ज़िंदगी की तरह मेरी लिखावट भी दिख रही है
देखो ये मेरे घर के कोने कोने में बिखरी पड़ी है
कुछ तो कोने में चुप
चाप खड़ी है
कुछ कितने सालों से बंद
दराजों में धरी है
कुछ अलमारी के ऊपर से
ताक रही है
कुछ ऑफ़िस के फाइलों के
पीछे से झाँक रही है
कुछ किताबों के बीच में
मुँह छिपाए है
कुछ ख़ामोशी में जीते
जाए है
कुछ रूठ के घर से जा
चूँकि
सच कहूँ तो वो मुझसे
छुटकारा पा चुकी
कुछ को मैंने अनजाने
में ही विदा किया
पुराने कापी और किताबों
की बीच बैठी थी
रद्दी समझ कर उसे लोगों
ने हटा दिया
पर हैरान आज भी हूँ
कुछ को कैसे मैंने जला दिया
डर था अगर ये इस रूप में बाहर जाएगी
घर के बदनामी लोगों में करवाएगी
तो मरना ही उसकी ज़िंदगानी थी
बस कुछ दिन की उसकी कहानी थी
कुछ आज भी मुझपर बरस रही है
कुछ अनकही बातें कहने को तरस रही है
कुछ कोख से ही आवाज़ लगा रही है
कोख में ही न मार दी जाए
ये बात उसे सता रही है
नहीं अब किसी को नहीं
मरूँगी
तुम सब को फिर से
सवारूँगी
जो है मेरे पास उसे
सहेजूँगी
खोई हुई मिले तो उसे
गले लगा लूँगी
भूली हुई बात फिर से
दोहरा लूँगी
जितना बन पड़ा फिर से
निखारूँगी
तुम्हें हर रूप में
पालूँगी
आज फिर दिल में ये बात
ठानी है
मुझे भी करनी कुछ
मनमानी है
तुम सबको एक दीवार
चाहिए
हाँ तुम्हें भी एक
परिवार चाहिए
अब तुम्हारे लिए एक घर
बनाया है
तुम जी सको इसलिए ये
रास्ता अपनाया है
ये घर तुम्हारा है
तुम्हें इसपर पूरा अधिकार है
इस घर में बेटियों की
तरह तुम्हारी दरकार है
अब मन बनाया है तुम्हें
इस घर में बसाऊँगी
किसी के भी डर से
तुम्हें कहीं नहीं छुपाऊँगी
तुम्हें जन्म दिया है
इतना तो मेरा अधिकार है
जिस रूप में भी हो तुम
मुझे तुमसे प्यार है।
बहुत सुंदर रचना है ,आपकी |शुभकामनायें
ReplyDeleteशुक्रिया
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