बे-सबब कोई बात बढती कहाँ है
हवा बिन झरोखें गुजरती कहाँ है
हमारे होने न होने से क्या फर्क पड़ता है
किसी की बेबसी वक्त पे चढ़ती कहाँ है
अपने ही घर में अजनबी से हम
दिल की बात निकलती कहाँ है
बहुत ज़ख्म खाएं हैं इन हथेलियों ने
हाथ बढ़ाने से भी ये मचलती कहाँ है
एक गुल के बाग़ से टूट जाने से
अति उत्तम!बहुत अच्छा शब्दों का तानाबाना!
ReplyDelete