Monday, 8 January 2018

शाम को सूरज निकलने की आस लिए हैं

शाम को सूरज निकलने की आस लिए हैं अजीब लोग हैं कैसे कैसे विश्वास लिए हैं

वक़्त का भी कुछ अपना मरहम होगा क्यूँ आप मायूसी की बरसात लिए हैं

बुराई-अच्छाई को कैसे समझाएं
ये सब खुद में ही हालात लिए हैं

उम्मीदों को भी कुछ सरहद चाहिए बिन मतलब भी हम कुछ आस लिए हैं

जिसे देखिये नया साल मुबारक बोल रहा
लगता है ये साल कुछ खुद में खास लिए है




तोहफ़ा नहीं व्यवहार बोलता है

तोहफ़ा नहीं व्यवहार बोलता है पैसा नहीं सदाचार बोलता है बेशक़ीमती सामान ख़रीद के देख लिया मुफ़्त में पाया छोटा सा उपहार बोलता है उम्मीदों के कुछ तोहफ़े हम भी चाहें क़िस्मत का मारा वो लाचार बोलता है

हर दिन ख़ुद में ही एक तोहफ़ा है
ख़ूनी ख़बर वाला अख़बार बोलता है

हम मर कर भी अब तक कैसे जिन्दा है
शायद बुजुर्गों की दुआओं का संसार बोलता है

वक्त ने क़त्ल किया वो कातिल कहलायेगा
टी वी का मारा हर समाचार बोलता है

बस हाथ बढ़ाने का ही तो फासला था
गलतफहमी में खड़ा दीवार बोलता है

कितना तुम मुझ को दे पाओगे
बाजार का हर खरीदार बोलता है

खुशियां इस पल में ही बसी है
दिल में बजता तार बोलता है






हर अमीर का कोट साफ़ रहेगा

हर अमीर का कोट साफ़ रहेगा बस ग़रीबों के पास अपराध रहेगा एसी के कमरों में बदबू छिप जाएगी रोटी के बस्तो में चीख़ता ये पाप रहेगा वो भूख की राह पे फिर लड़खड़ाएगा
अमीरी के पास हर औसाफ रहेगा

पैरहन ही सच की पहचान बनेगी
दिल कब सच्चाई का नाप रहेगा

जम्हूरियत के भुलावे में मत आइये
वक्त हमेशा कुर्सी के ही पास रहेगा
बातें आप चाहे जितनी बना लीजिए पर सच है अमीरों के साथ इंसाफ़ रहेगा