अपनी ही लाश ख़ुद उठाए जा रहे हैं
कफ़न के चाहत में इसे छुपाए जा रहे हैं।
ये कैसी बेबसी का मंज़र सामने आया
अपनो के हाथ ख़ूनी जज़्बातों से नहा रहे हैं।
हर तरफ़ बढ़ता हुआ ये अंधेरा
अब तो परछाईं भी साथ छोड़ते जा रहे हैं।
गुज़रे ज़माने के तरह
वो गुज़र क्यूँ नहीं जाते
वो क्यूँ यादों के निशा
दिल पर बना रहे हैं।
फिर इंतज़ार में सूरज
ढल चुका है
फिर इंतज़ार में ही हम
दिन बिता रहे हैं।
इतनी बेग़ैरत हो चुकी है ये दुनिया
हर तरफ़ लोग बच्चों की झूठी क़समें खा रहे है।
इतनी बेग़ैरत हो चुकी है ये दुनिया
हर तरफ़ लोग बच्चों की झूठी क़समें खा रहे है।
मंज़र का मामला थोड़ा गंभीर है। हम उलझे हुए महसूस कर रहे हैं।
ReplyDeleteउलझानो का नाम है ज़िंदगी आप क्यूँ इसे सुलझा रहे हो!!!!!
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