कल एक शख़्स दिखा जिसके हाथ पैर बंधे थे
किसी ने उसके हाथ पैर बाँध
कुर्सी पर बिठा दिया था
कुर्सी पर रस्सी से उसे
पूरी तरह चिपका दिया था।
खिड़की से देखती रही
उस बेबस इन्सान को
बँधा हुआ वो छटपटा रहा
था
वो हर बंधन तोड़ना चाह
रहा था।
पहले उसने हाथ हिलाया
बहुत कोशिश की पर उसे
खोल नहीं पाया
फिर उसने ख़ुद को
सरकाया
कुर्सी के साथ मिलकर
थोड़ा छटपटाया।
वो अब भी कुर्सी से
बँधा हुआ था
बेबस बंदा कुर्सी पर सटा
हुआ था
परेशान हो वो कुर्सी के
साथ ही उठा
धीरे धीरे वो घर में
कुर्सी के साथ ही फिरा।
अब ख़ुद को छुड़वाने की
छटपटाहट और बढ़ी
उसने तेज़ी से कुछ
कोशिश और शुरू की
वो कभी कुर्सी के साथ
ही गिरता
फिर कुर्सी के साथ ख़ुद
को उठता
फिर गिरता लड़खड़ाता फिर
कुछ संभल जाता।
पर कुछ देर में पूरा
कमरा
तहस नहस हो चुका था
ख़ुद को छुड़वाने की
कोशिश में
घर का हर सामान बिखरा
पड़ा था।
क्या सोच रहे हो कौन वो
इन्सान है
वो हमारे बीच ही
विराजमान है
तुमने भी उसे देखा है
तुम्हारी भी उससे पहचान
है।
तुमने देख कर अनदेखा
किया
और मैं लिख रही हूँ
क्या करूँ अनदेखा नहीं
किया जाता
पर घर के भीतर घुसने का
रास्ता भी नज़र नहीं आता।
वो शख़्स हमारी नदियाँ
है
जो इस हालत में नज़र आई
है
हर रास्ता उसका हमने
रोका है
हमने ही उसे बाँधों की ज़ंजीरे
पहनाई है।
वो करे भी तो क्या ख़ुद
को कैसे छुड़वाये
कुर्सी की रस्सी को
कैसे वो तोड़ पाये
इसलिए उसने घर पर तबाही
मचाई है
और हम इंसान सोच रहे
हैं ये बाढ़ क्यूँ आई है।
Wonderful बहेती नदी,निर्मल जल व जल की धारा जेसे गंगामैयी .....कूदरत की मानव को भेट ....क्या हाल कर दीया इंसान ने ....ब्हेती नदी को हमने बांध बनाके उस की कठीनाई बढा दी क्या उसका जीना हैरान कर गीया,बीचारी गरीबडी बना ली ...आखीर वो कब तक,कीस हद तक सहन करेगी...फीर रोद्र रुप धारण कर सारेजंहा उथलपाथल ही मचायेगी ना,.....
ReplyDeleteStop globalisation
BEAUTIFUL Heart touching