वक़्त के साये में तो
हम ज़िंदगी बिता रहे हैं
कभी हम इससे रूठते हैं
कभी इसे मना रहे हैं।
हम नहीं मानते सुबह जगाने का नाम हैं
वक़्त ऐसा है जागकर हम सपनों को सुला रहे है।
वो तो बस यूँ ही कह दिया हाँ हमें सब याद है
वक़्त के साये में हम भी सब भूलते जा रहे हैं।
वक़्त और कितना इम्तहान
लेगा ज़िंदगी का
वक़्त बात बात में
ज़िंदगी में ख़ौफ़ फैला रहे हैं।
वक़्त की बातों पे हमने
भरोसा था किया
और अब वक़्त की बातों
से ही धोखा खा रहे हैं।
हर चीज़, हर वक़्त,
वक़्त के हाथों, तो खुदा किस काम का
लो वक़्त को ही हम आज
से अपना खुदा बना रहे हैं।
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