Wednesday, 16 May 2018

ये मौसम ही है गुज़र जायेगा

ये मौसम ही है गुज़र जायेगा
वक्त फिर बदल के आएगा

काटों से आप क्यों इतना खौफ खाये
बिन इन्हें छुए फूल कैसे कोई पायेगा

ज़िन्दगी को इतना भी ना सताइये
दिल के मेहमाँ को दिल कैसे भूल जायेगा

बहुत मुश्किल है गम में खुद को हँसाना
पर ये ज़िन्दगी को कुछ तो गुदगुदाएगा

तन्हाई में खुद की रिहाई छुपी है
खुद के जैसा कौन हमें समझयेगा   

आँखें बंद कर ली हमने न देखना चाहते हैं

आँखें बंद कर ली जब न देखना चाहते हैं
दिल को कैसे बंद करे ये बस फरमाते हैं

हर सुबह तारों को खो दिया हमने
हर शाम तारों की उम्मीद जगाते हैं

कोई किसी पे यकीन करे तो कैसे
फूल चाहने वाले उसे तोड़ ले जाते हैं

रात को बदनाम किया हम सब ने
अँधेरा सुकून-आराम भी तो लाते हैं

बस्तियों को लोगों ने बेज़ार किया
अब बच्चें बरसात में कहाँ नहाते हैं

  

Monday, 14 May 2018

अश्कों ने दिल को आवाज़ दिया है

अश्कों ने दिल को इक साज दिया है
खमोशी में खुद का अहसास किया है

वक्त भी क्यूँ ठहरा ठहरा लगता है
क्या इसने भी कोई वनवास लिया है

दुनिया में हम आये हैं दुनिया के लिए
मिट्टी के हर कण ने ये आभास दिया है

खुद की तलाश में खुद को ही भुला बैठे
कैसा ये हमने खुद को कारावास दिया है

अपनों में भी अब गैरों सी दूरी है
बेमन सबने सबका साथ लिया है

कुछ दोस्ती कलम से कर ली हमने
हर सुख दुःख में इसने साथ दिया है
  

Saturday, 12 May 2018

ज़िन्दगी में सौगातो का खूबसूरत साथ हो

ज़िन्दगी में  सौगातो का खूबसूरत साथ हो
हर किसी को अपने सपनो से मुलकात हो

सितारे ज़मी की चाहत में खुद को जगाएं
धरती पे भी कुछ ऐसी ही सुनहरी रात हो

सच ना सही झूठ ही कुछ दिल बहला दे
वक्त की कभी ख्वाहिशों से मुलाकात हो

हर कोई खुद को ख़ुशी ख़ुशी भिगो ले
चाहतों की कुछ ऐसी भी बरसात हो

कभी जी भर आँसू बहाएं कभी ख़ुशी से चिल्लाएं
अपनी मस्ती में नाचते खूब सारे ज़ज़्बात हो

Monday, 7 May 2018

यादें जिनकी दिल को दुखाती है

यादें जिनकी दिल को दुखाती है 
मोहब्बत ऐसे भी रिश्ते निभाती है

वक्त न मालूम और क्या लाएगा 
अभी तो रौशनी आँखों को डराती है 

दुश्मनों को भी अब एहतिराम करते हैं   
जब से जाना दोस्ती खुद को बिकवाती है

हुनर कितना भी खुद में सजा लीजिये
ज़िन्दगी किस्मत से कुछ लिखवाती है 

मिट्टी की है फितरत वफ़ा निभाने की 
पर कई बार वो खुद प्यासी रह जाती है  

  

Thursday, 3 May 2018

फिर मौसम बदला सा फिर आंख भर आई है

फिर मौसम बदला सा फिर आंख भर आई है 
कैसे कैसे याद सिमटे ये रात अँधेरी छाई  है

दर्द भी अब कुछ कुछ बदला बदला लगता है 
उल्फत नफरत यादें बातें सबमें इसकी परछाई है 

हाल -ए-दिल किसी को अब सुनाएँ कैसे
इसके हर कोने में मोहब्बत की रुसवाई है

इस तिल के भी कितने सारे अफ़साने है
चेहरे पे बैठा मद-मस्त ये एक तमाशाई है

मोहब्बत भी हर दिल में रूप बदलती जाती है 
कहीं इबादत कहीं ये चाहत कहीं ये मसीहाई है    

ज़िन्दगी कितना कुछ समझा देती है

ज़िन्दगी कितना कुछ समझा देती है 
न गर कोई मनाने वाला मिले
तो ये रूठना ही भुला देती है

दरारों को न कम आकियें
आप दीवारों की ही सोचे
ये छतों से दुश्मनी निभा देती हैं 

खामोशी भी एक चोट लिए  
ये बिन कहे कई चेहरों से 
झूठ के नकाब हटा देती है

छोटी बातों से ही परेशानी है
इन छोटी-छोटी बातों को ही
ज़िन्दगी बहुत बड़ी बना देती है 

माफीनामा भी न काम आएगा 
कुछ लोगों को जितना समझायें  
उनसे आदत गलती करवा देती  है

बिन आन जी पाएंगे कहाँ  
जब ना-समझ ये शराफत 
कहीं पे भी हमें लुटा देती है 

Tuesday, 1 May 2018

वक्त कितना कुछ सिखला देता है

वक्त कितना कुछ सिखला देता है 
आंसुओं को गर न छुपा सके 
तो ये हंसी बहाने बना देता है  

दुःख बिछड़ने का है बड़ा  
पर कुछ लोगों का साथ 
ज़िन्दगी को ही रुला देता है

यादें ज़िन्दगी को तड़पाती है 
पर सच सच है ये बात दिल 
खुद को कुछ समझा देता है

दो दिन की है ज़िन्दगी
इस दो दिन के लिए इंसान 
कितना खुद को सजा लेता है 

किसी के साथ कोई मरता है कहाँ 
इश्क़ भी देखिये न, ना जाने 
क्या क्या भरम फैला देता है