पैरों को चलने के सलीके कैसे समझायें
जब राहों ने खुद हर तरफ काटें हैं बिछायें
जो सिर्फ झूठ के लफ्जों से सजे हो
ऐसे गीत तन्हाई में कैसे गुनगुनायें
डाली ने खुद को थोड़ा क्या झुकाया
हर कोई उसके फूल ही तोड़ना चाहे
कितने दरवाज़े हम रोज़ खोलते
क्या ज़रूरी सबसे गुज़रते जायें
जो राह हर वक्त चोट पहुचायें
उस राह पे क्यूँ हम कदम बढ़ायें