कुछ बेज़रूरत शक्ल और
सामान ज़रूरी है
ज़िंदगी में आदमी होने
की पहचान ज़रूरी है।
पगलों की तरह दौडती
भागती ज़िंदगी में
बिना बात के भी कभी कुछ
आराम ज़रूरी है।
हर किसी पर विश्वास
खोता हुआ इंसान
इंसानों के विश्वास बनी
रहे अब भगवान ज़रूरी है।
शराफ़त ने जो उनका हाल
किया हम भी डर गए
अब लग रहा है इंसानो के
अंदर थोड़ा शैतान ज़रूरी है।
उजड़े हुए चमन की तरह
है ये हमारी ज़िंदगी
हर किसी की ज़िंदगी में
एक बागवान ज़रूरी है।
अब जी नहीं भरता उन्हीं
बेस्वादी बातों से
अब बातों में भी रंग
बिरंगा पकवान ज़रूरी है।
बेमानी के इस दौर में
हम कितना और गिरेंगे
कुछ तो उठो इंसान जीने
के लिए कुछ ईमान ज़रूरी है।
बेतरतीब ढंग से बिखरा
मेरे घर का सामान
फिर घर को सजाने के लिए
कुछ मेहमान ज़रूरी है।
वाह अनीताजी क्या बहेतरीन रुप से इंसानी मझबूरीयां को रजू कीयी आपन्
ReplyDeleteकूछ बेजरुरी सामान व आदमी को हमारी सदैव अचोक्कस जिंदगी मे जरुरी व बिन उप्योगी का भी मजबूरन साथ नीभाना पडता है ,तो साथ साथ हमारा ईमान भी केसे जकड रखना है......बीखरे धर को बीखरा न बीखरा हर चीज के साथ हमें बीखरा हुआ फीरभभी शांतिपुर्ण तरीके से जीनी है मंगलगीत गाना है....जीवन सजाना है,
बहोतखुब
धन्यवाद