Sunday, 23 July 2017

किस काम की ये ज़िंदगी जहाँ सो भी न पाइये

किस काम की ये ज़िंदगी जहाँ सो भी न पाइये 
कुछ सुकून तो हर शख़्स को ज़िंदगी में चाहिए

न ज़ुस्तजु न उम्मीद खुदा कैसी ये ज़िंदगी 
हक़ीक़त न सही कुछ फ़साने ही सुनाइए   

जी हुज़ूर कहने से कोई शनशाह बन गया 
अज़ी मुग़ालते की दीवार इतनी मत सजाइए

हो सके तो लिखने की कोशिश न करे 
कलम को कई बार बग़ावत भी चाहिए  

हमने माना हम गुनाहगार थे हमें इश्क़ था हुआ
पर आप तो बेगुनाह हैं ख़ुद को मत सताइए 

हमने कब कहाँ आपको इश्क़ था हुआ 
पर ये बात आप अब ख़ुद को समझाइए 

वक़्त सबके गुनाहों को माफ़ न कर पाएगा
आप अब और समय थाने में मत बिताइए  

कोई तो इलाज होगा कोई तो होगी दवा
हमसे न सही किसी और से मंगवाइए

लीजिए छोड़ दी आपकी गली आपका शहर
अब तो आप कुछ दिन इत्मिनान से बिताइए

अपनी ही सोचिए अपनी ही बोलिए हुज़ूर 
किसी और की बातों से इसे मत उलझाइए 


  


Monday, 10 July 2017

ख़्वाबों -ख़यालों की गर बात है तो बात बहुत हैं

ख़्वाबों -ख़यालों की गर बात है तो बात बहुत हैं 
कहानियों के साथ तो ज़िंदगी में जज़्बात बहुत हैं 

उम्मीद से आप क्यूँ इतनी उम्मीद लगाये बैठें हैं 
वो एक पल में बदल जाएगी उसके ताल्लुकात बहुत हैं

हर सवाल का जवाब ख़ामोशी हो सकती नहीं 
अब कैसे बताएँ खमोशी के भी फ़साद बहुत हैं

लफ़्ज़ सील लिए तो आँसू बोल पड़े 
न कही बातों के पास आवाज़ बहुत है

ज़ख़्म जिस्म का भर गया दिल का भरता नहीं 
क्या करे इस दिल के मुआमलात बहुत हैं 

किसी की बातों का हम पे असर होता नहीं 
हमें अपने आप पर आज भी विश्वास बहुत है



  
  

Saturday, 8 July 2017

घरों की बातें महफ़िल में सुनाई नहीं जाती

घरों की बातें महफ़िल में सुनाई नहीं जाती 
हर बात लोगों को सरे आम बताई नहीं जाती 

मकान बना कर भी हमने देख लिया 
घर ईंट-पत्थरों से बसाई नहीं जाती 

जाते हुए न मूड के देखा उसने एक बार 
और हमसे एक निशानी हटाई नहीं जाती

चलिए अब ज़िंदगी को एक नया मोड़ दे
ज़िंदगी ख़्वाबों-ख़यालों से बिताई नहीं जाती 

बहुत हुए जीने के वो किताबी फ़लसफ़े 
किताबी बोझ ज़िंदगी से उठाई नहीं जाती 



Friday, 7 July 2017

समझने-समझाने की जंग कितनी बड़ी है

समझने-समझाने की जंग कितनी बड़ी है
दिल के अहसासों पर लफ़्ज़ों की बेबसी हैं

कभी लगे परेशानियों से हम अब हार जाएँगे
कभी लगे ज़िंदगी इनके दम पर ही चल रही है

कितनी वाही-तबाही दिल-दिमाग़ में हम बिठाएँ
बस एक कूड़ेदान की जिस्म में आज भी कमी है

बहुत ज़रूरी था कल वो सब बोल देना
जो आज बोलने की बात ही नहीं रही है

बहुत ज़ख़्म खाएँ हैं हमने इंसानों से
इसलिए कुछ दूरी सबसे बना रखी है

न इंतिज़ार न तलाश इन आँखों को
कैसे कहें ये बेजान सी क्यूँ लगी है

या तो आप अंदर आएँ या बाहर जाएँ 
दरवाज़े पे खड़े होने की इजाज़त नहीं है  




Thursday, 6 July 2017

बस एक लफ़्ज़ से कहानी उलझ गई

बस एक लफ़्ज़ से कहानी उलझ गई
इश्क़ के नाम से जिंदागानी उलझ गई

सोच से किसी को कहाँ कुछ हासिल हुआ  
पर इस सोच से अब परेशानी उलझ गई

ग़लतियों ने हर बार प्यार से समझाया हमें
पर इक ग़लती से मेरी शैतानी उलझ गई

किस काम का ये जश्न और ये जुनून
जश्न-ए-शाम से गर जवानी उलझ गई

आवाज़ों की दुनिया में सन्नाटे की चाहत थी
पर दिल की ख़ामोशी से वीरानी उलझ गई

हार से ज़िंदगी सबकी आज भी नाशाद है
जीत से लेकिन हमारी पशेमानी उलझ गई


Saturday, 1 July 2017

हर तरफ़ कोई टूटता हर तरफ़ कोई तोड़ता नज़र आ रहा

हर तरफ़ कोई टूटता हर तरफ़ कोई तोड़ता नज़र आ रहा
जिसे देखिए कुछ समझ रहा जिसे देखिए कुछ समझा रहा

भेड़ और भेड़िये की पहचान अब एक सी
हर कोई धोखा दे रहा हर कोई धोखा खा रहा

कोई अब किसी को आज़मायें तो कैसे भला
कहीं दुश्मन दोस्त बन मिला कहीं दोस्त दुश्मन नज़र आ रहा

दायरों की रौशनी अब दिखती ही नहीं
आदमी ख़ुद में सिमट रहा आदमी ख़ुद को फैला रहा

वक़्त की पहचान अब और न हो पाएगी
वही वक़्त निशां बना रहा वही वक़्त निशां मिटा रहा

झूठ और सच का फ़ैसला अब ना हो पाएगा
कभी झूठ सच्चा सा लगे कभी सच झूठ से घबरा रहा 

बस ये कह कर हम चुप हो जाएँगे
हर शख़्स कुछ दिखा रहा हर शख़्स कुछ छुपा रहा