Tuesday, 24 April 2018

खुद को बदल के देख लिए कुछ बदला नहीं

खुद को बदल के देख लिए कुछ बदला नहीं
वक्त से थी उम्मीद पर कुछ सम्भला नहीं

ज़िन्दगी से जब से कुछ अनबन है हुई
मोहब्बत में भी हमें कुछ नखरा नहीं

बहार में बाग़ फिर खिल के मुस्कुरायेंगे
बागवां है सलामत तो कुछ उजड़ा नहीं

हँसाना मुहाल है रोना भी शर्मसार है
ज़ज़्बातों में अब कुछ हौसला नहीं

दुनियां को जीत के न चैन पाओगे
है सुकूँ किसी से कुछ झगड़ा नहीं
   


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