चारो तरफ बिखरी पड़ी है आज भी ये जिंदगी, इसे समेट सकूँ ये सहूलियत भी वक्त ने कब दी.....
Monday, 17 December 2018
मत आस लगाना
इक शब्द हूँ कविता बन जाऊँ कैसे
इक बूँद हूँ प्यास मिटाऊँ कैसे
इक धूप हूँ सूरज को लाऊँ कैसे
इक पत्ता हूँ पेड़ बन बहलाऊँ कैसे
बहुत मुश्किल है एक को भूल जाना
पर एक से पूर्णता की भी मत आस लगाना
सही कहा -एक पूर्ण नहीं हो सकता, आदर्श भी नहीं हो सकता| बस ये अहसास ही हमारे खालीपन को भरने में सक्षम है|
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