Friday, 6 April 2018

इक उम्मीद जाती नहीं की कोई रोक लेगा

इक उम्मीद जाती नहीं कोई रोक लेगा 
और कुछ नहीं तो पीछे से टोक देगा 

बातें कहने का बस एक सलीका हो 
बाकि किसी को कोई और क्या देगा 

सांसों का ज़िन्दगी से जो रिश्ता है 
वो मौत को भी देखिएगा डरा देगा

लोग बस मंजिल के लिए चलते हैं 
असली मज़ा रास्ता सफर का देगा

हम अपने ज़ख्मों की किससे बात करे 
जिसे देखिये अपना ज़ख्म दिखा देगा 

शायर शायद उन्हीं को कहते हैं  
दिल के ज़ख्मों से जो गुनगुना लेगा 



2 comments:

  1. दरअसल, कविता हमें ईमानदार बनना भी सिखाती है। जिंदगी की आपाधापी या फिर स्वयं द्वारा गृहीत ऊहापोह की स्थिति में हम अपने आसपास के ईमानदार परिवेश से कितना भी मुख क्यों न मोड़ ले, उसके साथ सहज होने का भाव हमें काव्य-मन दे ही देता है। इन पंक्तियों को लिखना बस शगल भर ही क्यों न हो, लेकिन ये हमें अपनों के संग जीने का सुखद संदेश देती है। 'उम्मीद जाती नहीं' का मूल भाव यही। रचनाएँ अच्छी लिख जाएँ और पाठक तक पहुँच जाएँ तो वही उसकी सफलता और सार्थकता है।

    बधाई आपको।

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    1. तहे दिल से शुक्रिया अशोक जी, आपके बहाने इस कविता तो दुबारा पढ़ा और ठीक भी किया ..आपको अच्छी लगी मेरे लिए यही बहुत है..

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