Wednesday, 25 April 2018

न पढ़ सकोगे जिन्हें उन किताबों सी हूँ

न पढ़ सकोगे जिन्हें उन किताबों सी हूँ
सवाल खोजती उलझी जवाबों सी हूँ

अँधियों में चोट खा के जो मुस्कुराएं
कुछ टूटे पंखुड़ियों वाले गुलाबों सी हूँ

इश्क को छोड़ अब हम जायेंगे कहाँ
इश्क़ से उलझी इश्क़ के ख्वाबों सी हूँ

हर निगाह हमसे बस सवाल है लिए
कैसे कहूं हुस्न पे पड़े हिजाबों सी हूँ

वक्त न ले सकेगा हमसे कोई हिसाब
मैं किस्मत के बंद पड़े लिफाफों सी हूँ   

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