Saturday, 16 July 2016

मेरी लिखावट

ज़िंदगी की तरह मेरी लिखावट भी दिख रही है
देखो ये मेरे घर के कोने कोने में बिखरी पड़ी है
कुछ तो कोने में चुप चाप खड़ी है
कुछ कितने सालों से बंद दराजों में धरी है
कुछ अलमारी के ऊपर से ताक रही है
कुछ ऑफ़िस के फाइलों के पीछे से झाँक रही है
कुछ किताबों के बीच में मुँह छिपाए है
कुछ ख़ामोशी में जीते जाए है
कुछ रूठ के घर से जा चूँकि
सच कहूँ तो वो मुझसे छुटकारा पा चुकी
कुछ को मैंने अनजाने में ही विदा किया
पुराने कापी और किताबों की बीच बैठी थी
रद्दी समझ कर उसे लोगों ने हटा दिया
पर हैरान आज भी हूँ
कुछ को कैसे मैंने जला दिया
डर था अगर ये इस रूप में बाहर जाएगी
घर के बदनामी लोगों में करवाएगी
तो मरना ही उसकी ज़िंदगानी थी
बस कुछ दिन की उसकी कहानी थी
कुछ आज भी मुझपर बरस रही है
कुछ अनकही बातें कहने को तरस रही है
कुछ कोख से ही आवाज़ लगा रही है
कोख में ही न मार दी जाए
ये बात उसे सता रही है
नहीं अब किसी को नहीं मरूँगी
तुम सब को फिर से सवारूँगी
जो है मेरे पास उसे सहेजूँगी
खोई हुई मिले तो उसे गले लगा लूँगी
भूली हुई बात फिर से दोहरा लूँगी
जितना बन पड़ा फिर से निखारूँगी
तुम्हें हर रूप में पालूँगी
आज फिर दिल में ये बात ठानी है
मुझे भी करनी कुछ मनमानी है
तुम सबको एक दीवार चाहिए
हाँ तुम्हें भी एक परिवार चाहिए
अब तुम्हारे लिए एक घर बनाया है
तुम जी सको इसलिए ये रास्ता अपनाया है
ये घर तुम्हारा है तुम्हें इसपर पूरा अधिकार है
इस घर में बेटियों की तरह तुम्हारी दरकार है
अब मन बनाया है तुम्हें इस घर में बसाऊँगी
किसी के भी डर से तुम्हें कहीं नहीं छुपाऊँगी
तुम्हें जन्म दिया है इतना तो मेरा अधिकार है
जिस रूप में भी हो तुम मुझे तुमसे प्यार है।




2 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना है ,आपकी |शुभकामनायें

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