Wednesday, 31 August 2016

क्यूँ उखड़े उखड़े जनाब नज़र आते हैं

क्यूँ उखड़े उखड़े जनाब नज़र आते हैं
कुछ पूछिए तो और ख़फ़ा हो जाते हैं।

ख़ुद ही गिरे और ख़ुद से ही ज़ख़्म पा गए
हमने जो हाल पूछा बोले आप हमें सताते हैं।

जिनकी चाहत में ख़ुद को बदल डाला
वो ही कहें आप बदले-बदले नज़र आते हैं।

हमारी ख़ामोशी कल तक ख़ुदगर्ज़ी कहलाती थी
अब बोलते हैं आप बोलने में गुस्ताखी कर जाते हैं।

अजीब फ़लसफ़ा है इस मोहब्बत और यारी का
बात जिनकी मानते आये वो कहें आप अपनी ही चलाते हैं।

ज़ख़्म दे कर अब वो हमसे बहुत दूर बैठे हैं
चीख़ें तो कैसे वो कहें बिन बात आप चिल्लातें हैं।


Tuesday, 30 August 2016

ज़रूरी तो नहीं

सुनिए हर बात, हर बात सुनना ज़रूरी तो नहीं
हमने तो अपनी कहीआपकी हो ज़रूरी तो नहीं

हमने पहचाना  है उन्हें उनकी किताबों से
सबने पढ़ी हो वो वाकियात ज़रूरी तो नहीं

जिनके वादे पर गुज़ार ली ज़िंदगी हमने
उन्हें भी हो हर बात याद ज़रूरी तो नहीं

टूटे पत्ते हैं शाख़ के पर है हमारे जज़्बात दरख़्तों से
हो दरख़्तों के भी ऐसे ही ख़यालात ज़रूरी तो नहीं

जो गुज़री थी हमपे वो सुनाई महफ़िल को
हों सबके वैसे ही हालात ज़रूरी तो नहीं

अब छोड़नी पड़ेगी अधूरी ही वो दास्ताँ 
हर दास्ताँ मुकम्मल कहलाये ज़रूरी तो नहीं

सुकून की तलाश में आज भी भटक रहा इंसान
हर दिल को मिले जहाँ में क़रार ज़रूरी तो नहीं 

  

Monday, 29 August 2016

चलो एक बार फिर ख़ुश हो जायें

बचपन में एक बार लौट कर जायें
छोटी छोटी बातों से ख़ुद को हँसायें
चलो एक बार फिर ख़ुश हो जायें  

जद्दो-जहद भरी ज़िंदगी से
कुछ पल अपने लिए चुरायें
चलो एक बार फिर ख़ुश हो जायें  

छोटी छोटी ख़्वाहिशों को
बड़ी बड़ी शक्लों में अपनायें
चलो एक बार फिर ख़ुश हो जायें  

प्यासे परिंदों को पानी पिलाकर
कुछ तो क़दम आगे बढ़ायें
चलो एक बार फिर ख़ुश हो जायें  

कुछ बोल तोतले बोल कर
कुछ रूठो को ही मनायें
चलो एक बार फिर ख़ुश हो जायें  

बेबसी के इस दौर में
कुछ उदासी को छुपाएँ
चलो एक बार फिर ख़ुश हो जायें  

मंज़िल ही तो सौग़ात नहीं
हर छोटी सौग़ात को सराहें
चलो एक बार फिर ख़ुश हो जायें  

वक़्त के क़ैद से ख़ुद को छुड़ाकर
अब वक़्त से इतना ना घबराएँ
चलो एक बार फिर ख़ुश हो जायें  

ज़िंदगी का मक़सद एक हो
हम सभी को ख़ुशी दे पायें
चलो एक बार फिर ख़ुश हो जायें  

Saturday, 27 August 2016

इन आँखों को अब समझा दो

इन आँखों को अब समझा दो
वो न आयेंगे ये इन्हें बता दो।

ज़िंदगी कुछ आराम चाहती है
उम्मीदों के दीये तो बुझा दो।

जिन लोगों की मौजूदगी तुम्हें रुलाती है
ऐसे इंसानों को ज़िंदगी से अपनी हटा दो।

बीती बातों को भूलना ही अब मुनासिब है
ज़िंदगी की किताब से कुछ कहानियाँ भुला दो।

बहुत हुआ दर्द का अफ़साना
कुछ लतीफ़े ही अब सुना दो।

Friday, 26 August 2016

जबाब न देने का बोझ नहीं सहेंगे

जबाब न देने का बोझ नहीं सहेंगे
जितना बन पड़ेगा उतना ही कहेंगे।

हर बात की सफ़ाई मुमकिन नहीं
कुछ सवाल पर अब ख़ामोश रहेंगे।

हर बात पर वो ख़ुद को ले आते हैं
ऐसी बातों से वो ख़ुद परेशान रहेंगे।

जितने वर्क फाड़ोगे ज़िंदगी या किताबों से
उन सब के निशान तुम्हें उसी जगह दिखेंगे।

न उदास हो जिन्हें जाना है उन्हें जाने दो
देखना उनसे अच्छे लोग उनकी जगह मिलेंगे।

Thursday, 25 August 2016

कृष्ण भगवान माँ को दे ज्ञान

हे कृष्ण भगवान
करुणा निधान
तू ही कर मेरा कल्याण
हम मनुष्यों पर भी दे कुछ ध्यान

तुम चोरी कर माखन खाते
फिर भी तुम प्रभु हो कहलाते
पर जब मैंने माखन चुराया
माँ ने ज़ोर से चपत लगाया

तुम रास लीला रचाते
फिर भी घर घर पूजे जाते
जब बालिकाओं से मैंने दोस्ती बढ़ाई
माँ ने मेरी की ख़ूब पिटाई

तुम गीता का पाठ पढ़ाते
जन जन तुमहरे ही गुण गाते
मैंने कुछ ज्ञान लोगों को सिखाया
माँ ने ज़ोरदार डाँट लगाया

हे कृष्ण भगवान
कुछ तो दो मुझे भी समाधान
मेरा भी तू कुछ कर कल्याण
कुछ तो दो मेरी माँ को ज्ञान

प्रार्थना मेरी तुझसे यही
मेरी समस्या भी सुलझे कभी
माँ भी ले मुझे पहचान
उसका बेटा भी बने कृष्ण भगवान

Happy birthday Krishn ji

Wednesday, 24 August 2016

कुछ अंधेरे ज़िंदगी में और बढ़ा दो

कुछ अंधेरे ज़िंदगी में और बढ़ा दो
कुछ ख़्वाहिशों के बोझ ज़िंदगी से हटा दो।

मंज़िल की चाहत अब हमें कहाँ
रास्ते में कुछ काँटे और बिछा दो।

हमने सच्चाई को हाँथों से थामा हैं
दुनियादारी का बोझ दे कर इसे सज़ा दो।

लोग देखने का हुनर आज भी रखते हैं
चेहरे पर जितना चाहो मुस्कान फैला दो।

ना उम्मीदी की इस ज़िंदगी को
थोड़ा अब ख़ौफ़ज़दा भी बना दो।

न अपनी ख़ुशी से आयें हैं न अपनी ख़ुशी से जाएँगे
क्या ग़म, दर्द ज़िंदगी में अब जितने चाहे मिला दो।

Tuesday, 23 August 2016

शतरंज के क़ायदे ज़िंदगी में कब काम आते हैं

शतरंज के क़ायदे ज़िंदगी में कब काम आते हैं
ज़िंदगी में लोग अपनों से ही तो मात खाते हैं।

ऐसे दरख़्त जो फल दे पाते नहीं
सरसब्ज होते हुए भी पहले काटे जाते हैं।

बेइन्तहा अल्फ़ाज़ों की इस दुनिया में
लफ़्ज़ भी ख़ामोशी से हार जाते हैं।

ज़िंदगी सुबह और शाम का ही तो एक नाम है
ख़ुद को सुबह रौशनी और शाम अंधेरे में पाते हैं।

रफ़ू भी उन लिबास या इंसान का हो पता है
जो मज़बूती से टूट कर भी खड़े नज़र आते हैं।