Friday, 16 June 2017

पैरों को ज़मीं का इख़्तियार कहाँ

पैरों को ज़मीं का इख़्तियार कहाँ
अपनी बातों पे हमें ऐतबार कहाँ 

हर सच से दिल बख़ूबी वाक़िफ़ है
पर दिल की बातों का अख़बार कहाँ

हम ज़िंदगी में कई बार ठोकर खाएँगे    
बातों में न आना आदत में शुमार कहाँ

ये बातें भी उन तक पहुँच जाएगी 
बातों के लिए सरहद कोई दीवार कहाँ 

इश्क़ वक़्त के साथ बदल ही जाता है
अब वो ख़लिश वो तड़प वो ख़ुमार कहाँ 


हर बात बोल चुके हैं तो बैठ जाइये

हर बात बोल चुके हैं तो बैठ जाइये
बिन बात की बात अब और बढ़ाइये

ज़िंदगी के वो कोने भी चाहिए हुज़ूर
जहाँ वक़्त के रूख को बैठ देख पाइए

ज़िंदगी ने कुर्सियाँ बिछाई हैं सौ-हज़ार  
आगे की पंक्ति में बैठने से घबराइए

तन्हाई भी बहुत कुछ सिखाती है साहेब
हो सके कुछ पल साथ ख़ुद बैठ बिताइए

कुछ राज की बातें हमने क्या बताई
हर कोई कहे उन्हें महफ़िल में बुलाइए

कभी यूँ ही फ़ुर्सत में बैठ जाइए जनाब
बोलिए दिल से कुछ दिल की सुनाइए





Thursday, 15 June 2017

सिर्फ़ सोचना नहीं कुछ करना भी ज़रूरी

सिर्फ़ सोचना नहीं कुछ करना भी ज़रूरी
कहीं पहुँचने के लिए चलना भी ज़रूरी है

ना पसंद आपको अपने घर के साजो-सामान  
बदलने के लिए पर घर से निकलना भी ज़रूरी है

पाने की चाहत में और कितना चलते जाएँगे
जो पाया उसके लिए कुछ ठहरना भी ज़रूरी है

क्यूँ परेशान हैं आप महफ़िल से उठ के जाने वालों से
वक़्त की दहलीज़ से उनका निकलना भी ज़रूरी है

अब तक उलझनों में ही पड़े हैं ये कैसी बंद गली है
तो वक़्त का इशारा है साथ छोड़ बढ़ना भी ज़रूरी है

वक़्त फिर ख़ुर्शीद को आसमान पे लाएगा  
सुबह के लिए पर रात का ढलना भी ज़रूरी है

किसी और को बदलने की चाहत रखते हैं
तो आपको ख़ुद को बदलना भी ज़रूरी है


हमने नींद को प्यार से स्वर्गलोग पुकारा है

हमने नींद को प्यार से स्वर्गलोग पुकारा है
सोना सही मायने में धरती पे जन्नत हमारा है

हर ग़म, हर दर्द, हर दुःख से आज़ाद हम
सोते वक़्त ज़िंदगी ने बड़े प्यार से दुलारा है

बहुत थका देती है दिनभर की दुनियादारी हमें
कुछ सो लेते हैं रात ने सुबह के लिए सँवारा है

अंधेरे से क्यूँ हैं आप इस क़दर परेशान
रात को चाँद सितारों का भी नज़ारा है

हुज़ूर आपको भी चैन की नींद आएगी
किसी के सपने को गर आपने सँवारा है

चलिए अब नींद को भी कुछ सँवारे
ये आराम का एक ख़ूबसूरत सहारा है



Wednesday, 14 June 2017

हर बार झूठ दिल को सहलाये

हर बार झूठ दिल को सहलाये
हर बार सच उसे तोड़ने आये

फिर सच के सामने वो झूठ बेसहारा है
हर बार जिस झूठ से हम दिल बहलायें

सिर्फ़ दुश्मन ही अब सच बोले हैं
हर बार दोस्ती हमने झूठ से बचाये

क्या ग़लत उस प्यारी-सी झूठ में
हर बार बच्चे जिसे सुन मुस्कुराये

झूठ से इतनी नफ़रत करने वालो
हर बार झूठ भी कुछ समझाने आये  


इश्क़ हर हाल में न टूटते हुए संभल जाने में है

इश्क़ हर हाल में न टूटते हुए संभल जाने में है 
इश्क़ किसी को समझने और समझाने में है

वक़्त के हालात से हर कोई मात खाएगा
इश्क़ बिना दूर गए उन्हें पास बुलाने में है

ये क्या बोल कर सुनना और लफ़्ज़ों से समझाना
इश्क़ बिना कुछ कहे दिल की हर बात बताने में है

बात बेबाक़ी से कहना बेबाक़ी से बतलाना  
इश्क़ झूठ से हर बार सच को जिताने में है

अब क्या कहें इश्क़ के कितने फ़लसफ़े
इश्क़ ख़ुदगर्ज़ नहीं ये टूटे अफ़साने में है



Tuesday, 13 June 2017

कैसे कहें कौन से जन्मों का रिश्ता है

कैसे कहें कौन से जन्मों का रिश्ता है
मेरा घर मेरे साथ रोया साथ हँसता है

बस जिस्म को लेकर हम चले आएँ
रूह तो आज भी घर में ही बसता है

प्यार, उम्मीद, सपने सब इस घर से बँधे हैं
कैसे मान लें सिर्फ़ दीवार-छत का एक रिश्ता है

दिन से ज़्यादा रातों में इसकी याद आई
उजालों के साथ अंधेरों से भी इसका रिश्ता है

पूरी दुनिया घूम कर हम देख आये
घर जैसा आराम पैसे से नहीं बिकता है

अब और कितना घर की बात बताये
धरती पे स्वर्ग हमें घर में ही दिखता है