इक उम्मीद जाती नहीं कोई रोक लेगा
और कुछ नहीं तो पीछे से टोक देगा
बातें कहने का बस एक सलीका हो
बाकि किसी को कोई और क्या देगा
सांसों का ज़िन्दगी से जो रिश्ता है
वो मौत को भी देखिएगा डरा देगा
लोग बस मंजिल के लिए चलते हैं
असली मज़ा रास्ता सफर का देगा
हम अपने ज़ख्मों की किससे बात करे
जिसे देखिये अपना ज़ख्म दिखा देगा
शायर शायद उन्हीं को कहते हैं
दिल के ज़ख्मों से जो गुनगुना लेगा
और कुछ नहीं तो पीछे से टोक देगा
बातें कहने का बस एक सलीका हो
बाकि किसी को कोई और क्या देगा
सांसों का ज़िन्दगी से जो रिश्ता है
वो मौत को भी देखिएगा डरा देगा
लोग बस मंजिल के लिए चलते हैं
असली मज़ा रास्ता सफर का देगा
हम अपने ज़ख्मों की किससे बात करे
जिसे देखिये अपना ज़ख्म दिखा देगा
शायर शायद उन्हीं को कहते हैं
दिल के ज़ख्मों से जो गुनगुना लेगा
दरअसल, कविता हमें ईमानदार बनना भी सिखाती है। जिंदगी की आपाधापी या फिर स्वयं द्वारा गृहीत ऊहापोह की स्थिति में हम अपने आसपास के ईमानदार परिवेश से कितना भी मुख क्यों न मोड़ ले, उसके साथ सहज होने का भाव हमें काव्य-मन दे ही देता है। इन पंक्तियों को लिखना बस शगल भर ही क्यों न हो, लेकिन ये हमें अपनों के संग जीने का सुखद संदेश देती है। 'उम्मीद जाती नहीं' का मूल भाव यही। रचनाएँ अच्छी लिख जाएँ और पाठक तक पहुँच जाएँ तो वही उसकी सफलता और सार्थकता है।
ReplyDeleteबधाई आपको।
तहे दिल से शुक्रिया अशोक जी, आपके बहाने इस कविता तो दुबारा पढ़ा और ठीक भी किया ..आपको अच्छी लगी मेरे लिए यही बहुत है..
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