Tuesday, 19 July 2016

आज फिर

आज फिर वो अपनी बातों से उलझा गए
आज फिर कहते हुए वो ‘शायद’ लगा गए।

आज फिर हमने पूछा ‘कैसे’
आज फिर वो ‘क्यूँ’ से काम चला गए।

आज फिर हमने ज़ुबा से सुनना चाहा
आज फिर वो आँखो से बता गए।

आज फिर हमने जाने की बात की
आज फिर वो आने का इरादा समझा गए।

आज फिर हम टूट के बिखर गए थे
आज फिर वो हमें गले लगा गए।

2 comments:

  1. 'आज फिर' की कविताई उम्दा है। मन को गुदगुदानेवाली पंक्तियाँ हैं । अच्छी हैं। देहांगों की भाषा का अस्तित्व कभी-कभी शब्द पर भारी पड़ता है--भरे भुवन में करत हैं नैनन ही सों बात !

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  2. शुक्रिया आप ने पसंद किया और आपकी भाषा उसका तो कोई जबाब नहीं!!!!!

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