सब कुछ पाया हुआ खो देते हैं,
दीवाने ज़िंदगी के
हिसाब से कब उलझे होते हैं।
इश्क़ क्या उन्हें
बर्बाद करेगा
दीवाने तबाह करने की
इजाज़त ख़ुद जो देते हैं।
सच कब कोई दीवाना सुनना
चाहता है
सच दिवानों के हर भरम जो
तोड़ देते हैं।
इश्क़ कब पैदा हुआ जो मर
जाएगा
दीवाने इसी सोच में
ज़िंदगी गुज़ार लेते हैं।
चीख़ता कहता जा रहा है
वो दीवाना
आज समझा लोग तूफ़ानों
को क्यूँ इंसानी नाम देते हैं।
तो इंसान तबाह स्वयं के कारण ही ज्यादा होता है। नहीं तो कविवर पंत की तरह कहकर निकल जाए तो अच्छा है --बाले तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ मैं लोचन !!!
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