कई दिेनों से सोच रही थी ब्लॉग लिखूँगी। ब्लॉग में
कुछ कहने से ज़्यादा सजोना, सहेजना चाहती थी। कुछ समेटना चाहती हूँ। लिखकर भूल
जाने की आदत है। मेरी लिखावट यहाँ-वहाँ बिखरी पड़ी है। सोचा सबको समेट कर रखूँगी।
एक ब्लॉग पर कुछ चीज़ें तो सहेज ही सकती हूँ। शुरू किया तो देखा एक जी-मेल अकाउंट
खोलना पड़ता है, एक पुराना जी मेल अकाउंट था सोचा इसी का इस्तमाल कर लेती हूँ। थोड़ी
मगजमारी कर ब्लॉग भी रजिस्टर कर लिया। आँगन नाम दिया इस ब्लॉग को और सोचा पहला लेख
इसी पर, आँगन क्यूँ!! पर हाय हिंदी तूने मुझसे इतनी मेहनत करवाई कि मैं आँगन भूल
ही गई। इसलिए अब पहला लेख तुझे समर्पित है। पिछले एक हफ़्ते से मेरा क्या हाल हुआ
है आज सबके सामने रख ही देती हूँ । अब जग हँसाई के मोह माया से ऊपर निकल चुकी हूँ
।
हिंदी को हिंदी यानी देवनागरी में लिखने का मन बनाया
था। सोचा ब्लॉग पर रोमन टाइप कर देवनागरी हिंदी नहीं लिखूँगी। हिंदी को अंग्रेज़ी में और धोखा
नहीं दूँगी। दो-ढाई साल पहले क़स्बा में कॉमेंट करने के लिए लिए हिंदी में लिखने
की जद्दोजहद से गुज़री थी और तब लगा मैंने यूरेका छन पा लिया है। एक लिंक मिला था
जिसमें आप रोमन में हिंदी लिखे तो वो ख़ुद को देवनागरी में बदल लेती थी। बाद में
मैंने अपने इस अति अद्भुत खोज को जब लोगों के सामने उजागर किया तो हैरान थी। ये
मेरी उपलब्धि नहीं अज्ञानता थी। इस तरह के कई लिंक कई नामो से उपलब्ध थे। पर मुझे
हिंदी लिखने का ये ज्ञान इस महाबोधि सोशल मीडिया नामक वृक्ष की छत्र छाया में
प्राप्त हुआ।
कॉमेंट करना छूटा, क़स्बा छूटा, पर ये रोमन में
हिंदी लिखने के आदत चिपक सी गई। आदत भी आदत है बोलकर थोड़े ही आती है। अगर दरवाज़ा
खटखटा कर आएगी तो कोई बुरी आदत के लिए दरवाज़ा थोड़े ही खोलेगा। ये तो किसी चोर
रास्ते से चुपके से घुसती है और फिर मलाकिनी बन बैठ जाती है। सो रोमन में देवनारी हिंदी
लिखना यानी टाइप करना मेरा चिपकू दोस्त बन गया जिससे पीछा छुड़ाना असम्भव सा हो गया। कुछ दिनों में
मोबाइल से फ़ेसबूक और ट्विटर पर रोमन से ही देवनागरी हिंदी लिखना शुरू कर दिया। अब ये ऐसी-वैसी
आदत नहीं है। आज अगर मुझे हिंदी में डिक्टेशन यानी श्रुतलेख लिखना हो तो मै उसे
रोमन में ही लिखती हूँ। याद दिलाने के लिए ख़ुद अपने सर को थप्पड़ लगाती हूँ और
फिर देवनागरी शुरू होती है।
पर रोमन टाइप कर देवनारी हिंदी लिखने में ग़लतियाँ बहुत होती है।
कब बनाना बनना हो जाए पता ही ना चले और ये ऐसी ग़लती की पढ़ने में मैं बनना को
बनाना ही पढ़ती। ख़ुद का स्वभाव हो या ख़ुद की लिखावट ग़लतियाँ कम ही नज़र आती हैं।
पूरा मन बनाया था एक ग़लत आदत से ब्लॉग की शुरुआत नहीं करूँगी। हिंदी को पूर्ण रूप
से हिंदी में अपनाऊँगी। पर हमारी हिंदी कहा ना इतनी आसानी से हाय हिंदी Hi हिंदी
थोड़ी ही बनने वाली थी। इतनी मेहनत किसी और काम में किया होता तो आज कहाँ की कहाँ
होती। स्टिकर मँगवाया हिंदी फ़ॉंट का और कीपैड पर चिपकाया। पर हिंदी टाइपिंग ये
आदत बनने को तैयार ही नहीं हुई और दिक़्क़त दीर्घ ईकार और ह्रस्व इकर (पतिदेव से
सिखा ये शब्द सोचा इस्तमाल कर ही लूँ, हम इसे छोटी और बड़ी मात्रा बोलतें हैं जैसे
छोटी इ और बड़ी ई) यानी मात्राओं में बहुत अधिक थी। पहले छोटी इ की मात्रा फिर
अक्षर, और बड़ी ई में अक्षर पहले और मात्रा बाद में। मैं तो उन लोगों में हूँ जो
अक्षर लिखने के बाद सोचते है कि कौन सी मात्रा लगेगी, छोटी या बड़ी!! परेशान हो चुकी
थी इस परेशानी का एक कारण और भी था। कुछ दिनों से आईफ़ोन से देवनागरी में हिंदी
लिख रही थी और इसकी कुछ कुछ आदत सी हो चुकी थी। पर आईफ़ोन और डेस्क्टॉप का कीपैड
बिलकुल मेल नहीं खा रहे थे। डेस्क्टॉप से तौबा किया और सोचा मैकबुक का इस्तमाल
करूँ। इसमें हिंदी में टाइप करने का तरीक़ा आईफ़ोन वाला मिल गया।
| प्रचलित हिंदी कीपैड, पर मैंने स्टीकर लगाया |
| मेरी खोज मैकबुक के साथ |
सो देखिए मेरा हिंदी प्रेम। दुबारा स्टिकर मँगाया। स्टिकर से एक-एक अक्षर काटा और उसे एक-एक कर के स्क्रीन से देख कर कीपैड पर चिपकाया। यहाँ पर काटना पड़ा क्यूँकि इस तरह का यानी इस मंगल फ़ॉंट में स्टिकर बाज़ार में उपलब्ध नहीं है। कितना समय लगा होगा सोच सकते हैं? दो घंटे से ऊपर। इसलिए जब पूरा हुआ तो एक फ़ोटो क्लिक तो बनता था। सो क्लिक किया। लगा ये भी मेरा यूरेका मोमेंट मतलब छन है। मैकबुक पर ग़ुस्सा आ रहा था। इतना तो कर ही सकते थे, जब मंगल फ़ॉंट डाला है तो कीपैड भी हिंदी के अनुसार बना ही देते। मतलब हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में। सोचा मैकबुक का ध्यान इस तरफ़ ज़रूर खिचूँगी। उन्हें लेख से टैग कर दूँगी। कुछ शोध कीजिए हिंदी प्रेमियों के लिए। अच्छा ख़ासा समय इस शोध में बर्बाद कर दिया है। पतिदेव कह रहे हैं मैकबुक का सत्यानाश कर रही हो और मेरा जवाब आज का दिन हिंदी के लिए स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा (ज़्यादा हो गया क्या??)। अच्छा तो हिंदी लिखने वालों के लिए स्वर्णिम अक्षरों में (ये भी ज़्यादा है!!)। तो ब्लॉग के लिए स्वर्णिम अक्षरों में (इतना तो चलता है)। मेरे ब्लॉग लेखन के लिए तो है ही ना।
पर हाय री क़िस्मत ये भी यूरेका छन नहीं था। ऑफ़िस
में हमारे हिंदी के विद्वान श्रीमन अशोक ज्योति और ऑफ़िस के
टाइपिंग विद्वान श्रीमन सतीश कुमार ने मेरी महिमा गान को एक सिरे से ख़ारिज कर
दिया। ये मेहनत सब बेकार थी। और विद्वानो से मुझे ज्ञात हुआ की मै यूनिवर्सल फ़ॉंट
यानी मंगल फ़ॉंट का इस्तमाल कर रही हूँ। ये तरीक़ा ग़लत है। क्यूँ? क्यूँकि इसमें प्रिंटिंग
नहीं हो सकती। हिंदी के कुछ फ़ॉंट मालूम है जैसे कृतिदेव वॉकमन, चाणक्य, आदि। पर
वो तो वही कीपैड की दिक़्क़त के कारण छोड़ा था। पर हैरान हूँ मंगल से प्रिंट क्यूँ
नहीं हो सकता? अब अगर मंगल से हिंदी का मंगल नहीं हो सकता तो कुछ तो कमी है कहीं।
मेरी अपनी व्यक्तिगत राय है कि अगर इस मंगल फ़ॉंट में कीपैड हो तो लोग हिंदी आसानी
से टाइप कर पाएँगे। हिंदी टाइपिंग में अभी सही तरीक़े से शोध नहीं हुआ है क्या?
अभी भी इसमें बहुत कमी नज़र आती है। इसमें इतनी कमी क्यूँ है? फ़ॉंट टूटने की
शिकायत, एक फ़ॉंट से दूसरे फ़ॉंट में बदलने की कमी। कई बार तो ये असम्भव होता है।
फ़ॉंट बदलने के चक्कर में कई बार पूरा लेख दुबारा टाइप करना पड़ता है। ऑफ़िस में
ये सब झेल चुकी हूँ। कई बार ऑफ़िस में हिंदी के विद्वानो की वर्तनी की बहस में भी
शामिल हुई हूँ। और अब ये नया चक्कर मंगल में छपाई मुमकिन नहीं। मुझे कुछ छपवाना
नहीं है और न ही कोई भविष्य की योजना है। पर फिर भी हिंदी टाइपिंग पर विचार रखना
तो बनता है। कब हमारी हिंदी टाइपिंग अंग्रेज़ी जैसी आसान हो पायेगी। जानती हूँ काम
करते करते चीज़ें आसान हो जाती है। पर यहाँ आसान से मेरा तात्पर्य एकरूपता से भी है।
क्या हर कीपैड एक तरह से नहीं बन सकते। कुछ तो सामंजस्यता हो लिखाई में जिसमें हर
नया टाइपिंग सिखने वाला उसे एक रूप में अपना सके।
यहाँ एक बात और कहना चाहूँगी कि मुझे सैमसंग का
हिंदी को देवनागरी में लिखने का तरीक़ा भी अच्छा लगा। पूरा वर्णमल समाने दिखता है और
इसलिए टाइपिंग बहुत आसान होती है क्यूँ नहीं हम इसे भी हिंदी टाइपिंग के रूप में
इस्तमाल करे और लिखे। मेरे जैसे नवसिक्खु लोगों के टाइपिंग सिखाने के लिए तो ये बहुत
ही उपयोगी है। इसमें सिर्फ़ मात्राओं के लिए शिफ़्ट बटन की ज़रूरत होती है। और
ज़रूरी नहीं के हम हिंदी को अंग्रेज़ी के कीपैड पर ही सेट करे। हिंदी और अंग्रेज़ी
की ज़रूरतें अलग अलग है। वर्णमाला के रुपता भी भिन्न है। बस एक ख़्याल आया तो साझा
कर लिया।
| सैमसंग कीपैड |
पर मेरी बात अभी ख़त्म नहीं
हुई है। लीजिए आँगन की पहली बौछार आँगन की भूमिका नहीं बल्कि मेरी हिंदी लिखने की
जद्दोजहद बनी। ये हाय हिंदी को Hi हिंदी बनाने की कोशिश। ये हाय हिंदी भी अविनाश
के फ़ेसबुक या ट्विटर से लिया है जिसमें एक टी शर्ट पर हाय को काट कर Hi किया हुआ
था। कोसने से दोस्ती तक पहुँचने का पैग़ाम था वो। पता नहीं क्यूँ वो पोस्ट इतना याद
आया की मैंने इस लेख का नाम उसपर रख दिया। पर हाल भी यही है मेरा।
दोस्ती तो की हिंदी से, पर
धोखा तो अभी भी दे रही हूँ हिंदी को। दिल टूट गया जब पता चला मंगल इतना मंगल नहीं
था। सो लगा इतनी मेहनत क्यूँ। मतलब मुश्किलें तो लाज़मी थी और जब लिखने पहुँची तो
फिर वही मुश्किल, समय लग रहा था और मैं फिर आदत से
मजबूर अपने पुराने रोमन लेखन से हिंदी देवनारी लिखने के आदत के पास वापस लौट गई।
पुनः मूषकः भवः।
अनेक कठिनाइयों के बीच आप अपनी मातृभाषा में टंकण कर लिखने और अपनी बात कहने के लिए तत्पर हैं, यह हमारे लिए प्रसन्नता की बात है। आपको शुभकामनाएँ देता हूँ कि आप इसमें निष्णात हों और हिंदी में टंकण सीख लें।
ReplyDeleteप्रकाशन की दृष्टि से अभी हिंदी-टंकण की एकरूपता नहीं हो पा रही है और विविध फाउन्ट्स में समस्याएँ आ रही हैं। लेकिन हमें अनुसंधानकर्ताओं पर भरोसा रखना चाहिए कि यह समस्या अवश्य दूर होगी।
मैं अपने पिता जी श्री सुरेंद्र प्रसाद जी की कृपा की वजह से हिंदी और अँगरेजी दोनों भाषाओं के अक्षरों का टंकण
कर लेता हूँ। उन्होंने मुझे ११वीं कक्षा में ही टाइपिंग इंस्टिट्यूट में प्रशिक्षण के लिए भेज दिया था। मैंने मनोयोगपूर्वक सीखा भी। उसी का सुखद पक्ष है कि मुझे आज भी टंकण-मशीन और कंप्यूटर के की-बोर्ड पर टंकण करने में सुविधा होती है।
हम जिस भाषा में अपने अंतस् में सोचते और विचार करते हैं, उसमें अपनी बात कहने में हमें सहजता का अनुभव होता है। आप अँगरेजी अच्छी तरह बोलती और लिखती हैं, फिर भी हिंदी में आपका लिखना इसी भाषा-प्रेम का द्योतक है। बधाई है आपको।
क्या बात है अशोक जी ... आपके कॉमेंट बहुत ही उत्तम ...और सच्चाई ये की न मेरी हिंदी अच्छी न अंग्रेज़ी ... ग़लतियाँ दोनों में करती हूँ और बहुत करती हूँ ...ये आपसे ज़्यादा कौन जनता है ...पर शुक्रिया....कोशिश कर रही हूँ टंकण कर सकूँ हिंदी में ...
Deleteकोशिश ही सफलता की ओर ले जाती है। शुभकामनाएँ ।
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