Saturday, 21 April 2018

हमने कब चाहा वकत बदल जाये

हमने कब चाहा वक्त बदल जाये
पर वक्त हमारी समझ में तो आये

मुश्किल है उन रास्तों पे चलना
जो मंज़िल का पता नहीं बताये

बागबाँ कली से कह न पाया
इंतज़ार में वो दिन बिताये

ये ख्वाब ही ज़िन्दगी की चाहत है
ये ख्वाब ही इसे चोट भी पहुचाये

गलत ने राह बताया सही ने चलना सिखाया
पर ये उलझन दिन रात बस हमें है सताए

हम कह सकते हैं समझा सकते नहीं
खुद की समझ से ही कोई समझ पाए

वक्त भी खुद में उलझा हुआ
वक्त भी खुद को कुछ सुलझाए





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