दर्द ही दर्द इस जहां में बिखर हुआ है
न जीने को जी रहे है न मरना ही हुआ है
मोहब्बत के उन अफसानों का क्या करें
जो चाहते है न याद आये और न भुलाना हुआ है
वक्त और अब कहाँ तक जायेगा
जुदाई का ये अब इम्तिहां हुआ है
कभी हमारी दुनिया बसा करती थी उनमें
गैर-मुनासिब उनसे अब मिलना हुआ है
ज़ख्म कोई भी हमने कब संभाले थे
पर ज़ख्म मोहब्बत का बहुत गहरा हुआ है
न जीने को जी रहे है न मरना ही हुआ है
मोहब्बत के उन अफसानों का क्या करें
वक्त और अब कहाँ तक जायेगा
जुदाई का ये अब इम्तिहां हुआ है
कभी हमारी दुनिया बसा करती थी उनमें
गैर-मुनासिब उनसे अब मिलना हुआ है
ज़ख्म कोई भी हमने कब संभाले थे
पर ज़ख्म मोहब्बत का बहुत गहरा हुआ है

