किस काम की ये ज़िंदगी जहाँ सो भी न पाइये
कुछ सुकून तो हर शख़्स को ज़िंदगी में चाहिए
न ज़ुस्तजु न उम्मीद खुदा कैसी ये ज़िंदगी
हक़ीक़त न सही कुछ फ़साने ही सुनाइए
जी हुज़ूर कहने से कोई शनशाह बन गया
अज़ी मुग़ालते की दीवार इतनी मत सजाइए
हो सके तो लिखने की कोशिश न करे
कलम को कई बार बग़ावत भी चाहिए
हमने माना हम गुनाहगार थे हमें इश्क़ था हुआ
पर आप तो बेगुनाह हैं ख़ुद को मत सताइए
हमने कब कहाँ आपको इश्क़ था हुआ
पर ये बात आप अब ख़ुद को समझाइए
वक़्त सबके गुनाहों को माफ़ न कर पाएगा
आप अब और समय थाने में मत बिताइए
कोई तो इलाज होगा कोई तो होगी दवा
हमसे न सही किसी और से मंगवाइए
लीजिए छोड़ दी आपकी गली आपका शहर
अब तो आप कुछ दिन इत्मिनान से बिताइए
अपनी ही सोचिए अपनी ही बोलिए हुज़ूर
किसी और की बातों से इसे मत उलझाइए