खुद को बदल के देख लिए कुछ बदला नहीं
वक्त से थी उम्मीद पर कुछ सम्भला नहीं
ज़िन्दगी से जब से कुछ अनबन है हुई
मोहब्बत में भी हमें कुछ नखरा नहीं
बहार में बाग़ फिर खिल के मुस्कुरायेंगे
बागवां है सलामत तो कुछ उजड़ा नहीं
हँसाना मुहाल है रोना भी शर्मसार है
ज़ज़्बातों में अब कुछ हौसला नहीं
दुनियां को जीत के न चैन पाओगे
है सुकूँ किसी से कुछ झगड़ा नहीं
वक्त से थी उम्मीद पर कुछ सम्भला नहीं
ज़िन्दगी से जब से कुछ अनबन है हुई
मोहब्बत में भी हमें कुछ नखरा नहीं
बहार में बाग़ फिर खिल के मुस्कुरायेंगे
बागवां है सलामत तो कुछ उजड़ा नहीं
हँसाना मुहाल है रोना भी शर्मसार है
ज़ज़्बातों में अब कुछ हौसला नहीं
दुनियां को जीत के न चैन पाओगे
है सुकूँ किसी से कुछ झगड़ा नहीं
No comments:
Post a Comment