी फ़िल्म है।

महिलायों को अपनी बात कहना सिखाती है ये फ़िल्म। वो बात जो कई बार हम नहीं कह पाते और मन मसोस कर रह जाते हैं कि काश कह दिया होता। बेचैन करती हैं अपनी ही अंतरात्मा क्यूँ नहीं कहा। भागना किसी भी समस्या का निदान नहीं है। जितना भागेंगे समस्या उतना ही पीछा करेगी। रुक कर उनका सामना करना होगा और जीत भी तभी मिलेगी, भागने से तो हार निश्चित है।

इस फ़िल्म का एक  डायलोग सबको ज़रूर पसंद आएगा कि किसी भी काम को देश से जोड़ दो, खा लीजिए देश के लिए, देख लीजिए देश के लिए। हिरामन ये अक्सर कहता है। देश की वर्तमान स्थिति पर ये बहुत बड़ा कटाक्ष है पर मैं ये कहूँगी कि जिन्होंने नहीं देखी है ये फ़िल्म ज़रूर देख कर आइये, देश के लिए नहीं ख़ुद के लिए। अगर आप पुरुष हैं तो जानिए महिलाओं का सम्मान सिर्फ़ कुछ औरतों का सम्मान नहीं हैं और अगर महिला है तो जानिए भागना निदान नहीं है। रहना इसी समाज में है और बोलना भी इसी समाज को है।

चाहती थी कि सब कलाकारों के नाम मुझे मिल जाते। किसी कलाकार को और नहीं तो उनके नाम के साथ इस लेख में डालती। ये उनके प्रति मेरा सम्मान होता। ये फ़िल्म की समीक्षा नहीं है दे भी नहीं सकती समीक्षा, फ़िल्म के बारे में न के बराबर जानकारी है। पर जो समझ आया लिख दिया। अविनाश जी को व्हात्सप्प भी किया की कलाकारों के नाम दे दीजिए, पर लगता है वो कुछ ज़्यादा ही फ़िल्म के ख़ुशी के जश्न में डूबे हुए हैं, जवाब नहीं आया। ख़ैर बड़े लोगों की  बड़ी बड़ी बातें। मैंने अपना काम किया आपकी फ़िल्म देखा ली और जो लगा वो लिख दिया।

अपनी बात को मैं मिस्टर राजू की बात से ख़त्म करना चाहती हूँ। इस संदेश को मोबाइल पर रिकार्ड करने की कोशिश की पर क़िस्मत इस बार मेरे साथ नहीं थी और लगा की रिकार्ड हो रहा है, पर वो ऑफ़ था, जब थैंक यू बोल ऑफ़ किया तो उस समय वो आन हुआ। सो कुछ सेकंड की रिकॉर्डिंग अभी भी मेरे मोबाइल में है। राजू जी ने निकलते हुए कहा था, ‘convey the director my message that he has made a lovely film on a bold topic and he should countinue doing so (निर्देशक तक मेरा संदेश पहुँचा  दीजिएगा कि उन्होंने एक बहुत ही प्यारी फ़िल्म एक साहसिक विषय पर बनाई है और वो ऐसा करना जारी रखें)'।


Friday, 24 March 2017

आर जे रौनक़ किम्वदंती कोई हास्यास्पद शब्द नहीं है

कल सुबह लगभग सवा दस बजे जब ऑफ़िस के कुछ पास पहुँच गई तो गोपाल को कहा, अरे गाने तो लगा दो, आज तो तुमने रेडीयो चलाया ही नहीं। जवाब था, आप फ़ोन पर किसी से बात कर रही थीं इसलिए बंद कर दिया था।

किसी को फ़ोन पर बात करते सुन वो रेडीयो ख़ुद-ब-ख़ुद बंद कर देता है। कहा, कोई बात नहीं, चला दो एक गाना तो सुन ही लूँगी। गोपाल ने गाड़ी का एफ-एम रेडीयो चालू किया ९३.५ स्टेशन था। एक आवाज़ को पहचान गई, आर.जे. रौनक़ की थी, पर दूसरी आवाज़ नहीं पहचान पाई।

रेडीयो जब चालू हुआ तो वो दूसरी आवाज़ ही कुछ बोल रही थी और बोलने में उसने कहा, नहीं ये किम्वदन्ती है।  रौनक़ जी ने ये किम्वदन्ती शब्द को ऐसे पकड़ा जैसे कोई नया चुटकुला हाथ लगा गया है, और उनका परिहास शुरू, किम्वदन्ती? दूसरी आवाज़ किम्वदन्ती शब्द, आर.जे. रौनक़ के मुँह से सुनकर कुछ झेंप-सी गई।

‘हाँ किम्वदन्ती’

‘किम्वदन्ती, किम्वदन्ती’ रौनक़ उर्फ़ बऊआ जी रटे जा रहे थे और दूसरी आवाज़ की आवाज़ में झेंप साफ़ नज़र आ रही थी। बस यही क्रम जारी था और जैसा अक्सर होता है, एफ-एम का अपना ब्रेक और कुछ देर बाद मेरा ऑफ़िस। सो गाड़ी से उतर गई जान ना सकी ये दूसरी आवाज़ किसकी थी और न ही इस कार्यक्रम की ही कोई जानकारी ले सकी। गाड़ी में अपना ही गाना ज़्यादा सुनती हूँ, पेन ड्राइव में लोड होता है, एफ-एम कभी-कभार ही बजता है। एक डेढ़ घंटे के रास्ते में भी एफ-एम से तीन-चार गाने ही सुन पाते हैं और पूरे टाइम उनका विज्ञापन का ब्रेक। और सच कहूँ तो मुझे आर जे की बक-बक भी नहीं पसंद, गाना सुनाना हैं तो सुनाओ। तुम्हारी बक-बक के लिए नहीं, गाना सुनने के लिए एफ-एम चलाया है।  

पर कल एफ-एम चलाया था। पर रौनक़ महाशय को सुन कर बहुत ही अजीब लगा, ये क्या तरीक़ा है? बात करने और मज़ाक़ बनाने के लिए, माना रौनक़ जी जाने जाते होंगे या हैं। कभी-कभी उन्हें सुना भी है, आर जे रौनक़ का बऊआ, मुझे पसंद है और मुझसे ज़्यादा मेरे पतिदेव को। शायद इसका एक कारण ये भी है की मैं बिहार से हूँ और बिहार में ये नाम बहुत ही प्रचलित है। मेरे अपने घर में यानी अपने रिश्तेदारी में ही बऊआ है। मेरे ममेरे भाई का घर का नाम बऊआ ही है। घर में सबसे छोटा था इसलिए नाम बऊआ ही रह गया। अभी एक अच्छी कम्पनी में ज़िम्मेदार पोस्ट पर है पर सबके लिए आज भी वो बऊआ ही बना हुआ है।

पर कल बऊआ जी का मज़ाक़ मज़ाक़ नहीं उपहास लगा, वो भी हिंदी भाषा पर। इतना मुश्किल शब्द नहीं है ‘किम्वदन्ती’ रौनक़ जी। हाँ, हो सकता है आपने नहीं सुना हो। कई प्रचलित शब्दों से भी कई बार हम माहौल के कारण अनजान रहते हैं। मेरी बातों पर यक़ीन नहीं होता हो तो रोड पर चले जाइए और ग़रीब दिखने जैसे किसी भी व्यक्ति से इस शब्द का मतलब पूछियेगा। दावे के साथ कह सकती हूँ दस में से तो पाँच तो आपको ज़रूर जवाब दे ही  देंगे।

चलिए संदर्भ बदलते हैं रौनक़ जी, मानिए दूसरा वक़्ता अंग्रेज़ी में बोल रहा होता तो आप या शायद मैं भी क्या करती? उस शब्द को ध्यान से सुनते और उससे पूछने की भी हिम्मत नहीं करते की इसका क्या मतलब है। उस शब्द को मौक़ा देख शब्दकोश में खोजते और फिर उसका इस्तेमाल ख़ुद भी करते।  

अंग्रेज़ी की अज्ञानता दिखाने में हमें शर्म आती हैअंग्रेज़ी ज्ञानियों की भाषा जो ठहरीपर अपने अनुभव से कह सकती हूँ कि हम हिंदुस्तानी अंग्रेज़ों से भी अच्छी अंग्रेज़ी जानने लगे हैंअंगेज़ी के ऐसे-ऐसे शब्द को सीख रहे हैं जो कई बार अंग्रेज़ों को भी हैरान कर देते हैं। हाँ, वो शब्द शब्दकोश में ज़रूर हैं अगर इसी रफ़्तार से हम चलते रहेंगे वो दिन दूर नहीं जब हम सब शेक्सपीयर की अंग्रेज़ी से भी अच्छी अंग्रेज़ी बोलने लगेंगे

पर हिंदी का ये उपहास वो भी हमारे हिंदी में ही कार्यक्रम करने वाले आर जे के द्वारा। कुछ अच्छा नहीं लगा। माना आपलोगों को कामचलाऊ हिंदी ही बोलनी है, आपका टर्गेट ग्रुप भी शायद ऊँच मध्य-वर्ग और मध्य-वर्ग ही है। पर अगर हम अपनी भाषा का आदर नहीं करेंगे तो कौन करेगा। हमारी संस्कृति दूसरों का आदर करना सिखाती है पर अपनों का निरादर करना भी नहीं सिखाती। हिंदी हमारी माँ है, अपनी सगी माँ और अंग्रेज़ी हमारे दोस्त की माँ है। अपनी माँ को इज़्ज़त दिए बिना दोस्त की माँ का इज़्ज़त करना बेमानी है, और अगर आप अपनी माँ का इज़्ज़त नहीं करेंगे, तो कोई भी नहीं करेगा। लोग देखा-देखी इज़्ज़त भी देते हैं और न करना और करना सीख  भी जाते हैं।

अगर ये हाल रहा तो लगता है धीरे-धीरे हिंदी की हालत भी संस्कृत जैसी ही हो जाएगी, या एक पूरी तरह से नई हिंदी बने जिसमें सिर्फ़ वाक्य का आधार हिंदी हो और सारे के सारे शब्द अंग्रेज़ी के। हम क्यूँ इतने अच्छे-अच्छे शब्दों को खोते जा रहे हैं। हिंदी भी कहीं संस्कृत की तरह सिर्फ़ किताबों में पाई जाने वाली भाषा और शब्द बन कर न रह जाए और कुछ दिनो में स्कूल भी संस्कृत की तरह हिंदी को हटाने की सिफ़ारिश करे क्यूँकि विदेशी भाषा बच्चे सिखना चाहते हैं। बच्चों की मजबूरियाँ हैं गलाकाट और गलाघोट प्रतियोगिता और स्पर्धा जो है ज़िंदगी जीने के लिए। ऊपर से शिक्षकों  और माता-पिता का दबाव। पर हैरानी बड़ों को देख ज़्यादा होती है, अगर कोई सरकार संस्कृत स्कूल में लाना भी जाहे तो बड़े भी उनके विरोध में उमड़ पड़ते है। जैसे अपनी ही भाषा से वो मुक्ति चाहते हो। अगर हम अपनी भाषाओं को नहीं बचाएँगे तो कोई बाहर से इस बचाने के लिए नहीं आएगा और अगर आ भी गया तो मेहरबानी उसकी, पर भाषा हमारी है, धरोहर हमारी है, तो बचाना भी हमारा ही धर्म है।

मानती हूँ कई बार सही में बहुत मुश्किल शब्दों का सामना करना पड़ता है पर वो सारे शब्द मुश्किल हैं जिन्हें हम नहीं जानते हो, हिंदी हो या अंग्रेज़ी। एक बार जान लीजिएगा तो आसान हो जाएगा और इस्तेमाल करने से बहुत ही आसान। दो-तीन साल पहले एक बार दसवीं के बच्चों की भीड़ में थी, बोर्ड का परीक्षा थी और हिंदी की परीक्षा दे कर बच्चे बाहर आए थे। बच्चे दिल्ली के बिरला विद्या निकेतन में पढ़ते थे। उनकी बातें सुन रही थी, अरे वो मुहावरा था न, ‘दाल में कुछ काला होना’ उसका क्या मतलब था, पूरे ग्रुप को ये मुश्किल लग रहा था। लगा इतना आसान मुहावरा बच्चों को क्यूँ मुश्किल लग रहा है। हिंदी मैंने भी सिर्फ़ दसवीं तक ही पढ़ी है पर ये तो रोज़मर्रा की बोली में बोला जाने वाला मुहावरा है। फिर लगा मैं ग़लत सोच रही हूँ। ये बच्चे जिस माहौल से आते हैं वहाँ हिंदी वैसी नहीं बोली जाती जैसा मैं सोच रही हूँ, उनका स्कूल और घर भी बदल चुका है। उनके लिए ये मुहावरा मुश्किल कर दिया है उनके माहौल ने।

पर कुछ दिन पहले अपनी छोटी बहन के छः साल के बच्चे के मुँह से अच्छी हिंदी सुन कर हैरान थी। पत्र, ख़ुफ़िया कुछ ऐसे शब्द बोल रहा था जो आदतन आज कल के अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे नहीं बोलते। लगा मेरी बहन इसके साथ शायद हिंदी को लेकर मेहनत कर रही है, फिर उससे पूछ ही लिया। जवाब सुन कर हैरान थी, अरे नहीं दीदी आजकल ये छोटा भीम बहुत देखता है ये उसी का नतीजा है। बच्चों के कार्टून चैनल ने भी अब शहरी हिंदी बोलना शुरू कर दिया है। ख़ुशी हुई इस भीड़ में भी छोटा  भीम है जो बच्चों को सही हिंदी सिखा रहा है। तब से सोच ही रही हूँ कि छोटा भीम देखूँगी पर समय के अभाव के कारण देख ही नहीं पाई। बच्चे क्या बड़े भी भाषा को सुन-सुन कर पकड़ते हैं। जो सुनते हैं वही बोलना सीखते हैं।

आपको ये इसलिए बोल रही हूँ कि आप ऐसी जगह पर हैं जहाँ लोग आपको सुनते हैं। अच्छा लगता, जो शब्द आपको नहीं मालूम था वो आप बोलने वाले से पूछ लेते उस शब्द का क्या मतलब था, और अपने सुनने वालों को भी बता देते, कहते देखिए इस जनाब ने मुझे आज हिंदी का एक शब्द सिखाया है। उपहास करके नहीं एक आदर के साथ, तो शायद वो भाषा जिसकी आप रोटी खा रहे हैं और अपनी बात लोगों तक पहुँचा रहे हैं, का कुछ भला हो जाता। आपके वो सुनने वाले जिन्हें इस शब्द का मतलब नहीं मालूम है वो भी इसका मतलब जान जाते। कुछ हँसी मज़ाक़ के साथ ज्ञान मिल जाए तो क्या बुरा है।

लिखने को मजबूर तब हुई जब कल शाम को भी घर जाते वक़्त १०४.८ एफ-एम चल रहा था, प्रोग्राम का नाम इश्क़ कमीने। ट्विटर पर मस्त थी, तभी सुना की किसी महिला ने कुछ बोला और इस प्रोग्राम के आर जे डॉक्टर वी सी ने कहा, कुछ देर में हमें ये हिंदी का व्याकरण भी  सिखा देती। कमीने, लोंडे ऐसे शब्दों का हम बिना लिहाज़ किए कितना प्रयोग करते रहते हैं अपने कार्यक्रमों में, लेकिन अच्छी हिंदी बोलना क्यूँ उपहास बन जाता है? हिंदी का व्याकरण सही में मुश्किल है। दो साल से कोशिश कर रही हूँ, पर आज भी लिखने-बोलने और ख़ास कर जल्दी-जल्दी लिखने-बोलने में स्त्रीलिंग और पुल्लिंग की बहुत ग़लतियाँ करती हूँ। पर हिंदी नहीं आना गर्व की बात कब से हो गई है और अच्छी अंग्रेज़ी बोलना ज्ञान। जबकि सच्चाई ये भी है कि  शहर और गाँव की हिंदी आज भी अलग हैं। हाँ, अब टीवी के कारण गाँव में भी लोग अंग्रेज़ी के शब्दों का अत्याधिक इस्तेमाल करने लगे हैं पर जिस हिंदी को हम आम हिंदी समझते हैं वो आज भी शहरी मध्य-वर्ग या ऊँच मध्य-वर्ग की ही हिंदी है, हर उस आम कहे जाने वाले लोगों की नहीं।

आज फ़्रान्स अपनी फ़्रेंच को सुधारने के लिए लगातार कुछ फ़्रेंच शब्दों का आविष्कार कर रहा है, उसे अंग्रेज़ी से परहेज़ है। हमें अंग्रेज़ी से परहेज़ नहीं है, होनी भी नहीं जाहिए, पर कई बार लगता है क्यूँ हम हिंदी ने नए नए शब्द नहीं बनाते। अभी तक हम कॉलेज में पढ़ने और पढ़ाने के लिए ढंग की विज्ञान की किताब तक नहीं बना पाए और इतने प्यारे प्यारे शब्द जो हमारे पूर्वजों ने कितनी मेहनत और समय खपा कर निकाले और बनाए उसे भी हम खोते जा रहे हैं। बहुत ख़तरनाक है ये, आर जे रौनक़ आप हिंदी का नहीं, अपने अस्तित्व का उपहास कर रहे हैं।

इसी उम्मीद के साथ लिखना बंद कर रही हूँ कि अगली बार अगर आप हिंदी के किसी शब्द को सुने जिसका मतलब आपको नहीं मालूम हो तो उसका उपहास करने की बजाये ख़ुद भी जाने और लोगों को भी उसका मतलब बताएँ। हिंदी के प्रति कुछ कर्तव्य हम सबका है, ये हमारी पहचान है हमारे हिंदुस्तानी होने की भी पहचान है।