Wednesday, 20 July 2016

उम्मीद जाती ही नहीं

जब भी दरवाज़े से दस्तक आती है
कुछ उम्मीदें इस दिल में फिर जगह बनाती हैं।

वो महफ़िल से कब के जा चुके हैं 
पर ये नज़रें उन्हें ही देखना चाहती हैं।

आज फिर हमने किताबों को लिया उठा
आज फिर निगाहें लोगों से बचना चाहती हैं।

वो क्या जाने हम किस दौर से गुज़र रहे हैं
सूरत कब लोगों को सच्चाई दिखा पाती है।

हर तरफ़ फैले इस अँधियारे में
बच्चों की हँसी कुछ रोशनी दे जाती है।

1 comment:

  1. मुस्कराते रहिए। बाकी सब तो यों ही चलता रहेगा।

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