दिल पर निशान बनाता कौन?
इसपर लिख कर जाता कौन/
कुछ बीती बातों को,
यादें बनाकर लाता कौन?
अनकही इतनी बातों को,
दिल पर इतना दोहराता कौन?
ख़ामोशी के बीच खड़ा,
इतना शोर मचाता कौन?
टूटे सपनो के बीच पड़ा,
सपने और दिखाता कौन?
सुखी हुई इस धरती पर,
आस के बादल पहुँचता कौन?
वो मौन बना कुछ बोल रहा,
वो बंधा हुआ कुछ खोल रहा।
वो मेरे अंदर अंदर है
हाँ वो मेरा ही मन है।
हर राज़ मुझी पर खोल रहा,
हर बात मुझी से बोल रहा।
सपना ये दिखलाता है,
ये मुझमें आता जाता है।
जो पा न सकी मै,
इसने वो सब पा ली है।
जो टूटा हुआ मेरे अंदर,
इसने उसे जुड़वा ली है।
जो दूर खड़ा है मुझसे,
ये उसे क़रीब दिखलाता है।
जो रूठा हुआ है बरसो से,
ये उससे भी बातें करवाता है।
जो मुमकिन नहीं इस दुनिया में,
ये वो भी कर दिखलाता है।
हर मुमकिन बातों को,
ये आसानी से झुठलाता है।
हाँ मन ही वो कौन है,
जो हर वक़्त दस्तक देकर जाता है।
शब्दों के इस दुनिया में
ये खमोशी से दिन-रात बड़बड़ाता है।
कभी मन को भी बड़बड़ाने दीजिए। स्वयं की ग्रंथि को खोलता है।
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