Monday, 17 December 2018

हमसफ़र कभी खुद को भी बना लीजिये

हमसफ़र कभी खुद को भी बना लीजिये
रास्तों पे भी मंजिल का मज़ा लीजिये

दुनिया के खातिर कब तक यूँ सजेंगे
आईने के लिए भी खुद को सज़ा लीजिये

सूरज को अब हम भी पहचाने हैं जनाब
सैकड़ों दीपक आप चाहे जला लीजिये

इश्क़ वक्त के साथ खुद को बदलता बहुत है
रूहानी बातों से बस खुद को बहला लीजिये

टूट कर कोई शीशा जुड़ता है कहाँ
हो सके तो खुद को ये समझा लीजिये  



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