Monday, 16 March 2020

मुझे चाहिए आज़ादी खुद को भुलाने के लिए

मुझे चाहिए आज़ादी खुद को भुलाने के लिए
मुझे चाहिए आज़ादी खुद से दूर जाने के लिए

खुद से किये सवाल क्यूँ ख़त्म होने का नाम न ले
खुद को दिए दर्द क्यूँ भरने का इल्जाम न ले

इतनी जद्दोजहद के बाद भी क्यूँ खुद को मैं समझा न सकूँ
इतनी कोशिशों बाद भी क्यूँ खुद का विश्वास मैं पा न सकूं 

क्यूँ  खुद से ही अब इतना डरने लगी हूँ
क्यूँ  खुद से ही हर वक्त मैं लड़ने लगी हूँ 

हाँ मुझे चाहिए आज़ादी इस खुद को मिटने के लिए 
हाँ मुझे चाहिए आज़ादी इस खुद को हटाने के लिए 


नफरतों के इस दौर में मोहब्बत गुनाह है

नफरतों के इस दौर में मोहब्बत गुनाह है
झूठ का ये शहर है यहां सच गुनाह है 

लोग जलते हुए शहर जलता हुआ
पानी यहां पाप है आग बुझाना गुनाह है

गिरते हुए को यहां और गिराया जायेगा 
यहां पैर उठाना माफ़ है हाथ बढ़ाना गुनाह है

दोस्ती भी अब मुखौटों में पाई जाएगी
बुराई ख़ुशी से साथ है पर उसे दिखाना गुनाह है

बेचिये यहां आप सबकुछ बेच पाएंगे
पर आवाज बेआबरू है बाजार सजाना गुनाह है 





Saturday, 14 March 2020

थक चुकी हूँ ज़िन्दगी तेरे बे-वक्त के सवालों से

थक चुकी हूँ ज़िन्दगी तेरे बे-वक्त के सवालों से
सच कहती हूँ मेरा नाता नहीं उल्झे हुए जवाबों से

कहानियां वो भी परियों की अब मुझे सताती है
मर जाता है हर राक्षस, ये झूठ वो भी किताबों से

भींज कर मुट्ठी क्यूँ खड़े हुए हैं आप
वक्त का रिश्ता नहीं ख्यालों- ख्वाबों से 

ख़ाली लिफाफों को आज भी क्यूँ संजोया करती हूँ
बहुत राज छुपे हैं इसमें बहुत उम्मीद बंद लिफाफों से

वो जलती रही, चीखती रही चिल्लाती रही 
लोग समझें क्या रौशनी निकली है पटाखों से

वक्त रुक कर भी हर वक्त चलता रहता है
ये बात फिर बहार आई जेल की सलाखों से

Monday, 27 January 2020

कुछ ख्वाबों का दिल तोड़ देते हैं

कुछ ख्वाबों का दिल तोड़ देते हैं 
कुछ अरमानों से मुँह मोड़ लेते हैं 
सच और झूठ से अब और कितना लड़े
कुछ वक्त की अंगड़ाइयों पे छोड़ देते हैं

कुछ ख्वाहिशों के बोझ ने कितना सताया
कुछ सपनों ने भी कितनी रात जगाया 
वक्त से ही क्यूँ करे सब शिकवे-गीले 
इन भारी-भरकम बेड़ियों को तोड़ देते हैं

इस दुनिया को हम छोड़ सकते नहीं 
आसमान पे इक दुनिया जोड़ सकते हैं
तो क्यूँ उल्झे जहन में उपजे सवालों से 
अपनी इन नादानियों को झकझोर देते है

ये भरम है की ये हो सकता था
ये भी नहीं की कोई साथ रो सकता था
जो न हुआ वो कभी होगा भी नहीं 
इस इक बात को जीवन में ओढ़ लेते हैं

हम जानते हैं बहुत मुश्किल है कुछ छोड़ देना
हम मानते हैं बहुत मुश्किल है कुछ तोड़ देना
पर किसी पे नहीं हमारा खुद पे ही इख़्तियार है
इसी सच को दिल से मज़बूती से जोड़ लेते हैं 

Saturday, 25 January 2020

सच की उम्मीदों के साये में हम चल रहे हैं

सच की उम्मीदों के साये  में हम चल रहे हैं
पर अजीब है न हम झूठ को देख मचल रहे हैं

ये सच है सच हर बार किसी को तोड़ ही जाता है
हाँ ये सच है कुछ झूठी मुस्कानों से ही पल रहे हैं

माना झूठ एक दिन हमे बहुत रुलाएगा, छोड़ जायेगा
तो क्या सच की बदौलत हर रोज़ हम बे-मौत मर रहे हैं

हर सच जानते हैं हम, हमें अपनी कसम
फिर क्यों झूठी उम्मीदों के सहारे बढ़ रहे हैं 

झूठ आज भी दिल को क्यूँ सुकून पहुंचता है 
सच आज भी क्यूँ हमें नाउम्मीदी में जकड़ रहे हैं

सच ये भी की सच और झूठ में फर्क है अब कहाँ
सच ये भी की हालात सच-झूठ के मायने बदल रहे हैं

छोड़ दो हमें झूठे हौसलों की बातें बताना
हम छोड़ते हैं सच्ची कहानियाँ जो गढ़ रहे हैं