एक दीया हमने फिर जला दिया
दिल के गम को कुछ और हवा दिया
ये लौ मचल के खुद बुझ जाएगी
इस मंज़र ने हमे फिर रुला दिया
इश्क़ को क्या इस बात का अहसास होगा
ज़ख्म ज़िन्दगी के दामन में उसने बना दिया
अपने लफ्जों से ही हम घबराते हैं
दर्द कितना हमने खुद को पिला दिया
न शिकायत न शिकवा अब ज़िन्दगी से
मौत का जाम वक्त ने कुछ चखा दिया
किसी की याद से कुछ न पाओगे
ये सोच हमने खुद को भुला दिया
खुद पे भरोसा करे भी तो कैसे
हमने ज़िंदगी को ही फंसा दिया
हर कोई खुद में है टूटा- टूटा हुआ
इस मरहम से खुद को समझा दिया
दिल के गम को कुछ और हवा दिया
ये लौ मचल के खुद बुझ जाएगी
इस मंज़र ने हमे फिर रुला दिया
इश्क़ को क्या इस बात का अहसास होगा
ज़ख्म ज़िन्दगी के दामन में उसने बना दिया
अपने लफ्जों से ही हम घबराते हैं
दर्द कितना हमने खुद को पिला दिया
न शिकायत न शिकवा अब ज़िन्दगी से
मौत का जाम वक्त ने कुछ चखा दिया
किसी की याद से कुछ न पाओगे
ये सोच हमने खुद को भुला दिया
खुद पे भरोसा करे भी तो कैसे
हमने ज़िंदगी को ही फंसा दिया
हर कोई खुद में है टूटा- टूटा हुआ
इस मरहम से खुद को समझा दिया
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