Saturday, 30 July 2016

ज़ुल्फ़ों ने सबके सामने ये राज खोल दी

ज़ुल्फ़ों ने सबके सामने ये राज भी खोल दी
हम हवा से उलझे थे ये राज सबको बोल दी।

मोहब्बत जब टूट ही चुका था हमारे दरमियान
हमने भी मोहब्बत में खाई हर क़समें तोड़ दी।

अब नहीं उठते ये क़दम आपके शहर के लिए  
हमने शहर के हर राह अपने घर को मोड़ दी।

दामन आज भी हमारा ज़ख़्मों से ही तो बेज़ार है
पर आजकल हमने दामन की चिंता ही छोड़ दी।

झुक चुका था वो दरख़्त अपने फलों के बोझ से
इसलिए आज कुछ फलों से लदी टहनियाँ तोड़ दी।

अब कितना भी घना अँधेरा हमें डरा पाता नहीं
अब हमने रौशनी की उम्मीद ही जो छोड़ दी।

आज फिर कुछ सोच कर अपने घर से थे निकले
आज फिर उन्हें देख हमने अपनी हर ज़िद्द छोड़ दी।

5 comments:

  1. कथ्य का चरमोत्कर्ष उसकी अंतिम पंक्ति में है। बंधन कितने भी हों, मन के भटकाव कहाँ-कहाँ क्यों न हों, लेकिन समर्पणशीलता का धर्म छूट नहीं पाता है। प्रेम का रस कुछ ऐसा ही होता है।

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    1. कुवह बातें वक़्त भी सिखाता है।

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  3. सही फरमाया आपने आज के युवाओ के प्यार की दास्तां,म्होब्बत कर लेते है सरेआम किस्मत से खेल
    लेते बाजार में,कसमें खाने से पहले तोड लेते है सरेआम,फीर यही रफतार.....खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनो.....जखमो भरी जींद गी दामन को क्या समजेंगे.....जो अपना सबकूछ गंवा कर देते भरी बाजार में .....इतिहास तो योध्धाओ के
    शौर्य से भरा पजा है...... नया इतिहास कौन बनायेगा ? क्या बनायेगा ..... good afternoon.....
    नाराज नदी कभी ब्हेना नही
    छोड देती
    कीनारा अगर छोड भी दे वो
    दुबारा पाने के लीये

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