Wednesday, 25 April 2018

न पढ़ सकोगे जिन्हें उन किताबों सी हूँ

न पढ़ सकोगे जिन्हें उन किताबों सी हूँ
सवाल खोजती उलझी जवाबों सी हूँ

अँधियों में चोट खा के जो मुस्कुराएं
कुछ टूटे पंखुड़ियों वाले गुलाबों सी हूँ

इश्क को छोड़ अब हम जायेंगे कहाँ
इश्क़ से उलझी इश्क़ के ख्वाबों सी हूँ

हर निगाह हमसे बस सवाल है लिए
कैसे कहूं हुस्न पे पड़े हिजाबों सी हूँ

वक्त न ले सकेगा हमसे कोई हिसाब
मैं किस्मत के बंद पड़े लिफाफों सी हूँ   

Tuesday, 24 April 2018

खुद को बदल के देख लिए कुछ बदला नहीं

खुद को बदल के देख लिए कुछ बदला नहीं
वक्त से थी उम्मीद पर कुछ सम्भला नहीं

ज़िन्दगी से जब से कुछ अनबन है हुई
मोहब्बत में भी हमें कुछ नखरा नहीं

बहार में बाग़ फिर खिल के मुस्कुरायेंगे
बागवां है सलामत तो कुछ उजड़ा नहीं

हँसाना मुहाल है रोना भी शर्मसार है
ज़ज़्बातों में अब कुछ हौसला नहीं

दुनियां को जीत के न चैन पाओगे
है सुकूँ किसी से कुछ झगड़ा नहीं
   


Monday, 23 April 2018

रातों को ख्वाबो से सजा लीजिये

रातों को ख्वाबो से सजा लीजिये 
वक्त ही तो है इसे मना लीजिये 

भीड़ में भी कई दोस्त मिल जायेंगे 
बस ज़रा सा आप मुस्कुरा लीजिये

इश्क की बेबसी पे अब क्या कहे
ग़मों से कुछ दिल बहला लीजिये

कोई किसी के लिए जीता है कहाँ
ये बहाने ज़िन्दगी से हटा लीजिये

सच के साथ झूठ चल सकता नहीं
फासलों को भी कुछ समझा लीजिये    

ज़िन्दगी कुछ सज़ा है तो कुछ मज़ा भी है

ज़िन्दगी कुछ सज़ा है तो कुछ मज़ा भी है
कुछ खोई हुए कुछ इसे अपना पता भी है

वक्त की भी हमसे कोई चाहता नहीं
मेरा नाम किसी चहरे पे लिखा भी है

झूठ सच से हमेशा खौफ खायेगा
झूठ को ही सच का पता भी है

अपना चेहरा आज धुंधला सा लगे 
कुछ इसमें आईने की खता भी है

कुछ ख्वाहिशों पे ज़िन्दगी बची है
बाकि ज़िन्दगी में कुछ बचा भी है

ज़िन्दगी मौत को हरा सकती है
और मौत ही इसकी सज़ा भी है

  

Saturday, 21 April 2018

हमने कब चाहा वकत बदल जाये

हमने कब चाहा वक्त बदल जाये
पर वक्त हमारी समझ में तो आये

मुश्किल है उन रास्तों पे चलना
जो मंज़िल का पता नहीं बताये

बागबाँ कली से कह न पाया
इंतज़ार में वो दिन बिताये

ये ख्वाब ही ज़िन्दगी की चाहत है
ये ख्वाब ही इसे चोट भी पहुचाये

गलत ने राह बताया सही ने चलना सिखाया
पर ये उलझन दिन रात बस हमें है सताए

हम कह सकते हैं समझा सकते नहीं
खुद की समझ से ही कोई समझ पाए

वक्त भी खुद में उलझा हुआ
वक्त भी खुद को कुछ सुलझाए





Thursday, 19 April 2018

वो बातें गई वो एक गुज़ारा ज़माना है

वो बातें गई वो एक गुज़ारा ज़माना है
वक्त से भी तो कुछ रिश्ता निभाना है

दिल के दरवाज़ों पे न दस्तक दीजिये
ज़ज़्बातों को दिल के भीतर सुलाना है

उन यादों से क्यों न दूर जाएँ
जिनका काम बस सताना है 

लगता है इश्क़ बहुत महंगा शौक़ है
नहीं तो हमारा दिल गरीब खाना है

सच बयानी के अल्फाज मानो सो चुके
अब लफ्जों का काम झूठ फैलाना है

अमीरी हर मुश्किल काम कर जाये
पर गरीबी का उम्मीद ही ठिकाना है

अदल* की बातें अब किससे कहें
बहरे हुए जिन्हे इंसाफ दिलाना है

अदल  - न्याय   

Wednesday, 18 April 2018

न दुआ चाहिए न दवा चाहिए

न दुआ चाहिए न दवा चाहिए 
ज़िन्दगी हमें बस ख़ुशनुमा चाहिए

किसी को ये बात कैसे समझाए 
हमे घर में भी खुला आसमाँ चाहिए 

ये खुमारी कभी भी न ख़त्म हो पाये 
ज़िन्दगी को ख्वाबों का कुछ गुमाँ चाहिए

जो मुझे मुझसे ही बचा ले 
मुझे ऐसा एक रहनुमा चाहिए 

अपनी बेबसी को थोड़ा खरीद पाए 
ज़िन्दगी से ऐसा इक मकाँ चाहिए

ज़ज़्बातों से कोई खेल न पाए
सच में एक ऐसा जहाँ चाहिए 

   

Thursday, 12 April 2018

सुना है सूरज चाँद से मोहब्बत करता है

सुना है सूरज चाँद से मोहब्बत करता है
चाँद चमकता रहे इसलिए रोज़ मरता है

ये सच की है बेबसी या झूठ की उम्मीद
न जाने क्यों चकोरा चाँद पे मचलता है

वक्त किसी को क्या डरायेगा
अँधेरे में जुगनू और चमकता है 

रौशनी आज भी वहीँ है मौज़ूद 
सूरज जहाँ कुछ देर ठहरता है

इश्क़ बेबसी का ही दूसरा नाम है
किसी का बस इसपे कब चलता है  

वक्त से ज्यादा बेरहम हमने किसी को देखा नहीं
खूबसूरती हो या मासूमियत सबको ये मसलता है


Wednesday, 11 April 2018

ना-उम्मीदी में एक आस बाक़ी है

ना-उम्मीदी में एक आस बाक़ी है 
बुझे दीये में कुछ राख बाक़ी है

घर जला के भी हम मुस्कुरा बैठे 
आसपास लाखों सौगात बाक़ी है 

वो मुसाफिर है लौट के न आ पायेगा
दिल में उम्मीद की क्यूँ साँस बाक़ी है

हर राज दिल का हमने खोल दिया 
पर घुटन की वो आवाज बाक़ी है

रात पे फिर देखिये एक अँधेरा छाया है 
चिरागों का बस कुछ दूर का साथ बाक़ी है

ज़िन्दगी  कैसे मुँह फेर के जाएगी
जिस्म में अभी भी ज़ज़्बात बाक़ी है

वक्त का फिर एक बार सामना होगा 
कुछ तो ज़िन्दगी में ख्यालात बाक़ी है 

बच्चों को गिरने दो फ़िसलने दो 
सहारे के लिए बड़ों के हाथ बाक़ी है

उम्र कुछ समझौता भी सिखाती है 
हौसले के कहाँ वो हालात बाक़ी है

सूखा पेड़ नींव की बातों से घबराये 
गिरने के लिए एक बरसात बाक़ी है

गिरेंगे तो लोग और गिराते जायेंगे
कुचलने के लिए फ़ौलाद बाक़ी है

जीत और हार में ज़िन्दगी नापते हैं
इंसानों  में कितने आफ़ात* बाक़ी है 

उन नासमझों को कैसे हम समझाएं 
सितारे देख जो कहे आफ़्ताब बाक़ी है

नाम कमाने इस दुनिया में आएं हैं 
या खुदा तेरे कितने ज़मात बाक़ी है

वक्त कहता है चुप होने में समझदारी है 
हर किसी की आँखों में सवालात बाक़ी है

आफ़ात - मुसीबतें 


  

Monday, 9 April 2018

किसी की क्या हस्ती किसी का क्या नाम है

किसी की क्या हस्ती किसी का क्या नाम है 
वक्त के साथ जाएगी ये नुमाइशें तमाम है 

बे-कसी बे-बसी बे-बहा* बे-चाप* समाये हुए 
दिल के रिश्तों में क्या सुकून क्या आराम है

रात में सूरज अँधेरा चाहे वो छुप जाये  
पर सुबह पर्वतों को करता वो सलाम है  

ना-उम्मीदी को बेइंतिहा उम्मीद चाहिए 
उम्मीद को भला उम्मीद से क्या काम है

राह की मुश्किलें दिल को कुछ समझाती है
कैसी होगी मंज़िल कैसा बना वो मुकाम है

अहसानों के साथ अब और न जी पायेंगें 
इन अहसानों तले बन गए हम गुलाम है

बे-बाह - बहुमूल्य 
बे-चाप - खामोशी

Friday, 6 April 2018

वक्त ने हर अंदाज़ बदल के रख दिया

वक्त हर अंदाज़ बदल के चल दिया 
न ख़ुशी से ख़ुशी न ज़ख्मों ने दर्द दिया 

न दोस्तों से उम्मीद न दुश्मनों से गिला
ज़िन्दगी का हिसाब कुछ तो कर दिया

ज़िंदगी से कब तक लड़ते जायेंगे 
हार मान इस किस्से को बदल दिया

चाहत अब ज़िन्दगी में बहार न लाएगी 
उम्मीद का हर फूल हमने मसल दिया  

सोचते हैं अहसास न कुछ बोल जाये
डर से कलम का सर ही कुचल दिया 

कुछ बातों का असर जाता नहीं 
लफ्जों ने हौसलों को क़तर दिया 

नींद ना सही कोई ख्वाब ही चली आये

नींद ना  सही कोई ख्वाब ही चली आये 
ज़िन्दगी जीने की कोई तो वजह बताये 

जो कभी पूरी हो सकती नहीं 
ऐसी बातों पे उम्मीद क्यूँ जगाये

बहुत तोहफ़े पाएं हैं ज़िन्दगी से 
अफ़सोस खोलने से ये टूट जाये 

बिन मकसद ज़िन्दगी चलती नहीं 
ये राज खुद को कैसे समझाए 

जिनसे बातें करना है मुहाल 
उनसे हम अपना जवाब चाहें

दुनिया बदलने की चाहत थी कभी 
अब लगता है बस घर संवर जाये  

मोल ज़िन्दगी का फिर चूका दिया

मोल  ज़िन्दगी का फिर चूका दिया 
लीजिये हमने फिर मुस्कुरा दिया 

आसमान सबकी किस्मत में होता नहीं 
कुछ ने आंगन से भी ख्वाब बना लिया

लोगों की हम अब क्या बात करे 
मौका मिलते ही ज़ख्म लगा दिया

और कितना बॅटवारा होगा इस घर का 
आंगन में भी आपने अँधेरा जगा दिया

थक चुके हैं ज़िन्दगी को हिसाब देते देते 
हर रोज़ इसने एक नया कर्ज चढ़ा दिया    

मुश्किलों ने संभलना सिखाया है

मुश्किलों ने संभलना सिखाया है 
ज़ख्मों ने औकात बताया है 

घर में झरोखे नहीं न सही 
दरवाजों से हवाओं को बुलाया है

दरों-दीवार की चिंता वो क्यों करे 
जिन्होंने दिलों में घर बनाया है 

बे-मतलब पीठ पे खंजर का ये वार है 
हमारा सीना तो ज़ख्मों ने सजाया है

आदमी हर बार सरहद की सोचे 
पंछियों के लिए पिंजरा बनाया है

दीवारों पे नहीं दरवाजे पे दस्तक दीजिये 
आने जाने के लिए ही दरवाजा लगाया है 

इक उम्मीद जाती नहीं की कोई रोक लेगा

इक उम्मीद जाती नहीं कोई रोक लेगा 
और कुछ नहीं तो पीछे से टोक देगा 

बातें कहने का बस एक सलीका हो 
बाकि किसी को कोई और क्या देगा 

सांसों का ज़िन्दगी से जो रिश्ता है 
वो मौत को भी देखिएगा डरा देगा

लोग बस मंजिल के लिए चलते हैं 
असली मज़ा रास्ता सफर का देगा

हम अपने ज़ख्मों की किससे बात करे 
जिसे देखिये अपना ज़ख्म दिखा देगा 

शायर शायद उन्हीं को कहते हैं  
दिल के ज़ख्मों से जो गुनगुना लेगा 



ज़िन्दगी का हर सबक वक्त ने पढ़ाया है

ज़िन्दगी का हर सबक वक्त ने पढ़ाया है 
वो कैसे पास होगा जो किताबों से सीख कर आया है

अब हाँ और ना में फैसला होता नहीं 
ज़िन्दगी ने इतना हमें खुद में उलझाया है

ग़लतियों से वो सिखाते हैं कहाँ 
जो कहते हैं हमने धोखा खाया है 

अज़ी आप क्यों बुरा मान गए 
ये तो हमने खुद के लिए दोहराया है 

लीजिये उन्होंने भी दाद दे दी 
मतलब हमने सच फरमाया है

बात तो हर बार हमने सच ही थी कही
पर कई बार ये दिल को छू नहीं पाया है

पढ़े लिखों की ज़िन्दगी में भी परेशानी है 
यानि पढाई ने असली पाठ कहीं छुपाया है  

चलिए अब चुप हो जाइये 
किसी ने इशारों में समझाया है