Wednesday, 22 February 2017

अधूरी ख़्वाहिश

मालूम नहीं वो एक ख़्वाहिश थी या एक ज़िद्द। अंतिम बार जब भईया से मिली थी तो मुँह से निकल गया था भईया एक दिन आपके पैर ज़रूर छूऊँगी। पर इस बार भईया ने हर बार की तरह कोई जवाब नहीं दिया था। चेहरे पर ऐसे कोई भाव भी नहीं थे जिसे मैं पढ़ पाती। न मुस्कुराहट, न ही उदासी, न ही उनका वो जवाब कि हम बंधनों में बंधे हुए समाज में रहते है, जहाँ ख़ुद के लिए नहीं दूसरों के लिए ज़्यादा जीना होता है।

भईया यानी मेरे जेठ। मेरे पति से ही नहीं घर के वो ज्येष्ठ पुत्र थे। तीन भाइयों में सबसे बड़े। मिथिला में जेठ को ‘भैंसुर’ कहते हैं। सबसे पहले ये शब्द मैंने अपनी मौसेरी बहन से सुना था। मुझसे एक साल बड़ी थी पर बचपन में मेरे हर सवाल के जवाब उसके पास होते थे। बाद में उन्हीं जवाबों के कारण याद है स्कूल में एक बार डाँट भी पड़ी थी। मैम ने पूछा था ये तुम्हें किसने बताया, मैंने भी जवाब में तुरंत कह दिया था मेरी मौसेरी बहन ने।

ठीक से याद नहीं पहली या दूसरी कक्षा में रही होंगी। उसके घर में एक कैलंडर लगा था जिसमें काली माँ की तस्वीर थी और काली माँ ने अपना जीभ जो बहुत ज़्यादा लाल था बाहर निकाला हुआ था। तस्वीर में शिवजी ज़मीन पर लेटे  हुए थे और काली माँ का एक पैर शिवजी के बदन यानी उनके पेट पर था।

मैंने उत्सुकतावश उससे पूछ लिया था, ‘काली माँ ने अपना जीभ क्यूँ बाहर निकाल रखा है’।

‘तुझे मालूम नहीं हैं शिवजी काली माँ के भैंसुर हैं, भैंसुर की परछाईं भी अगर किसी के  ऊपर पड़े तो पाप होता है और काली माँ ने तो अपने भैसुर पर ग़लती से पैर रख दिया है, उन्होंने ये पाप किया है इसलिए तो जीभ बाहर है काली माँ को समझ नहीं आ रहा है वो क्या करे।’

उसके लिए मेरा अगला सवाल था ‘भैंसुर क्या होता है?’ डैडी अपने परिवार में अकेले थे न कोई भाई, न कोई बहन। डैडी के चचेरे भाई लोग डैडी से बहुत छोटे थे, कुछ कुछ हम भाई बहनों की उम्र के, उन्हें कभी हम भईया और कभी चाचा बुलाते थे।

‘अरे भैंसुर नहीं जानती, मंझली मामी के बड़े मामा भैंसुर हैं उसी तरह छोटी मामी के मँझले मामा और बड़े मामा भैंसुर है। उसने समझा दिया था कि पति से जितने भी बड़े भाई होते हैं वो पत्नी के लिए भैंसुर कहलाते थे।

पर ये शब्द मुझे तब भी पसंद नहीं आया था। कुछ शब्द मुझे कभी नहीं पसंद आये उनमें से ये शब्द भी एक है। मालूम नहीं क्यूँ! शायद इस शब्द में असुर या भस्मासुर का उच्चारण है या भैंस से मिलता हुआ। कई बार लगा क्या भैंसुर भैंस और असुर का संयुक्त शब्द तो नहीं! ख़ैर जो भी इसकी उत्पत्ति का कारण हो मुझे कभी पसंद नहीं आया था। मैं जेठ शब्द का ही अक्सर उपयोग करती पर मिथिला में आपको जेठ सुनने को नहीं मिलेगा, वहाँ आपको भैंसुर से ही काम चलाना पड़ता है।

शादी के बाद जब पहली बार अपने ससुराल यानी अपने ससुराल के गाँव गई थी तो सास से हर बार सुनने को मिलता था, ‘हे अहां के भैंसुर लगथिन, उनका सामने अहां केना जायेब (तुम्हारे जेठ लगेंगे तुम उनके सामने कैसे जाओगी)।’ कोई भी पुरुष जो मेरी पति से एक दिन का भी बड़ा हो उससे मुझे दूरी नहीं, बहुत दूरी बनानी होती थी। जेठ से दूर रहना बहुत ज़रूरी होता था।

अच्छी तरह याद है एक बार बहुत गरमी पड़ रही थी। छुट्टी का दिन था, बाबूजी यानी मेरे ससुर की तबियत ख़राब थी सब अस्पताल गए थे, घर पर मैं अकेली ही थी। एक महाशय घर में आए, दरवाज़ा मैंने ही खोला था। गरमी के कारण पसीने से तरबतर थे, आदतन पानी ले कर आई और उन्हें दिया। पानी ट्रे में था पर वो जनाब पानी उठाने में भी हिचकिचा रहे थे। मैंने पानी लेने के लिए फिर आग्रह किया तो बोले मैं बिमल का बड़ा भाई हूँ। बात समझ नहीं पाई और बोल दिया, वो अस्पताल गए हैं और शायद आने में देर हो, मैं देखती हूँ आप पानी ले लीजिए। मुझे कुछ असहज नहीं लगा पर महाशय ने शायद बड़ी मुश्किल से मेरे हाथ से थामे ट्रे से पानी उठाया और कुछ ही देर में अस्पताल का पता ले कर घर से चले गए। 

मेरे लिए ये बात आई और गई जैसी थी पर एक दिन गाँव से आने के बाद सास ने टोक दिया।

‘हे अहां येखन तक भैंसुर नहीं बुझईछी की (तुम अभी तक भैसुर नहीं समझती हो क्या)?’

‘अब की भेल माँ (अब क्या हुआ माँ)?’

‘रामनारायण के माँ कही छलथिन की अहां पानी ले कर सामने ठार छलियई (रामनारायण की माँ बता रही थी कि तुम पानी ले कर सामने खड़ी थी)।’

सर पकड़ लिया था। ये क्या बात हुई? एक आदमी गरमी में घर आया तो क्या पहले उससे रिश्ता पूछती? माना उसने समझाया और मैं समझ नहीं पाई तो ये इतनी बड़ी बात कैसे हो गई कि उसने अपनी माँ को कही और उसकी माँ ने मेरी सास को। मालूम नहीं क्यूँ पर कुछ देर के लिए उस महाशय पर ग़ुस्सा आ गया। चुग़ली करने के लिए औरतें बदनाम हैं और ये क्या किया है आपने? चुग़ली ही तो है ये और सही में अपने ऑफ़िस और आस पास के अनुभव से इतना तो कह ही सकती हूँ कि पुरुष महिलाओं से कहीं अधिक चुग़लख़ोर होते हैं। औरतें सिर्फ़ बदनाम हैं, अपने आस-पास नज़र घुमाइये मेरी बातों में सच्चाई नज़र आएगी।

पर भईया के साथ मुझे ऐसी परेशानी का बहुत अधिक सामना नहीं करना पड़ा। घूँघट तो पता ही नहीं चला कब हट गया या मैंने हटा दिया। माँ कभी टोकती तो सर पर आँचल रख लेती, वो भी ऐसे जैसे सर पर आँचल रख कर माँ पर ही अहसान कर रही हूँ। कई बार पूछ भी लेती अगर आँचल नहीं रखा तो क्या हो जाएगा। बोलती ‘ऐसे ही रहना चाहिए बहुओं को। आज तक पूरे गाँव और समस्तीपुर में कोई नहीं कह सकता कि किसी ने मुझे बिना सर पे आँचल के देखा होगा (माँ की इस बात में मुझसे शिकायत और ख़ुद पर गर्व भी होता था)। ये इज़्ज़त देने का तरीक़ा है।’ सही में माँ की पूरी कोशिश होती कि उनका सर साड़ी के आँचल से हमेशा ढका हो।

पर भईया की कोशिश हमेशा मुझे सहज करने की ही होती। शादी के कुछ ही दिनों के बाद जमशेदपुर गई थी। रास्ते में नाश्ते की बात चल रही थी, स्टेशन पर उतर कर ब्रेड बटर और कुछ खीरा ख़रीद कर ख़ुद ही सबके लिए सैंडविच बनाया था। भईया लगातार सैंडविच की तारीफ़ कर रहे थे, लगा भईया बस यूँ ही मुझे सहज करने के लिए मेरी तारीफ़ किए जा रहे हैं। पर वो शायद उन्हें सचमुच में अच्छा लगा था क्यूँकि जमशेदपुर जाने के बाद भी एक दिन वही सैंडविच बनाने की  फ़रमाइश भईया ने की थी।

रही सही थोड़ी सी झिझक भी कुछ ही महीनों बाद ख़त्म हो गई। माँ-बाबूजी गाँव गए थे और भईया दिल्ली आए थे। उन्हें जमशेदपुर के लिए कुछ समान ख़रीदना था जिसमें सोफ़ा कवर, रसोई में काम आने वाले छोटे छोटे बर्तन ऐसे ही कुछ घरेलू समान। कहा भईया चलिए हम दोनों ही बाज़ार चल कर समान लाते हैं। भईया और मैं दोनों बाज़ार गए पर कई बार भईया मुझे बहुत ही असहज दिखे। कई दुकाने बहुत छोटी होती हैं और अंदर सिर्फ़ एक बेंच। मैं धड़ से बैठ जाती और बोलती, भईया बैठिए सामान आराम से देखेंगे फिर ख़रीदेंगे। वो मेरी बात सुन कर बैठते तो थे पर सावधानी के साथ। पहली बार एक बेंच पर बैठते हुए भी वो बहुत ही असहज नज़र आए, उनकी असहजता कई जगह नज़र आ ही जाती। इस बार मुझे लगा कि अब मेरी बारी है भईया को सहज करने की। बोली, भईया चाट खाएँगे, यहाँ एक बहुत ही अच्छी दुकान है चाट की, भईया मान गए। पर दुकान की भीड़ देख भईया घबरा गए। उनकी घबराहट देख मैं बोल पड़ी ‘भईया खड़े खड़े खाना होगा।’ भईया मुस्कुरा दिए थे और बोले, आप खा सकती हैं तो मैं भी खा ही लूँगा।  लेकिन जब हम घर वापस आ रहे थे तो भईया बोल पड़े, पर ये बात माँ और बाबूजी को मत बोलिएगा। खड़े होकर चाट खाने की बात मैंने सिर्फ़ अपने पतिदेव को ही बताई।

पर भईया से माँ-बाबूजी के सामने सावधान रहना पड़ता। अकेले में वो मेरे हाथ से पानी ले लेते पर अगर सामने माँ-बाबूजी यानी मेरी सास-ससुर होते तो कहते, ‘नीचे रख दीजिए, मैं ले लूँगा।’ मैं पानी का ग्लास टेबल पर रख देती और भईया वही ग्लास फिर उठा लेते। शादी के कुछ दिन बाद ही समझ गई थी इस घर में तीन मुख्य स्तंभ हैं, माँ, बाबूजी और भईया। माँ से कुछ कहती तो बोलती, ‘मुझे कोई परेशानी नहीं है पर भईया या बाबूजी के सामने मत करना।’ बाबूजी को कहती तो बोलते, ‘मेरी तरफ़ से कोई आपत्ति नहीं है पर भईया और माँ के सामने ध्यान रखना, उन्हें बुरा लगेगा’ और भईया के सामने बोलती तो कहते, ‘मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता पर माँ बाबूजी का ध्यान रखिएगा, और क्या कीजिएगा वो पुराने ज़माने के हैं, उन्हें बुरा लग सकता है।’ पर मैंने इस स्थिति  का बहुत फ़ायदा उठाया है, तीनों से अलग अलग बात कर लेती और मौक़ा देख तीनों को समझा देती कि सब राज़ी हैं।

पर एक बात पर मैं हमेशा नाकामयाब रही, वो था भईया का पैर छूना। मैं अपने से सभी बड़ों के पैर छूती थी पर भईया के पैर छूने की इजाज़त मुझे कभी नहीं मिली। बहुत अजीब लगता सबके पैर छुओ और भईया के नहीं। कई बार माँ को बोला भी तो बोलती, ‘आप उन्हें प्रणाम कीजिए।’ मुझे दोनों हाथ जोड़ कर भईया को प्रणाम करना बहुत ही औपचारिक लगता और प्रणाम करती भी नहीं। पर माँ हर बार समझाती कि मैं भईया को प्रणाम करूँ। मेरी इच्छा हमेशा पैर छूने की ही रहती। एक दिन माँ को बोल ही दिया था, पैर छू लिया तो क्या हो जाएगा। माँ ने हंस के कहा, गंगा नहाना होगा। जवाब में मैंने भी बोल ही दिया ‘ठीक हैं माँ तो गंगा नहा लूँगी।’ पर इस बात पर माँ को ग़ुस्सा आ गया। ग़ुस्से में ही बोल पड़ी, ‘केहन निर्लज्ज जका बाजैछि (कैसे बेशर्म की तरह बात कर रही हो)।

जानती थी इस बात के लिए माँ को राज़ी करना आसान नहीं होगा। कोशिश करती भी उन्हें मनाने की पर देख चुकी थी इस बात के लिए बाबूजी और भईया दोनों तैयार नहीं थे। दोनों को टटोल चुकी थी। बाबूजी ने तो एक सिरे से ही नकार दिया था ऐसा हमारे परिवार में न हुआ है न होना चाहिए और भईया ने प्यार से समझाया था।

भईया को टटोलने के संदर्भ में कहा था, भईया मुझे अच्छा नहीं लगता मैं सबके पैर छूती हूँ और आपके नहीं। भईया ने कहा ‘क्या कीजिएगा कुछ नियम समाज ने बनाए हैं जिनका पालन हम सब को करना पड़ता है। किसी समय में ठीक रहे होंगे, अब अगर सही न भी हो तो हमें बड़ों की इज़्ज़त के लिए करना पड़ता है। जब तक माँ बाबूजी है तब तक, उसके बाद शायद ये ख़ुद-ब-ख़ुद ख़त्म हो जाए।’

पर इस घटना के बाद भईया में एक अजीब सा बदलाव आ गया। जब भी मैं किसी के पैर छूती और भईया आस-पास होते वो दूर हो जाते। इतनी दूर कि चाह कर भी मैं उनका पैर नहीं छू सकू। शायद ये उनकी तरफ़ से एक कोशिश थी मुझे सहज करने की कि मुझे बुरा न लगे कि मैं किसी के पैर छू रही हूँ और उनके नहीं।

पिछली बार जब जमशेदपुर गई थी तो भईया अपने समधी के साथ हम सबको स्टेशन लेने आए थे और जैसे ही मैंने सबका पैर छूना शुरू किया वो आदतन बहुत दूर खड़े हो गए। उनके समधी ने पूछा भी, ‘समध किया येते दूर ठार छी (समध, इतने दूर क्यूँ खड़े हो)।’ भईया ने वही खड़े खड़े जवाब दिया, ‘देखैइ नई छी सामने भाभो छथीन, ऊ कनी हड़बड़ियाँ छथीन ग़लती से गोड़ लाग लेथिन (दिख रहा है न सामने भाभो (छोटे भाई की पत्नी) है और वो थोड़ी हड़बड़ी वाली है ग़लती से पैर छू लेगी)। लगा भईया कैसे समझ गए मेरे मन की बात, सोच कर भी यही आयी थी, भईया के पैर छू लूँगी और बोलूँगी ग़लती से छू लिया, झुकी थी दिखा ही नहीं कौन-कौन खड़े थे। पर भईया मुझसे ज़्यादा चालाक निकले।

अंतिम बार भईया पिछले नवम्बर को दिल्ली आए थे बाबूजी की पहली बरखी (बरसी) थी। उन्हें गुज़रे हुए एक साल हुआ था और हर काम ज्येष्ठ पुत्र के नाते भईया को ही करना होता था। मेरे पति की इच्छा थी कि भईया कुछ दिन और रुकते। भईया का जवाब था ‘बस एक साल की बात है, अगले साल रिटायेर हो रहा हूँ, उसके बाद तो बस यही काम रहेगा। मैं कोई एक जगह थोड़े रुकने वाला हूँ हर जगह घूमता रहूँगा।’

जाने के लिए जब सब नीचे उतरे तो आदतन भईया फिर से पीछे हट गए, भईया को पीछे हटते देख इस बार मेरे मुँह से निकल गया, ‘भईया एक दिन आपके पैर ज़रूर छूऊँगी। पर उस समय ये अहसास नहीं था भईया से ये मेरी आख़री मुलाक़ात है। आज भी कोशिश कर रही हूँ जानने कि उनकी क्या प्रतिक्रिया थी मेरी बात को सुनकर। पर समझ नहीं पा रही हूँ, वो न मुस्कुराए थे न ही ग़ुस्सा हुए थे, न उदास थे न ख़ुश, पर बहुत ही शांत दिखे थे।

दो फ़रवरी को उनका इंतक़ाल हो गया। एक इंसान जो बिलकुल ठीक-ठाक था जिसका कुछ दिन पहले ही सर्विस इक्स्टेंड करने के लिए पूरा मेडिकल चेक-अप  हुआ हो, जिसकी कोई बीमारी की हिस्ट्री नहीं थी वो अचानक कैसे चला गया। कभी आज तक नहीं सुना था भईया अस्पताल में अड्मिट भी हुए हो। डॉक्टर भी शायद कुछ समझ नहीं पाए या समझा नहीं पाए। पैर में दर्द उठा था और उसी के कारण हॉस्पिटल में अड्मिट हुए पर अचानक ही ख़बर आई उन्हें सीसीयू में ले जाया गया है। पतिदेव तुरंत ही रवाना हो गये, मैं रुक गई घर में एक शादी थी और कभी सोचा भी नहीं था ऐसा कुछ सुनने को मिलेगा। पर कुछ दिनों के बाद डॉक्टर ने जवाब दे दिया।

डॉक्टर के जवाब देने की ख़बर ने इतना विचलित किया कि रात भर सो नहीं सकी। सुबह जल्दी उठकर जाने की तैयारी कर रही थी कि कुछ ठीक नहीं लग रहा था। गोपाल ने कहा, दीदी बी पी चेक कर लो (गोपाल को कभी कोई परेशानी बताओ वो पहले बी पी मशीन के साथ तैयार मिलता है) पता ही नहीं चला था अचानक बी पी २०० के आसपास कैसे बढ़ गया। लगा सो नहीं पाई हूँ इसलिए ये बढ़ गया है। किसी तरह सोने की कोशिश कर रही थी, कुछ नींद भी आई और बीपी भी कुछ कम हुआ। दोपहर को छोटी दीदी यानी छोटी ननद का फ़ोन आया, कहना चाह रही थी कि भाभी का ध्यान रखना, वो समय पर पहुँच नहीं पा रही थी। पूछा दीदी सब ठीक हैं न? दीदी हैरान थी, ‘क्या तुम्हें नहीं मालूम है? भईया रात को ही गुज़र गए हैं।’

हैरान थी मुझे क्यूँ नहीं बताया, सुबह से पतिदेव से कितनी बार फ़ोन पर बात हुई है, उन्होंने क्यूँ नहीं बताया? बिमल से फ़ोन पर बात कर के ही रो पड़ी, ये क्या तरीक़ा है सबको पता है और मुझे नहीं बताया। बोले, रात में किसी को नहीं कहा था और सुबह तुम्हारी तबियत और बी पी की ख़बर सुन कर नहीं बताया। जब तक मुझे ख़बर हुई भईया का पार्थिव शरीर भी इस दुनिया से जा चुका था। लगा पैर छूने की ख़्वाहिश अधूरी ही रह गई। अगले ही दिन जमशेदपुर पहुँच गई। लोगों को अपनी बात बताई और जवाब सुन हैरान थी।

भाभो को यानी मुझे भईया को छूने का भी अधिकार नहीं था। हमें शायद उनके पास भी जाने नहीं दिया जाता। पर उससे भी हैरान इस बात ने किया कि किसी भी औरत या लड़की यहाँ तक उनकी बेटियों को भी शमशान घाट नहीं जाने दिया गया। जमशेदपुर के मिथिला समाज के भईया बहुत ही सक्रिय व्यक्तियों में आते हैं और वहाँ के मैथिल समाज में ऐसा नहीं होता हैं।

होता तो ये दिल्ली के मैथिल समाज में भी नहीं, पर करना पड़ता हैं। लगभग सत्रह साल पहले मम्मी का देहांत हुआ था, उस समय मेरे पति ने ही मना किया था, पर मेरी छोटी बहन अड़ गई थी, उसका कहना था ‘मेरी मम्मी है, ज़िंदगी में उसके साथ थी, मौत के अंतिम छन तक मैं उनके साथ रहूँगी।’ डैडी के देहांत के बात भी हम तीनों बहने शमशान घाट में अंतिम छन तक थे।

ढाई साल पहले जब मेरी सास का निधन हुआ तो फिर वही प्रश्न था। पर मेरी छोटी बहन ने मुझे सिखा दिया था कि ज़िद्द करना पड़ता है, आज के युग में भी लड़कियों और बहुओं को अपनी बात सुनानी पड़ती है, मनवानी पड़ती है। जब लोगों ने कहा औरतें नहीं जाती, बोली ‘हमारे यहाँ जाती हैं।’ कुछ लोगों ने विरोध किया पर हैरान थी बहुत से समर्थन में भी आ गए। हाँ फ़लना गाँव में भी अब बेटियाँ जाती है। किसी ने कहाँ हमारे यहाँ भी बहुएँ जाती है। माँ के जाने के एक साल दो महीने बात बाबूजी चले गए पर बाबूजी के भी क्रिया कर्म में मैं अपनी बात चला पाई। जब आप अपनी बात करते हैं तो कुछ विरोध करते हैं पर कई समर्थन में भी आते हैं और इसी समर्थन के कारण आप कई बार आसानी से अपना मक़सद हासिल कर लेते हैं।

पर ये अजीब संयोग है बाबूजी की तरह भईया भी बाबूजी के जाने के एक साल और दो महीने बाद हम सबको छोड़ कर चले गए। मालूम नहीं था घर के तीनों स्तंभ के गिरने में एक साल और दो महीने की दूरी थी। पर इस बार शमशान में कोई महिला नहीं गई। मैं होती तो ज़िद्द तो ज़रूर करती, कितना सफल होती मालूम नहीं पर पूरी ताक़त के साथ कोशिश तो ज़रूर करती, ताकि हमारे घर की ये हमेशा की परंपरा बन जाए।

पर भईया ने हारने पर ख़ुद को सांत्वना के लिए मंत्र मुझे दे दिया था, उन्हें क़िस्मत पर बहुत यक़ीन था। शादी के कुछ साल बाद ही किसी बात पर भईया को मैं नाराज़ दिखी थी और सही में मैं किसी बात को लेकर ग़ुस्से में थी। भईया पास आए और प्यार से पूछा ‘क्या आप क़िस्मत को मानती हैं?’ कोई और समय होता तो कुछ घुमा-फिरा कर जवाब देती, पर ग़ुस्सा था तो तड़ाक से बोल पड़ी, नहीं मानती हूँ। भईया ने प्यार से समझाया था ‘तो मान लीजिए, जितनी जल्दी मान लेंगी उतना ही अच्छा होगा। नहीं तो क़िस्मत आपको ख़ुद को मनवा कर रहेगी।’ भईया क़िस्मत को बहुत मानते थे, उन्होंने कहा ‘कि अगर मैं तीन बजे आपके साथ बैठा हूँ तो ये भी क़िस्मत में लिखा है।’ आज लगता है मेरी क़िस्मत में ही नहीं था भईया का पैर छूना। नहीं तो ये इतनी बड़ी ख़्वाहिश नहीं थी जिसे ना पूरा किया जा सके और न ही भईया की उम्र जाने की थी। अट्ठावन साल की उम्र जाने की नहीं होती, वो भी एक पूरी तरह के स्वस्थ इंसान की।

किसी दर्द को कम करने का शायद क़िस्मत सबसे बड़ा मरहम हैं। जहाँ कुछ समझ न आये क़िस्मत को दोष दे दें। मैंने भी भईया की आज बात पूरी तरह मान ली कि मेरी क़िस्मत में भईया का पैर छूना नहीं लिखा था, ये ख़्वाहिश अधूरी ही रहनी थी। पर भईया जब तक ज़िंदा हूँ एक तिष तो मन में रहेगी न कि आपका पैर नहीं छुआ चाहे जितना भी क़िस्मत का सहारा लूँ।