Tuesday, 18 December 2018

ये लोकतंत्र है यहां शब्दों का व्यापार जारी है

ये लोकतंत्र है यहां शब्दों का व्यापार जारी है
खाली पेट भरने के लिए वादों की फिर तैयारी है

राज करने आयें हैं जो खुद को सेवक बतायें हैं 
कितने खूबसूरत बहाने, बातें कितनी न्यारी हैं

जम्हूरियत क्यूँ सोती है इंसानियत जब रोती है 
सच हमें समझाते झूठ जिनकी जागीरदारी है

इंसान को हथियार बनाये मौत को भी जायज़ ठहराये 
वक्त के लिए खेल रचायें बस कुर्सी सबको प्यारी है

जनता का जनता के लिए जनता द्वारा, ये नारा अब पुराना है
प्रजातंत्र है नेताओं का और नेताओं की तो इसमें दावेदारी है 




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